घुँघरू - 5 Shree Kriti द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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घुँघरू - 5

चॉंद सिंदूरी आसमां में इतराने लगा था, बड़ी मनभावन जगह थी। निर्जन पहाड़ियों से होकर एक नदी एक छोटी सी बच्ची की तरह टेढ़ी - तिरछी होती हुई उछलती हुई बह रही थी ... नदी के किनारे पर खड़ी शर्लिन एकटक उस चॉंद के रूप को निहार रही थी, गोरे पांवों के कोमल तलवे से रेत को बेख्याली में ही कुरेद रही थी। पास ही एक पुरानी, आधी-अधूरी बनी इमारत नदी के गोद में अकेली खड़ी थी। चहुँ ओर एक अजीब सी वीरानी छाई हुई थी, सन्नाटा अजगर की तरह उसके छाती पर बैठा हुआ था। अभी कुछ लम्हा ही बीत पाया होगा जब चाॅंद से नज़र हटा कर शर्लिन ने अपनी चारों ओर देखा तो कॉंप उठी। ये कहाँ चली आई वो ... ये कौन सी जगह है ???  इतने में अचानक जोरों की बारिश शुरू हो गई मजबूरन शर्लिन को उस टूटे - फूटे इमारत की पनाह लेनी पड़ी मगर अंदर घुसते ही वो बड़ी हैरानी में पड़ गई, दिल जोरों से धड़कने लगा। उसके सामने स्वप्निल देव रॉय हाथ बांधे एक पिलर पे टेक लगा कर खड़ा था ... होठों पे वही दिलकश मुस्कान। उसने गहरे नीले रंग के पैंट पर सफेद शर्ट पहन रखी थी, जिसके बाजुओं को उसने कोहनी से उपर तक मोड़ रखा था  ... शर्ट के बटन आधे से ज्यादा खुले थे। एक अजीब से नशे ने आहिस्ता - आहिस्ता  शर्लिन पर कब्जा - सा करना शुरू कर दिया ... न जाने कैसा मोह - रस था शर्लिन सब भूल कर बस स्वप्निल को देखे जा रही थी ... गला जैसे सूख रहा था। बहक कर शर्लिन कुछ भूल करती इससे पहले ही जैसे किसी ने उसके मन के भीतर चोट की, शरम से उसने नज़रें झुका लीं और धीरे से बोली, 
" मिस्टर रॉय ! आप यहाँ कैसे ? "
शर्लिन ने नज़रें झुका लीं थीं पर स्वप्निल उसे यूँ ही बदस्तूर देख रहा था, उसकी शोख़ नज़रों को वो महसूस कर रही थी। शर्लिन का सवाल सुनके उसकी दिलकश मुस्कान और बहक उठी, 
" तुम्हारे संग ही तो आया हूँ मैं यहाँ, भूल गई । और तुम मुझे मिस्टर रॉय कहके क्यों बुलाती हो, स्वप्निल कहा करो ना। "

शर्लिन पे जैसे नशा सा छा रहा था, इस नशे की पुलक उसके सारे अंगों में फैल गई थी। उसी नशे के धुन में वो बोली, 
" स्वप्निल, क्या तुम मुझे यहाँ लेकर आये हो? "
स्वप्निल ने जवाब नहीं दिया बल्कि उसके करीब आकर उसे अपनी बाॅंहों में समेट लिया, इजाज़त लेने की जहमत नहीं की । शर्लिन का रहा - सहा संयम भी छूट गया, मदहोशी में पूरी तरह उसकी बॉंहों में सिमट गई। बाहर काली घटा जमकर बरस रही थी, जिसकी छींटे दोनों को भींगो रहे थे ... और बहक जाने को उकसा रहे थे।  हाय ! गज़ब की दिलनशीं रात थी .............. 

............ मगर बारिश की छींटों की जगह यह सुनहरी धूप कहाँ से उस के चेहरे पर बरसने लगी, धूप ने गुदगुदा के शर्लिन के जगा दिया। शर्लिन अकचका के अपने बिस्तर पर उठ बैठी, चारों ओर नज़रें घुमाईं, वो हसीन लम्हे एक क्षण में न जाने कहाँ विलीन हो गए। हाँ, यह तो उसका अपना कमरा था तो क्या वो सपना देख रही थी । सपने तो ऐसे नहीं होते, वे तो आधे - अधूरे से याद रहतें हैं पर यह कैसा सपना था जो उसे यूँ महसूस करा रहा था कि पल - पल को जिया है उसने और फिर स्वप्निल ........
...... शर्लिन का गोरा मुखड़ा शरम से गुलाबी हो उठा ... आँखों में एक अलग ही सुरूर था ... रह - रह के उस सपने की याद उसे बेचैन कर रही थी। शर्लिन की उस हालत बयान करना मुश्किल था और उस की बातों पर भरोसा करना तो और भी मुश्किल था। थोड़ी देर बाद मैं उसके घर पहुँच ग‌ई ...ओह करेक्शन, शर्लिन ने सुबह -सुबह फोन करके मुझे कच्ची नींद से जगा के अपने घर बुलाया था वरना मैं कौन सा दस बजे से पहले जागने वाली थी। वो किचन में कॉफ़ी बना रही थी, उसे देख के मैं उसके गालों पर चिकोटी काटते हुए शरारती आवाज़ में बोली, 
" क्या बात है, मैडम ठीक तो हैं ? "
शर्लिन ने चोर नज़रों से इधर - उधर देखा फिर उसने मेरा हाथ पकड़ा और अपने बेडरूम में ले आई, दरवाजा लॉक करते हुए बोली, 
" विधि कुछ तो बहुत अजीब है, पता नहीं क्या हो रहा है मुझे ... कल रात तो मुझे एक अजीब सा सपना आया ! "
मैं अभी भी मस्ती के मुड में थी इसलिए शरारती आवाज़ में बोली, 
" सपना ... ओहो ! रोमांटिक है ना । "
मेरी उम्मीद के उलट शर्लिन ने हामी भरते हुए कहा, 
" हाँ विधि !  चाहे सच मानो या मजाक !! हैरानी की बात तो ये है कि मैं खुद को स्वप्निल देव रॉय के संग देखती हूँ !!! "
मैं उसके आंखों में शरारत से देखती हु‌ई बोली, 
" ओ तेरी ! बात इतनी आगे बढ़ गई है और मुझे पता तक न चला ... तू तो बड़ी छुपी रूस्तम निकली शर्ल। "
जबाब में शर्लिन झल्ला के बोल उठी, 
" ओ शटअप विधि ! ऐसी कोई बात नहीं है, हमारे बीच ऐसा कुछ भी नहीं है इसलिए तो मैं परेशान हूँ कि इस तरह के सपने मुझे क्यों आ रहें हैं ... क्या मतलब है इन सपनों का ... उस स्वप्निल देव रॉय से तो मैं बमुश्किल दो बार मिली हूँ। "
" प्यार तो पहली नज़र में भी हो जाता है स्वीटी ... लव एट फर्स्ट साइट । "

" प्लीज स्टॉप दिस नॉनसेंस, ऐसा कुछ नहीं है। "

" है तो सही मगर तू मानने को तैयार नहीं। तुझे खुद ही इस बात का अहसास नहीं इसलिए तो तेरा दिल दूसरा तरीका अपना रहा है, तुझे अपनी बात समझाने का। "
मेरी बातों ने शर्लिन को और उलझा दिया। वो समझ नहीं पा रही थी कि ये क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है मगर वह इस बात से भी अनजान थी कि ऐसे ही सपनों की वजह से कोई और भी परेशान है ... स्वप्निल देव रॉय !!! 
अपने बिस्तर पर स्वप्निल पसीने से तरबतर बैठा था, चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था। उसने एक बार अपने कमरे में नज़रें घुमाई फिर तेज़ आवाज़ में बोला, 
" ये मायाजाल यहाँ न रचें, आप का जादू मुझपे नहीं चलने वाला ... मैं आप के मायाजाल में नहीं फॅंसने वाला ... जिन्दगी लीलने का जो आप का शौक है ना वो अब पूरा होने से रहा ... सुन रही हैं आप .....................  ! "

जवाब में कमरे में मन को हर लेने वाली हल्की खुश्बू लिए हुए एक मायाविनी - मखमली हॅंसी गूंज उठी ... हॅंसी ऐसे हौलनाक तरीके से कमरे में गूँजी की स्वप्निल बुरी तरह सिहर उठा, वह जानता तो बहुत कुछ था इस शंखचूड़नी के बारे में मगर यूँ सामना पहले-पहल हुआ था। हॅंसी सिर्फ कमरे में ही नहीं बाहर तक गूंज उठी थी, स्वप्निल के दरवाजे से लगकर चुपचाप खड़े गौतम देव रॉय सूखे पत्ते की तरह कॉंप उठे। इस हॅंसी ने उनके जेहन में भूली यादों को एक - एक करके फिर ताजा कर दिया, वो थरथरा उठे  ' क्या वो सब अब उनके बेटे के साथ दोहराया जायेगा ' ।  इतने में सन्नाटे को तोड़ती हुई उन्हें वहाँ घुँघरू की झनकार सुनाई दी। दहशत से भरे गौतम देव रॉय ने इधर - उधर देखने की कोशिश की पर गाढ़े अंधकार में कुछ दिखाई नहीं दिया या फिर देखने को कुछ था ही नहीं ... चाॅंद को बादलों ने लील लिया था, यह रात बड़ी ही काली थी। 

क्रमशः.....................