उसके बाद आप इस हवेली की परछाईं भी नहीं छू सकते। बेहतर होगा कि आप यहाँ से चले जाएँ, वरना हमें आपको जबरदस्ती यहाँ से हटाना पड़ेगा।"
आर्यमन वहीं गेट की सलाखों को पकड़कर खड़ा रह गया। उसे समझ आ गया कि कपूर खानदान की उस एक गलती ने गोयनका और कपूर परिवार के सालों पुराने रिश्तों को राख कर दिया है। हवेली की ऊँची दीवारें उसे अब काटने को दौड़ रही थीं।
आर्यमन की आवाज़ सुनकर अवनि, जो बालकनी पर खामोश खड़ी थी, उसकी नज़र नीचे गेट पर पड़ती है।
जैसे ही दोनों की आँखें मिलती हैं, आर्यमन की उम्मीदें जाग उठती हैं। वह पागलों की तरह चिल्लाने लगता है।
आर्यमन (चिल्लाते हुए): "अवनि! अवनि! देखो ये लोग मुझे अंदर नहीं आने दे रहे हैं। प्लीज अवनि, इन्हें कहो कि मुझे अंदर आने दें। मुझे तुमसे बात करनी है!"
आर्यमन का शोर सुनकर हवेली के अंदर हलचल मच जाती है। अवनि के पिता, माता और खुद सेठ श्याम सुंदर गोयनका (दादाजी) बाहर बरामदे में आ जाते हैं।
दादाजी के चेहरे पर वही कठोरता और आँखों में वो तेज़ था जो किसी को भी झुका दे।
अवनि बालकनी पर जड़ सी खड़ी थी। उसकी आँखों में आंसू थे, लेकिन चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता। दादाजी ने ऊपर अवनि की तरफ देखा और फिर नीचे गेट पर खड़े आर्यमन की ओर।
दादाजी (कड़क आवाज़ में): "इतना शोर क्यों मचा रहे हो कपूर साहब के बेटे? यहाँ चिल्लाने से बीता हुआ वक्त वापस नहीं आएगा।"
दादाजी ने गार्ड्स को इशारा किया और फिर गेट की तरफ बढ़े। अवनि भी धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतरकर अपने दादाजी के पास आकर खड़ी हो गई।
उसने अपनी नज़रें झुका ली थीं, वह आर्यमन की आँखों में नहीं देख पा रही थी।
आर्यमन (हाथ जोड़ते हुए): "दादाजी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मेरे परिवार से बहुत बड़ी भूल हुई है। अवनि, तुम तो जानती हो मैं ऐसा नहीं हूँ। प्लीज मुझे एक मौका दो।"
दादाजी ने अवनि के कंधे पर हाथ रखा और आर्यमन से बोले, "मौके उन्हें दिए जाते हैं जो उनके लायक होते हैं। तुमने अपनी चुप्पी से और तुम्हारे परिवार ने अपनी ज़बान से जो घाव मेरी पोती को दिए हैं,
उनका इलाज तुम्हारे पास नहीं है। आज कपूर परिवार का नाम इस हवेली की दीवारों के लिए भी ज़हर बन चुका है।"
अवनि ने हिम्मत जुटाकर अपनी आँखें उठाईं और सिर्फ इतना कहा, "आर्यमन, अब यहाँ आने का कोई मतलब नहीं है।
जिस अवनि को तुम जानते थे, उसे तुम्हारी भाभी और तुम्हारे 'अतीत' ने उसी पहाड़ी पर मार दिया है। अब यहाँ सिर्फ 'अवनि गोयनका' रहती है, जिसके पास तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है।"
अवनि की आँखों में एक आखिरी बार दर्द की चमक दिखी, लेकिन उसने अपनी नज़रें फेर लीं और दादाजी का हाथ थामकर भारी कदमों से हवेली के अंदर चली गई।
उसके पीछे उसके माता-पिता भी अंदर चले गए।
लेकिन गेट के पास अब भी अवनि की चाची खड़ी थीं।
उनकी आँखों में गुस्सा भी था और पछतावा भी। चाची दरअसल आर्यमन की दूर की बुआ लगती थीं, क्योंकि आर्यमन के पिता उनके कजिन थे।
उन्होंने ही बड़े चाव से इस रिश्ते की नींव रखी थी, लेकिन आज वह खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही थीं।
चाची ने गेट की सलाखों के पास आकर आर्यमन से बेहद कड़वाहट के साथ कहा:
चाची: "आर्यमन! अब इन सब बातों का कोई मतलब नहीं है। रोने-धोने से कुछ हासिल नहीं होगा।"
आर्यमन ने रोते हुए कहा, "बुआ जी, आप तो जानती हैं मैं अवनि से कितना..."
चाची (बीच में ही टोकते हुए): "चुप रहो! पहले क्यों नहीं बताया? न तुम्हारे पापा ने मुझे कुछ बताया, न तुम्हारी मम्मी ने।
तुम लोगों ने मुझे इतना पराया कर दिया कि इतनी बड़ी बात मुझसे छुपाकर रखी? अगर तुमने मुझे पहले ही बता दिया होता कि तुम्हारे और श्रद्धा के बीच क्या चल रहा है, तो आज यह नौबत ही नहीं आती।"
चाची का चेहरा गुस्से से लाल हो गया, उन्होंने आगे कहा:
चाची: "और वो तुम्हारी भाभी... नीलम! वो अपने आप को पता नहीं क्या समझती है?
सारा करामात उन्हीं का है। उन्होंने जिस तरह अवनि को नीचा दिखाया और तुम्हारी उस पुरानी बला (श्रद्धा) को लेकर वहां तमाशा किया, उसी ने आज इस रिश्ते की चिता जलाई है। तुम्हारे परिवार के घमंड ने मेरी भी नाक कटवा दी इस घर में।"
आर्यमन ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, "बुआ जी, प्लीज मुझे अवनि से एक बार बात करने दीजिए। भाभी की गलती की सज़ा मुझे मत दीजिए।"
चाची (नफरत से): "अब बहुत देर हो चुकी है आर्यमन। बाबू जी का फैसला पत्थर की लकीर है। तुमने अपनी चुप्पी से अवनि का साथ छोड़ दिया था,
अब वो तुम्हारा साथ छोड़ चुकी है। अब अपनी उस 'शानदार' भाभी और श्रद्धा के पास जाओ, क्योंकि इस हवेली के दरवाज़े तुम्हारे खानदान के लिए हमेशा के लिए बंद हो गए हैं!"
यह कहकर चाची ने भी अपना मुँह फेर लिया और तेज़ी से अंदर चली गईं। गार्ड्स ने लोहे का भारी गेट एक ज़ोरदार आवाज़ के साथ बंद कर दिया—धाड़!
आर्यमन वहीँ अकेला रह गया। सन्नाटे में उसे सिर्फ अपनी सिसकियाँ और अपनी भाभी नीलम की वो बातें याद आ रही थीं जिन्होंने उसकी दुनिया उजाड़ दी थी।
आर्यमन की आँखों में अब आँसू भी सूख चुके थे। वह बेजान सा खड़ा हवेली की उस खिड़की की ओर टकटकी लगाए देख रहा था जहाँ अवनि का कमरा था।
उसे उम्मीद थी कि शायद एक बार वह खिड़की खुलेगी और अवनि उसे देख लेगी, लेकिन वह खिड़की बंद रही—जैसे अवनि ने अपने दिल के दरवाज़े उसके लिए हमेशा के लिए बंद कर लिए हों।
तभी, सन्नाटे को चीरती हुई तीन गाड़ियाँ तेज़ी से आईं और हवेली के उसी गेट पर रुकीं जहाँ आर्यमन खड़ा था।
पहली गाड़ी से उसके माता-पिता उतरे, जिनके चेहरों पर अब सिर्फ़ हार और पछतावा था। दूसरी गाड़ी से सोहन और नीलम भाभी उतरे, और तीसरी गाड़ी में श्रद्धा बैठी थी, जो बाहर निकलने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रही थी।
आर्यमन के पिता ने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखा। उनका हाथ कांप रहा था।
पिता (भर्राई आवाज़ में): "आर्यमन... बस करो बेटा। अब यहाँ खड़े रहने का कोई फायदा नहीं है। सब कुछ खत्म हो गया है।
सेठ श्याम सुंदर गोयनका जी ने हम से बात करने तक से मना कर दिया है। ये लोग अब हमारी कोई बात नहीं सुनेंगे।"
आर्यमन ने कोई जवाब नहीं दिया, वह बस पत्थर की मूरत बना हवेली को देखता रहा। तभी उसकी माँ ने रोते हुए कहा: