घुँघरू के प्रति अपने असीम अनुराग को मैंने भक्ति के रूप में बदल दिया था और अपनी देवी को कीचड़ में धॅंसा हुआ छोड़ जाना मेरे वश की बात नहीं थी। उस देवी के समस्त दुखों का मूल अनन्त देव है, जो इस साम्राज्य का राजा है तो क्या उसे उसके निकृष्ट अनाचार का दंड न मिलेगा .... अवश्य मिलेगा। मैंने घुँघरू से अपने साथ राज - भवन चलने का आग्रह किया। उस समय वह एक शिला पर सिर झुकाये बैठी थी, उन्हें देख कर ही समझ आ रहा था कि उनके चित्त में भयंकर हाहाकार था। मेरी बात सुन वह उठ खड़ी हुईं और मेरे पीछे चल पड़ीं। संकट का अहसास मुझे था इसलिए मैंने रक्षा का साधन पहले ही घुँघरू को दे दिया था, वह एक विष - दग्ध छुरा था जिसे बड़ी ही आसानी से उन्होंने अपने कंचुकी में छिपा लिया। राजमार्ग शान्त था, हम दोनों भी चुपचाप चले जा रहे थे ... बस उनके पायल के घुँघरुओं की मीठी झनकार इस अशुभ सन्नाटे को तोड़ रही थी । कुछ देर में ही हम राजकुल के द्वार पर आ गए, द्वार - रक्षक मुझे भलीभाँति पहचानता था इसलिए हमारे भीतर जाने में कोई बाधा नहीं हुई। फिर तो हम दोनों राज - दरबार में प्रविष्ट हो गए। मैं भलीभाँति जानता था कि राजदरबार में सामना महराज अनन्त देव से नहीं राजमाता इंद्रावती देवी से होगा ... यही हुआ भी। पाषाणमूर्ति सी राजमाता अपने भव्य सिंहासन पर विराजमान थीं, महराज अनन्त देव के सिंहासन के ठीक दायीं ओर। राजमाता पुरातन पंथी थीं, राजकुल में पर्दा बरतने की दृढ़ पक्षपाती। स्वयं भी राज - दरबार में रेशमी पर्दे की आड़ में बैठतीं थीं। मैं और घुँघरू सिंहासन के सामने आकर खड़े हो गए। घुँघरू पर दृष्टि पड़ते ही अनन्त देव चिहुँक पड़े, मुख का रंग म्लान पड़ गया परन्तु पर्दे के पीछे से राजमाता का स्वर सुनाई पड़ा,
" स्वागत आचार्य चैतन्य ! अहोभाग्य हमारे जो आज आपके शुभ चरण इस राजप्रासाद में पड़े वरना आपके तो दर्शन ही दुर्लभ हो गए थे । "
राजमाता के स्वर में स्पष्ट व्यंग्य था। महामात्य दासियों को साथ लिये मेरे वंदन के लिए आगे बढ़े परन्तु मैंने उन्हें रोक दिया, मेरा क्रोध से रक्ताभ मुख देख राजसभा में सर्वत्र भय का वातावरण छा गया। मैंने राजमाता के कटाक्ष को अनदेखा कर कठोर स्वर में अनन्त देव से कहा,
" यह कैसा अधर्म है राजपुत्र ? क्या आप की भोग लिप्सा इतनी बढ़ गई है कि शास्त्र - विहित रूप से पाणिग्रहण की हुई अपनी भार्या के साथ यूँ निकृष्ट छल किया आपने .... उन्हें असह्य यंत्रणा में छोड़ दिया। "
सम्पूर्ण राजसभा स्तब्ध रह गई, सब फैली - फैली आंखों से मेरी ओर देखने लगे !!! परदे के पीछे से राजमाता क्रोध से भरे स्वर में बोलीं,
" गुरू-कुमार ! यह कैसा उन्मत्त व्यवहार कर रहें हैं आप, वह भी इस कुलभ्रष्टा के लिए। "
मैंने दृढ़ता के साथ कहा,
" सावधान ! जिसे आप कुलभ्रष्टा कह रहीं हैं, वह आपके कुल की वधू है ... महराज अनन्त देव की पत्नी । "
अहंकार से भरी राजमाता की हंसी गूंज गई राजसभा में,
" राज्य के गुप्तचर सदा सक्रिय रहतें हैं गुरु - कुमार, मुझे सब ज्ञात रहता है। छल महराज ने नहीं इस कुलटा ने किया है, यह विलासिनी एक विधवा थी। विधवा का पुनर्विवाह, आप ही कहें क्या यह शास्त्रानुमोदित है ? छि: ! छि: ! अरी पापिनी ! तूने एकदम लज्जा त्याग दी, राजसभा में आ पहुँची। "
सभा जनो में कुलबुलाहट शुरू हो गई, सारी सभा की आंखें घुँघरू पर टिकीं थीं ।
' ...... कलंकिनी ... पापिन ... कुलभ्रष्टा ... विश्वासघातिनी ... कुलटा...... '
स्पष्ट - अस्पष्ट स्वर राजसभा में सुनाई देने लगे। घुँघरू और अधिक सहन नहीं कर सकीं, उनका अंर्तमन घायल हो चुका था, इन लांछनों से कहीं अधिक अनन्त देव के मौन से ... नवोढ़ा होते हुए भी घुँघरू तेजस्वनी और स्वाभिमानी थी। अब तक निरन्तर बहते आंसुओं को उसने पोंछ डाला और सिंहनी की भांति गरज उठी,
" अगर मैं पापिनी हूँ तो इस पाप के भागी आपके पुत्र महराज अनन्त देव भी हैं राजमाता, क्योंकि वह मेरे अतीत से अनभिज्ञ नहीं। क्यों महराज, यथार्थ कह रहीं हूँ ना मैं? यह मौन कैसा ?? अगर मैं सत्य में विश्वासघातिनी हूँ तो अपना मौन भंग कर प्राणदण्ड क्यों नहीं देते मुझे ??? कैसा छल किया मैनें आपके साथ ? क्या आप दुधमुहा बालक थे जिसे धर्म - अधर्म का ज्ञान नहीं था? पत्नी के साथ भरी सभा में वेश्या की भांति व्यवहार होने पर भी जो न बोले, ऐसे कापुरुष से विवाह कर कलंकित तो मैं हो ही गई ... छि: ! धिक्कार है ऐसे कायर पुरुष पर ..... ! "
परदे के पीछे से राजमाता इंद्रावती देवी क्रोध से चिल्ला उठीं,
" महामात्य, इस कुलभ्रष्टा को बंदी बना लो। यह इस तरह फिर वाक् - चातुर्य दिखाये या फिर कोई ऊधम मचाये तो कोड़े लगवाओ। ब्राह्मणी के वेश में वेश्या ! तो ठीक है अब ये इस नगर में यही कार्य करेगी !! नहीं करेगी तो प्राणदण्ड पायेगी !!! "
अब भी अनन्त देव अपने सिंहासन पर गूंगे - बहरे - अंधे बने बैठे रहे, सत्य कहा था घुँघरू ने वह कायर पुरुष थे। राजमाता इंद्रावती देवी के विरुद्ध जाना उन्हें स्वीकार नहीं था इसलिए अपनी ब्याहता पत्नी का भरे राजसभा में यूँ घोर अपमान होता देखते रहे ... पाषाण मूरत बने सिंहासन पर बैठे रहे परन्तु घुँघरू की यह विडम्बना मुझसे देखी न गई। मैंने आकुलता से सहायता हेतु अपने पिता की ओर देखा मगर वह लज्जा वश आंखें चुराये बैठे थे। मैं शिष्टाचार के सभी बंधन तोड़ कर, घुँघरू के सामने रक्षक की तरह खड़ा हो गया और कठोर स्वर में चेताया,
" खबरदार, जो किसी ने देवी को छुआ ! दूर हो !! "
घुँघरू ने अपने पुत्र मृत्युंजय को धरती माँ के गोद में डाल दिया और फिर उसके हाथ में मेरा दिया विष - दग्ध छुरा चमका, जिससे उसने क्षण भर में ही अपना सीना चीर लिया। घुँघरू लहुलुहान अपने पुत्र के समीप गिर पड़ी, मृत्यु काल में उसके मुख से अंतिम शब्द निकले ..............
" मैं एक सत चित्त ब्राह्मणी सिंहल राजवंश को श्राप देती हूँ कि जैसे आज मेरा पुत्र मातृ विहीन हो रहा है वैसे ही इस राजवंश का प्रत्येक वंशज मातृ विहीन रहेगा ... इस राजवंश की प्रत्येक माता मेरी भांति मृत्यु की ग्रास बन जाया करेंगी !!! मेरे श्राप से मात्र मेरा पुत्र और उसके वंशज ही सुरक्षित रहेंगे ...................
अश्रुपूरित नयनों से घुँघरू ने मेरी ओर देखा, छूटते प्राणों के संग बोली,
" .... धन्यवाद ............................! "
और घुँघरू की आंखें निष्प्राण होकर पथरा गईं ... इसके पश्चात क्या हुआ मुझे ठीक से स्मरण नहीं, शायद मैं भी चेतनाशून्य होकर पथरा गया था। मुझे बस इतना याद है कि घुँघरू के मृत्यु के बाद मैंने उसके पुत्र मृत्युंजय को गोद में उठाया और राजभवन से बाहर निकल गया। मुझे बारम्बार घुँघरू के अंतिम शब्द याद आतें हैं, मैं भलीभाँति जानता हूँ कि इन शब्दों का अर्थ क्या है ... इसका अर्थ है कि सिंहल राजवंश का विध्वंस अब निश्चित है, इस राजवंश पर श्राप की अग्नि बनकर बरसेगी घुँघरू..... 'शंखचूड़नी' ..................
क्रमशः...............