अवनि एक अटूट विश्वास - 4 RAAHULL SHARMA द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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अवनि एक अटूट विश्वास - 4

आर्यमन की उलझन और पिघलती बर्फ


आर्यमन का आंतरिक संघर्ष


पूरे दिन कानपुर की गलियों में घूमते हुए, आर्यमन की नज़रें एक पल के लिए भी अवनि से नहीं हटीं। वह अपनी पुरानी यादों के चश्मे से अवनि को देखने की कोशिश कर रहा था।


उसके दिमाग में श्रद्धा का चेहरा घूम जाता, जिसने हमेशा खुद को आगे रखा था। लेकिन यहाँ अवनि... वह कुछ अलग ही थी।



गंगा घाट पर सादगी: आर्यमन ने देखा कि जब अवनि ने गंगा जल के छींटे अपने माथे पर लगाए, तो उसके चेहरे पर कोई दिखावा नहीं था, बल्कि एक अजीब सा सुकून था। 



उसे लगा, "क्या कोई इतना शांत हो सकता है?"


मानवता का परिचय: फैक्ट्री के बाहर जब अवनि ने अपनी जेब से पैसे निकालकर और साथ लाए खाने के पैकेट गरीबों में बांटे, तो आर्यमन को लगा कि शायद यह मेहमानों को दिखाने के लिए किया गया नाटक है।


पर अवनि की आँखों में उन गरीबों के लिए जो नमी थी, वह बनावटी नहीं लग रही थी।


खुद को जोखिम में डालना: मंदिर की भीड़ में जब अवनि ने एक बुजुर्ग महिला को धक्का लगने से बचाने के लिए खुद को आगे कर दिया और खुद धक्का खाकर दीवार से टकरा गई, तब आर्यमन का दिल पहली बार जोरों से धड़का। 



उसने देखा कि अवनि को चोट लगी थी, पर वह अपनी चोट भूलकर उस बूढ़ी औरत की खैरियत पूछ रही थी।


आर्यमन की कशमकश


आर्यमन का दिमाग अब उससे सवाल कर रहा था— "क्या यह सब सच में नाटक है? 


कोई इतना बड़ा कलाकार कैसे हो सकता है कि अपनी चोट तक की परवाह न करे? श्रद्धा तो कभी अपनी उंगली पर खरोंच भी न आने देती थी, और यह लड़की...?"



उसका सख्त रवैया अब नरम पड़ने लगा था। वह अवनि से नफरत करना चाहता था, उसे 'लालची' कहना चाहता था, लेकिन अवनि के काम उसे ऐसा करने से रोक रहे थे। वह बुरी तरह कन्फ्यूज (उलझन) में था।




नीलम की पैनी नजर


आर्यमन के चेहरे के बदलते भावों को उसकी भाभी नीलम ने भांप लिया था। उसे डर लगने लगा कि कहीं आर्यमन इस 'गांव की लड़की' के प्रभाव में न आ जाए। 


जब सब मंदिर से बाहर निकल रहे थे, नीलम ने आर्यमन के पास जाकर चुटकी ली, "देख रहे हो आर्यमन? कितनी शातिर है ये लड़की।


जानबूझकर गिरती है ताकि तुम उसे बचाओ, जानबूझकर गरीबों की मदद करती है ताकि तुम इम्प्रेस हो जाओ। बड़े शहरों में इसे 'इमोशनल मैनिपुलेशन' कहते हैं, बचके रहना!"



आर्यमन ने नीलम की बात सुनी, पर इस बार उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उसके दिमाग में अवनि का वह मुस्कुराता हुआ चेहरा घूम रहा था जब उसने कहा था— "कान्हा सबके भीतर बसे हैं।"



आर्यमन के मन में चल रहा यह द्वंद्व कहानी को एक बहुत ही संवेदनशील मोड़ पर ले आया है। एक तरफ अवनि की निस्वार्थ अच्छाई है, तो दूसरी तरफ श्रद्धा के धोखे का वो गहरा जख्म जो अभी भरा नहीं है।



अध्याय १४: अतीत का साया और वर्तमान की कड़वाहट


एक पल का सुकुन और फिर तूफ़ान


मंदिर की सीढ़ियों से उतरते वक्त आर्यमन के मन में अवनि के लिए जो थोड़ी सी नरमी आई थी, वह अचानक एक काली छाया में बदल गई।


जैसे ही उसने अवनि को एक बच्चे के सिर पर हाथ फेरते देखा, उसे श्रद्धा की याद आ गई। श्रद्धा भी शुरू-शुरू में ऐसी ही 'मासूमियत' का मुखौटा पहनती थी। 


उसे याद आया कि कैसे श्रद्धा ने उसे अपने प्यार के जाल में फंसाया और फिर उसके एक्सीडेंट के बाद उसे छोड़कर चली गई थी।



विश्वास का टूट जाना


श्रद्धा की याद आते ही आर्यमन की मुट्ठियाँ भिंच गईं और उसकी आँखों में फिर से वही पुराना गुस्सा लौट आया।


उसने मन ही मन खुद को धिक्कारा, "आर्यमन! बेवकूफ मत बनो। औरतें ऐसी ही होती हैं।

ये अवनि भी वही कर रही है जो श्रद्धा ने किया था—सबके सामने अच्छा बनने का ढोंग। ये सादगी, ये भक्ति, ये गरीबों की मदद... ये सब सिर्फ एक जाल है।"



एक पल में अवनि की सारी अच्छाइयाँ आर्यमन की नज़र में 'चालबाजी' बन गईं। उसका बदला हुआ रवैया फिर से पत्थर जैसा सख्त हो गया।



अवनि की चोट और आर्यमन की बेरुखी


हवेली वापस पहुँचते समय अवनि के हाथ में मंदिर वाली दीवार से लगी चोट के कारण हल्का खून रिस रहा था।

अवनि के पिता मोहन गोयंका ने चिंता में कहा, "अवनि बेटा, तुम्हें तो बहुत चोट लगी है। आर्यमन बेटा, जरा देखना, तुम्हारे पास शायद कार में फर्स्ट-एड बॉक्स होगा?"



अवनि ने उम्मीद भरी नज़रों से आर्यमन की तरफ देखा, पर आर्यमन ने बड़ी बेरुखी से अपना चेहरा फेर लिया।


उसने ठंडे स्वर में कहा, "जो लोग दूसरों को बचाने का इतना बड़ा रिस्क लेते हैं, उन्हें अपनी चोट सहने की आदत होनी चाहिए। मेरे पास फालतू की मरहम-पट्टी के लिए समय नहीं है।"



हवेली में सन्नाटा


आर्यमन की इस बात ने वहाँ मौजूद हर इंसान को हैरान कर दिया।

अवनि की आँखों में एक पल के लिए दर्द उभरा, पर उसने तुरंत अपनी नज़रें नीची कर लीं। नीलम ने पास खड़े होकर एक विजयी मुस्कान के साथ आर्यमन के कान में कहा, "शाबाश आर्यमन! 

बिल्कुल सही कहा। इन लोगों को अपनी जगह पता होनी चाहिए।"
अवनि का मौन और कान्हा से सवाल

रात को जब सब सोने चले गए, अवनि अपने कमरे में कान्हा की मूर्ति के सामने बैठी थी। उसने अपनी चोट पर पट्टी बांधी और रुआंसे मन से बोली, "कान्हा! 


ये इंसान इतना कड़वा क्यों है? ऐसा लगता है जैसे इनका शरीर यहाँ है पर इनकी रूह किसी बहुत पुराने दर्द में कैद है। क्या मैं