हाय ऑल ! इट्स मी अगेन विधि आहूजा ! शर्लिन ने मुझे घुँघरू और श्राप की सारी कहानी सुनाई तो मैंने हंसकर कहा,
" कहानी अच्छी है मगर क्या तू इसे सच मानने लगी है? "
अपने ख्यालों में खोई सी वह बोली,
" कहानी को मनगढ़ंत मानने की वजह भी तो नहीं है। "
" कहानियाँ तो मनगढ़ंत ही होतीं हैं डियर । "
" लेकिन पापा ने भी कहा था कि वो पीतल का पन्ना करीब चार- पांच सौ साल पुराना है। "
" तो होगा, हर रॉयल फैमिली अपनी फ़ैमिली हिस्ट्री की किताब बड़े शान से सजा के रखतें हैं मगर सब कुछ सच थोड़े ही होता है । "
" विधि ! पहले तो ये बुक उनकी फ़ैमिली हिस्ट्री नहीं है, दिस इज स्टोरी ऑफ़ फैमिली कर्स। "
" व्हाट् ! "
" यस ! और ये बुक रिस्ट्रिक्टेड ज़ोन में थी, मतलब समझ रही है। "
"यानि वो नहीं चाहते कि इस किताब के बारे में कोई जाने ।"
" एक्जेक्टली ! "
" अगर ऐसा है तो वो इसे सम्भाल कर के क्यों रखें हुए हैं, डिस्ट्रॉय भी तो कर सकते थे। "
" आई थिंक, इसके पीछे कोई न कोई सॉलिड रीजन होगी। इस बारे में पक्का तो मिस्टर रॉय ही बता सकते हैं। "
मेरा चेहरा शरारत से चमका...
" अच्छा जी, तो उनसे मिलने का प्लान है ! "
शर्लिन कुछ नहीं बोली, अपने चेहरे पर आये मुस्कान को छिपाने के इरादे से वो दूसरी ओर देखने लगी। मैंने उसके कंधे पर धक्का मार के पूछा,
" क्या खिचड़ी पक रही है शर्ल । "
" चल हट ! तेरे पास बहुत समय है, तू बैठकर खिचड़ी पका। मुझे कहीं जाना है एंड आई'म ऑलरेडी लेट। "
" स्वप्निल देव रॉय से मिलने जाना है, है ना ! "
शर्लिन ने मुझे धकेल कर परे हटाया और तैयार होने चली गई ... मैंने देखा, उसका चेहरा गुलाबी हो आया था इसलिए मैं पीछे से चिल्लाई,
" आर यू ब्लशिंग माय डियर ! "
" तुम मरो ! "
मैं खिलखिलाकर हॅंस पड़ी।
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इस बार स्वप्निल ने मिलने के लिए कॉफ़ी कॉर्नर को नहीं चुना था क्योंकि वो थोड़ी भीड़भरी जगह थी। वो दोनों इस बार कॉफ़ी क्लासिक पैराडाइज़ में मिले, जहाँ मुकम्मल शांति थी। शर्लिन स्वप्निल को डायरी और पीतल के पन्ना वापस करते हुए बोली,
" यह तो सच में चार सौ - पांच सौ साल पुराना है, मैंने पापा को दिखाया था। "
स्वप्निल कुछ नहीं कहा बस मुस्कुरा दिया। शर्लिन के आवाज में उभर आये नाजुक भाव का नजाकत से सहला गया था उसे । इस मीठे अहसास से एक तरफ जहाँ उसका दिल रोमांचित हो उठा, वहीं दर्द से भरे डर ने दिल को जकड़ लिया । एक अनदेखी लाज भरी चुप्पी छा गई। शर्लिन ने इस चुप्पी को तोड़ते हुए पूछा,
" यह किताब रिस्ट्रिक्टेड ज़ोन में क्यों है ? "
" मैं कुछ समझा नहीं ! "
" मतलब छिपाने के बजाय वो लोग इस किताब को डिस्ट्रॉय भी तो कर सकते थे । "
" ऐसा कहतें हैं कि इस किताब को आचार्य चैतन्य ने अभिमंत्रित किया था, अगर कोई इसे डिस्ट्रॉय करने की कोशिश भी करेगा तो वो पैरालाइज़्ड हो जायेगा । "
" ओह माय गॉड ! "
कुछ देर बाद सोचते रहने के बाद शर्लिन ने पूछा,
" और वो घुँघरू के बेटे का क्या हुआ ? क्या उसे आचार्य चैतन्य ने पाला ? "
" नहीं, इट्स नॉट रिटन डाउन बट ऐसा लगता है कि घुँघरू के बेटे को अजंशा बाई ने गोद ले लिया था क्योंकि आचार्य चैतन्य ने किताब में घुँघरू के बेटे का नाम मृत्युंजय बताया है और अजंशा बाई के अडॉप्टेड बेटे का नाम भी कुमार मृत्युंजय देव था। "
" अजंशा बाई !!! "
" हाँ ! लिखा है कि अजंशा बाई को कोई बच्चा नहीं था इसलिए बाद में उन्होंने आचार्य चैतन्य की मदद से एक बच्चे को गोद ले लिया ... नाम उसका कुमार मृत्युंजय देव था लेकिन राजमाता उसके सख्त खिलाफ थीं, गोद मानी ही नहीं । इस बात को लेकर बहुत हाहाकार मचाया उन्होंने मगर अजंशा बाई को इसकी परवाह नहीं थी ... वह टस से मस नहीं हुईं । "
" लेकिन आचार्य चैतन्य ने किताब में अजंशा बाई के बारे में यह कहा था कि वो राजमाता से बहुत खौफ़ खातीं थीं, उनके सामने उनकी बोलती बंद हो जाती थी। "
" यही तो बात है, खौफ़ जरूर खातीं थीं पर अनन्त देव की और रानियों की तरह वह मूढ़ नहीं थीं। हमारे राजपरिवार के इतिहास में ऐसा लिखा तो नहीं है पर ऐसा लगता है कि घुँघरू वाले इंसीडेंट ने उन पर काफ़ी असर दिखाया था, वो खुद को इम्पाउअर करने लगीं। महरानी अजंशा बाई के एंपावरमेंट के साथ ही साथ राजमाता का असर शासन कार्य पर से खत्म होता गया। तो इस तरह से देखा जाये तो राजमाता इंद्रावती देवी का डाउन्फॉल तो घुँघरू के मौत के साथ ही शुरू हो गया था। "
" और महराज अनन्त देव ? "
" हमेशा की तरह अपने सिंहासन पर गूंगे - बहरे - अंधे बने बैठे रहे, बस अपने आखिरी वक्त में इतना किया कि अपनी छोटी रानी धनश्री के बेटे जलज देव को राज्य का अगला महराज डिक्लेअर कर दिया और कुमार मृत्युंजय को यह कहकर नकार दिया कि एक अडॉप्टेड चाइल्ड राजा नहीं बन सकता। "
" अजंशा बाई इसके अगेंस्ट नहीं गईं ? "
" नहीं, वैसे भी अजंशा बाई राजमाता इंद्रावती देवी की तरह नहीं थीं, हार्टलेस या फिर शायद इसलिए क्योंकि दोनों राजकुमार उनके लिए एक से थे, दोनों की परवरिश उन्होंने ही की थी ...अपने बच्चों की तरह। धनश्री ही तो इस श्राप की पहली निवाला बनीं थीं । "
" और रानी फुल कंवर ? "
" उनके साथ और भी बुरा हुआ, एक बेटा हुआ मगर रानी फुल कंवर की मौत जब वह तीन महीने का था, तब ही हो गई ... रानी फुल कंवर का बेटा भी कुछ समय बाद ही चल बसा । "
" ओह नो जीज़स ! "
" बेसिक्ली हमलोग जलज देव के वंशज हैं। "
" और कुमार मृत्युंजय के डाइनस्टी ? "
" आपने के.एम.डी ग्रुप ऑफ़ होटल्स का नाम तो सुना होगा ...... । "
" ओह ! यानि आपके बिजनेस राइवल कुमार शोभित । "
" हाँ, हम लोग एक ही राजकुल के हैं पर वे हमारी तरह श्राप के ज़द में नहीं आते । "
इतना कहते - कहते स्वप्निल का नूरानी मुखड़ा ज़र्द - उदास हो आया ... शर्लिन का मन भींग गया।
" स्वप्निल ... सॉरी ... सॉरी, आई मीन मिस्टर रॉय ! "
शर्लिन को यूँ घबराता देखके अनजाने में ही स्वप्निल के होठों पे मुस्कान आ गई।
" आप मुझे मिस्टर रॉय कहके क्यों बुलाती हो, स्वप्निल ही कहा करो ना। "
शर्लिन को वो ख्वाब याद हो आया, इसी तरह उस सपने में स्वप्निल ने उससे बड़े प्यार से अपना नाम पुकारने के लिए गुजारिश की थी....
उसे चुप देख स्वप्निल शरारत से बोला,
" ओह अच्छा, लगता है आपको मैं सठियाया हुआ बुड्ढा दिखाई देता हूँ। "
शर्लिन खिलखिलाकर हंस पड़ी ... उसके उस निश्छल हंसी ... उस चांद से मुखड़े पर मोहित होकर स्वप्निल उसे निहारता रह गया। आखिरकार मद्धिम स्वर में बोला,
" क्या मैं आपका दोस्त नहीं बन सकता ? "
" व्हाय नॉट बट एक शर्त पे, आज के बाद नो मिस डी 'क्रूज़ ... नो आप । "
स्वप्निल मुस्कुराया, शर्लिन ने उसके हाथों पर अपना हाथ रख दिया ... स्वप्निल का दिल जैसे उसके कदमों में जा गिरा था । उन पलों में वो सब भूल गया ... श्राप ... शंखचूड़नी ....... सब ! "
क्रमशः ...........