कॉफ़ी कॉर्नर में एक नौजवान जोड़ा बैठा था। वह जोड़ा इतना हसीन था कि हर किसी की नज़र उन पर फिसल रही थी ... सही पहचाना ये जोड़ा स्वप्निल देव रॉय और शर्लिन डी'क्रूज़ का था।
हुआ यूँ था कि सुबह - सुबह ही डी'क्रूज़ हाउस में शर्लिन के लिए एक बड़ा सा खुबसूरत बुके पहूँचा जिसमें बस एक छोटा सा चिट था जिस पर एक नंबर लिखा था और नीचे लिखा था,
' आई वांट टू टॉक टू यू अबाउट समथिंग इंपॉर्टेंट, कॉल मी प्लीज। '
- स्वप्निल देव रॉय
शर्लिन बुके देख कर मुस्कुराई पर चिट पढ़ के हैरान रह गई। क्या करे क्या ना करे, अजीब सी कशमकश थी। आखिरकार ज्यादा न सोच कर, उसने नम्बर डायल कर दिया। स्वप्निल ने इतने हम्ब्ली कॉफ़ी कॉर्नर में मिलने के लिए पूछा कि मेरी बेस्टी इन्कार नहीं कर सकी थी।
कॉफ़ी कॉर्नर में, लोगों की चुभती तारीफ़ी निगाहों से परेशान होकर स्वप्निल ने धीरे से कहा,
" ऐसे तो मैं आपसे कुछ भी बात नहीं कर पाऊँगा। "
" कौन सी बात ? "
" क्या हम कहीं और चल सकतें हैं? "
" लेकिन क्यों? "
" मुझे आपसे कुछ बातें करनी हैं । "
शर्लिन तनिक रूष्ट स्वर में बोली,
" मैं जाने कब से बस यही सुन रही हूँ। लिसन मिस्टर रॉय, आपको जो भी बातें करनी अभी और यहीं करें। "
स्वप्निल कुछ क्षण सोच में डूबा रहा फिर अंततः धीमे स्वर में बोला,
" डू यू बिलीव इन पैरानॉर्मल एनर्जी ? "
" ऑफ कोर्स नॉट! "
" फिर आपको कैसे समझाऊँ? "
स्वप्निल देव रॉय की इन बातों ने शर्लिन को अचंभे में डाल दिया था
" मिस्टर रॉय आप की बातें मेरी समझ से परे हैं ! "
" ये बातें समझ से परे ही होतीं हैं । "
" आपकी बातें बहुत मिस्टिरीअस हैं, प्लीज जरा खुल कर समझायें। "
" दरअसल मिस डी'क्रूज़ वह पार्टी मेरे दादा जी ने मेरे लिए दी थी। "
स्वप्निल की बात पर शर्लिन मंद - मंद मुस्कुरा उठी और बोली,
" मुझे अच्छे से पता है कि रिची रिच फैमिली ऐसी पार्टीयाँ क्यों देतीं हैं । "
" और अब दादा जी को लगता है मेरी दिलचस्पी आप में है। सीधी बात यह है कि मैं शादी - वादी के चक्कर में फंसना नहीं चाहता पर मुझे मजबूर करने के वो आपको अपने ट्रैप में फंसायेंगे .... यू नो साम दाम दंड भेद.....। "
" ओह ! बट यू डॊन्ट वरी, आई'म नॉट इंटरेस्टेड इन ऑल दिस। "
" दैट्स गुड बट लिसन मैं नहीं चाहता की इन सब झंझटों में आप फॅंसो क्योंकि सिंहल राजपरिवार यानि मेरी फैमिली, एक शापित राजपरिवार है। "
पहले तो वो कुछ पल स्वप्निल को देखती रही फिर अचानक जोर से हॅंस पड़ी। उसे यूँ हॅंसता देख स्वप्निल चिढ़ के बोला,
" ये मजाक नहीं है ! "
" मज़ाक ही तो है ... शापित राजपरिवार ... रियली मिस्टर रॉय, यू बिलीव इन ऑल दिस नॉनसेंस? "
उसे यूँ हंसता देख स्वप्निल गुस्से से भर उठा और अनजाने में ही तेज़ आवाज में बोला,
" स्टॉप लाफिंग ! डू यू थिंक आई एम ए फूल । मैं भी कहाँ पत्थर पर सिर फोड़ने आ गया। "
शर्लिन का हंसना गुस्से में तब्दील हो गया, उसने भी वैसे ही गुस्से से भरे तेज़ आवाज में जवाब दिया,
" कीप योर वॉइस डाउन मिस्टर रॉय ! बी इन योर लिमिट्स, अंडरस्टैंड !! "
कॉफ़ी कॉर्नर में वो सेंटर ऑफ़ अट्रैक्शन वैसे ही बने हुए थे, इन दो चीखती आवाजों ने उन्हें गॉसिप का मुद्दा भी बना दिया। स्वप्निल थोड़ी देर असहाय सा सिर पर हाथ रख कर बैठा रहा। जब शर्लिन उठ के जाने लगी तो धीमे आवाज़ में बोला,
" आई एम सॉरी ... ए डोन्ट नो व्हाट कम ओवर मी ! वी आर प्रैक्टिकली स्ट्रेंजर, शायद इसलिए मैं अपनी बात ढंग से समझा नहीं पाया, आई एम लॉस्ट ... सॉरी मिस डी'क्रूज़।"
स्वप्निल की आवाज़ में ऐसी दयनीय थी कि शर्लिन ना सिर्फ वापस बैठ गई बल्कि गिल्टी भी फील करने लगी।
" आई फील सॉरी फॉर यू । "
स्वप्निल कुछ नहीं बोला, खामोश बैठा रहा ... शर्लिन उसे देख रही थी, वो सचमुच एकदम हारा हुआ सा लग रहा था। शर्लिन की गिल्ट फ़ीलिंग और बढ़ गई, वो बोली,
" प्लीज मुझसे बात करो, मैं अब सीरियसली आप की बात सुनना चाहती हूँ .... क्रॉस माय हार्ट । "
" यहाँ नहीं ! क्या आप मेरे साथ ग्रैंड गैलरी लाइब्रेरी चल सकती हो? "
" ग्रैंड गैलरी लाइब्रेरी !!! "
" प्लीज ......... ! "
" ओके मगर मैं सैकड़ों बार वहाँ जा चुकी हूँ। "
स्वप्निल अर्थपूर्ण नज़र से उसे देखता हुआ बोला,
" वहाँ नहीं जहाँ जाना मना है ... । "
" यू मीन रिस्ट्रिक्टेड ज़ोन। "
स्वप्निल सिर्फ रहस्यमयी ढंग से मुस्कुराया ... ग्रैंड गैलरी लाइब्रेरी सिंहल राजपरिवार के एक हवेली में बना था, उन्होंने ने ही इसे एक भव्य लाइब्रेरी में तब्दील करवाया था।
कॉफ़ी कॉर्नर से निकल के स्वप्निल ने पहला काम यह किया कि अपनी रॉल्स - रॉयस को ड्राइवर समेत वहां से वापस रवाना कर दिया और फिर शर्लिन से बोला,
" वो क्या है ना अगर हम मेरी गाड़ी से वहाँ जाते तो मेरे दादा जी को तो पता चल ही जाता और फिर रात को थका- हारा घर लौटने पर उनके ढेरों सवाल का मुझे सामना करना पड़ता, यह मुझ पे भारी पड़ता। हम लोग आप की गाड़ी से लाइब्रेरी चल सकते हैं क्या? "
" यै ऑफ कोर्स ! "
शर्लिन की गाड़ी एक मिडिल क्लास लड़की के हैसियत के मुताबिक अच्छी थी, टाटा कर्व ईवी। सीटबेल्ट पहनते हुए स्वप्निल बोला,
" अगर लड़की ड्राइविंग सीट पर हो तो गाड़ी में बैठने से जिनका इगो हर्ट हो जाता है, वेल आई एम नॉट दैट काइंड ऑफ़ गाए। "
स्वप्निल के बोलने के अंदाज पर शर्लिन हॅंस पड़ी। जल्द ही वो ग्रैंड गैलरी लाइब्रेरी में पहुँच गये, रिस्ट्रिक्टेड ज़ोन में। स्वप्निल ने चाभी निकाल कर एक अलमारी का दरवाजा खोला, शर्लिन को देखकर ऐसा लगा की वहाँ एक पीतल का बड़ा और बेहद भारी बॉक्स जैसा कुछ रखा है। स्वप्निल उसे शर्लिन को दिखाते हुए कहा,
" ये हमारे राजपरिवार के श्राप की कहानी है। "
इतना कहते हुए स्वप्निल ने अपने जेब से पीतल की ही एक छोटी सी चाभी निकाली और उसे खोला। खुलने पर पता लगा कि वो एक पीतल के पन्नों पर लिखी किताब है। उसने बहुत से पीतल के पन्ने पलट कर कुछ हिस्सा दिखलाया, जहाँ शाप की कहानी दर्ज थी। शर्लिन को भला क्या समझ आता, वो किताब संस्कृत में लिखी हुई थी। स्वप्निल शायद यह समझ रहा था इसलिए उसने एक ड्रावर में से एक मोटी सी डायरी निकाली और शर्लिन को पकड़ाते हुए कहा,
" ये उस कहानी का ट्रैन्स्लैशन है। मैंने अपने टीनएज में खुद इसे ट्रांसलेट किया था। "
" रियली ! "
फिर वो थोड़ा हिचकिचाते हुए बोली,
" कैन आई टेक इट होम, एक्चुअली आई एम टू मच इंटरेस्टेड इन रीडिंग द स्टोरी ऑफ़ योर फैमिली कर्स। "
" विथ प्लेजर । "
वो पीतल के उस किताब को देखते हुए बोली,
" वो किताब कितनी पुरानी होगी? "
" यही कोई चार - पाॅंच सौ साल पुरानी । "
" सच में ? "
" हाॅं ! "
" काश उस किताब को मैं अपने पापा को दिखा पाती, वो एक आर्कियोलॉजिस्ट हैं। "
शर्लिन की बात सुन स्वप्निल कुछ पल सोचता रहा फिर एक गहरी सॉंस ली और किताब की ओर मुड़ा। वो पीतल के पन्ने पीतल के एक तार से बंधे थे। स्वप्निल ने उन तारों को बड़ी तरतीब से खोला और पहला पन्ना निकाल कर शर्लिन के हाथों में थमा दिया।
" पूरी किताब तो आपको नहीं दे सकता, फॅंस जाऊँगा ... वैसे इस पन्ने को भी एक सप्ताह के अन्दर सम्भाल के वापस कर देना प्लीज।"
" श्योर ... प्रॉमिस ! "
अचानक से शर्लिन को मन को हर लेने वाली हल्की खुश्बू लिए हुए एक सुरीली - मखमली आवाज सुनाई दी,
" कहो तो मैं तुम्हें श्राप की कहानी सुना सकतीं हूँ ... यूँ जैसे आंखों देखा हाल हो सखी ! "
" नो थैंक्स ! "
और जब ये जानने के लिए कि कौन है, पीछे मुड़कर देखा, तो वहाँ उसे कोई भी नजर नहीं आया ... वहाँ स्वप्निल और उसके अलावा कोई नहीं था। तभी घुँघरू की मधुर - मयाविनी झनक उसके कानों में गूंज उठी ... शर्लिन फटी - फटी आंखों से चारों ओर देखने लगी, स्वप्निल ने चौंक कर पूछा,
" मिस डी 'क्रूज़ ! आर यू ऑल राइट ? "
शर्लिन थोड़ा संभली, माथे पर आया पसीना पोछा और बड़ी ही मुश्किल से फंसे कंठ से बोली,
" आई... आई... आई'म फाइन ! "
बिन कहे भी स्वप्निल समझ गया, शर्लिन के चेहरे का रंग उड़ गया था। कुछ देर बाद दोनों एक दुसरे से अलग अपनी मंजिल की ओर निकल गए।
क्रमशः.......................