अदालत का वह दिन इतिहास में दर्ज हो गया। शहर की सबसे बड़ी अदालत में खचाखच भीड़ थी। मीडिया के कैमरे फ्लैश कर रहे थे, और लोग संयोगिता को एक नजर से देखने के लिए बेकरार थे—कुछ घृणा से, कुछ जिज्ञासा से।
लेकिन विराट अडिग खड़ा था। उसके पास सिर्फ प्यार नहीं, बल्कि सच्चाई के ठोस सबूत थे। वकील साहब ने अदालत में उस 'शिकारी' की फाइल खोली, जिसकी हत्या संयोगिता ने की थी। फाइल में ऐसे दस्तावेज थे जो रोंगटे खड़े कर देने वाले थे। उस आदमी पर न केवल संयोगिता के कॉलेज वाले हैरेसमेंट का मामला दबा हुआ था, बल्कि शहर की दर्जनों लापता लड़कियों और जानवरों के साथ क्रूरता के मामले भी जुड़े हुए थे। वह एक सीरियल ऑफेंडर था, जिसे कानून की कमजोरियों ने सालों तक आजाद छोड़ रखा था।
वकील (जज की तरफ देखते हुए) बोले -
माननीय जज साहब, मेरी मुवक्किल, संयोगिता, ने किसी निर्दोष की हत्या नहीं की। उसने एक ऐसे शैतान को रोका जिसने कानून की नाक के नीचे रहकर अनगिनत अपराध किए थे। जब पुलिस और कानून सो रहा था, तो संयोगिता ने न्याय का हाथ बना। यह हत्या नहीं, यह 'एक्सट्रीम सेल्फ-डिफेंस' और 'मेंटल टॉर्चर' का परिणाम था। उस वक्त वह मानसिक रूप से इतनी टूटी हुई थी कि उसे अपनी सुरक्षा के लिए कोई और रास्ता नहीं दिखा।
डॉ. आर्यन ने गवाही दी। उन्होंने अदालत को समझाया कि कैसे बचपन का ट्रॉमा, कॉलेज का बलात्कार, और पालतू बिल्ली 'मुन्नी' की क्रूर हत्या ने संयोगिता के मन में एक 'पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर' (PTSD) पैदा कर दिया था। उन्होंने बताया कि संयोगिता ने उस शिकारी को मारा, लेकिन यह कोई प्लान्ड मर्डर नहीं था, बल्कि एक ट्रिगर हुई मानसिक अवस्था थी जहाँ उसने खुद को और अपने भविष्य को बचाने के लिए कदम उठाया।
सबसे महत्वपूर्ण पल तब आया जब विवान की गवाही वीडियो लिंक के जरिए ली गई। हालांकि बच्चे की गवाही कानूनी तौर पर जटिल होती है, लेकिन जज ने विवान की मासूमियत और उसके शब्दों के असर को नजरअंदाज नहीं किया।
जज साहब बोले -
बच्चे ने कहा कि उसकी माँ उसे प्यार करती है, उसे डराती नहीं है। और अगर एक बच्चा अपनी माँ को सुरक्षित महसूस करता है, तो समाज को भी उसे एक मौका देना चाहिए।
घंटों की बहस के बाद, जज साहब ने अपना फैसला सुनाया। पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया।
जज बोले -
इस अदालत ने पाया है कि आरोपी, संयोगिता, ने अपराध किया है, लेकिन यह अपराध परिस्थितिजन्य था। मृतक स्वयं एक कुख्यात अपराधी था जिसके खिलाफ पर्याप्त सबूत थे लेकिन कार्रवाई नहीं हुई थी। संयोगिता की मानसिक स्थिति और उसके द्वारा झेले गए अत्यधिक मानसिक यातना को देखते हुए, इस अदालत उसे **'बेगुनाह'** घोषित करती है। उसे किसी प्रकार की सजा नहीं होगी। इन्हें बाइज्जत बरी किया जाता है। हालांकि, उन्हें नियमित मनोचिकित्सकीय देखरेख में रहना होगा।
अदालत में चीखें और तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। कुछ लोग हैरान थे, कुछ खुश थे। संयोगिता वहीं खड़ी रह गई। उसे यकीन नहीं हो रहा था। वह आजाद थी। वह बेगुनाह थी। विराट दौड़कर उसके पास आया और उसे जोर से गले लगा लिया।
विराट (आँसूओं के साथ) बोला -
देखा संयोगिता? मैंने कहा था न! हम जीतेंगे। तुम बेगुनाह हो। तुम आजाद हो।
संयोगिता ने विराट के कंधे पर सिर रख दिया और फूट-फूट कर रोने लगी। यह रोना उन सालों के डर, छिपने, और अपराधबोध का अंत था। बाहर निकलते ही मीडिया ने उनको घेर लिया। लेकिन इस बार, संयोगिता ने सिर नहीं झुकाया। उसने विराट का हाथ थामा और सीधे कैमरों की तरफ देखा।
एक रिपोर्टर ने पूछा -
संयोगिता मैडम, आपको कैसा लग रहा है?
संयोगिता ने माइक की तरफ देखा। उसकी आवाज में अब वह कंपकंपी नहीं थी।
संयोगिता बोली -
मुझे राहत महसूस हो रही है। लेकिन सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है कि अब मैं अपने बेटे विवान के पास जा सकती हूँ। बिना किसी डर के। बिना किसी मुखौटे के। मैं एक इंसान हूँ, और मैं अपनी गलतियों से सीखकर आगे बढ़ूंगी।
विराट ने मुस्कुराते हुए कहा -
और अब, हम तीनों एक नई शुरुआत करेंगे।
गाड़ी में बैठते ही संयोगिता ने विराट से पूछा -
विवान... वह कैसा है?
विराट बोला -
वह मां के साथ घर पर है। वह तुम्हारा इंतजार कर रहा है। चलो, उसे सरप्राइज देते हैं।
कार तेजी से घर की ओर बढ़ी। रास्ते में, संयोगिता ने खिड़की से बाहर देखा। शहर वही था, लोग वही थे, लेकिन अब दुनिया बदल चुकी थी। क्योंकि अब संयोगिता के चेहरे पर वह भारीपन नहीं था। वह हल्की थी। आजाद थी।
जब वे घर के गेट पर पहुंचे, तो विवान दौड़कर बाहर आया। उसके पीछे गंगा जी, काजल और वर्षा खड़ी थीं। सभी की आँखों में आंसू थे, लेकिन इस बार वे खुशी के आंसू थे।
विवान ने संयोगिता को देखा और चिल्लाया -
मम्मा!
संयोगिता ने कार से कूदकर विवान को अपनी बांहों में भर लिया। उसने उसे इतनी जोर से गले लगाया जैसे वह उसे कभी छोड़ेगी नहीं।
संयोगिता बोली -
मेरा बच्चा... मेरा विवान। मम्मा वापस आ गई। हमेशा के लिए।
विराट ने पीछे से आकर दोनों को गले लगा लिया। गंगा जी ने आशीर्वाद दिया। काजल ने शर्मिंदगी और प्यार के मिश्रित भावों के साथ संयोगिता के पैर छुए।
उस शाम, उस घर में फिर से वही हंसी-मजाक गूंजा जो सालों पहले बंद हो गया था। संयोगिता की यात्रा खत्म नहीं हुई थी। थेरेपी जारी रहेगी। समाज की नजरें बनी रहेंगी। लेकिन अब वह अकेली नहीं थी।
उसके पास विराट था। उसके पास विवान था। और सबसे बड़ी बात... उसके पास खुद का सम्मान था। वह अब 'शिकारी' नहीं थी। वह 'संयोगिता' थी। एक पत्नी। एक माँ। और एक जीवित इंसान। और यह, उसके लिए सबसे बड़ी जीत थी।
रात का सन्नाटा अब डरावना नहीं, बल्कि सुकून भरा था। बाहर हल्की बारिश हो रही थी, जिसकी आवाज़ कमरे में एक लोरी की तरह गूंज रही थी।
संयोगिता अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी, लेकिन उसकी आँखों में नींद नहीं थी। वह बस विवान के चेहरे को देख रही थी। विवान ने अपनी छोटी-सी तकिया संयोगिता के पास खींच लिया था और फिर, एक नटखट बंदर की तरह, वह दौड़कर संयोगिता से चिपक गया। उसने अपना सिर संयोगिता के सीने पर रख दिया, एक हाथ उसकी गर्दन के पीछे लपेटा और दूसरा हाथ उसकी साड़ी को मुट्ठी में भींच लिया। वह इतनी मजबूती से चिपका हुआ था जैसे डर रहा हो कि अगर उसने ढीला किया, तो संयोगिता फिर से धुएं की तरह गायब हो जाएगी।
संयोगिता ने उसे कसकर गले लगा लिया। उसने विवान के बालों में उंगलियां फेरनी शुरू कीं। यह स्पर्श, यह गर्माहट... यही तो वह चीज थी जिसके लिए उसने सब कुछ झेला था।
विवान ने अपनी नाक संयोगिता की गर्दन में घुसाई और गहरी सांस ली, जैसे वह अपनी माँ की खुशबू को अपने अंदर भर रहा हो।
अचानक, विवान ने सिर उठाया। उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में चांदनी की रोशनी चमक रही थी। उसने संयोगिता की आँखों में देखा और बहुत ही गंभीरता से, बिल्कुल वैसे ही जैसे बड़े लोग बात करते हैं।
विवान बोला -
I love you so much, Mumma.
यह वाक्य संयोगिता के लिए किसी जादू की छड़ी से कम नहीं था। उसका दिल एक पल के लिए रुक सा गया। उन शब्दों में कोई शर्त नहीं थी, कोई सवाल नहीं था, कोई डर नहीं था। सिर्फ शुद्ध, निस्वार्थ प्रेम था।
संयोगिता की आँखों से आंसू बह निकले, लेकिन इस बार वे गर्म थे। उसने विवान के माथे को चूमा।
संयोगिता (गले में भारीपन के साथ) बोली -
और मैं भी तुमसे बहुत प्यार करती हूँ, मेरे शेर। दुनिया में सबसे ज्यादा।
विवान मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में वह सभी दर्द धुल गया जो पिछले कुछ दिनों में उसने झेला था।
विवान बोला -
पापा ने कहा था कि आप बीमार थीं। अब आप ठीक हो गईं?
संयोगिता ने सिर हिलाया।
बोली -
हाँ बेटा। अब मैं ठीक हूँ। क्योंकि तुम यहाँ हो।
विवान ने फिर से खुद को संयोगिता से चिपका लिया और आँखें मूंद लीं। कुछ ही देर में, उसकी सांसें नियमित और गहरी हो गईं। वह सो गया था। सुरक्षित। शांत।
संयोगिता उसे ऐसे ही देखती रही। विराट कमरे के दरवाजे पर खड़ा यह नजारा देख रहा था। वह अंदर नहीं आया, बस मुस्कुराता रहा। उसे पता था कि संयोगिता अब पूरी तरह वापस आ चुकी है। विराट धीरे से अंदर आया और बिस्तर के दूसरी तरफ लेट गया। उसने संयोगिता का हाथ थाम लिया।
विराट (फुसफुसाते हुए) बोला -
सो जाओ, संयोगिता। आज रात कोई डर नहीं है। कोई शिकारी नहीं है। सिर्फ हम हैं।
संयोगिता ने विराट की तरफ देखा, फिर विवान की तरफ। उसने महसूस किया कि उसकी जिंदगी का हर टुकड़ा अब अपनी जगह पर है।
उसने आँखें बंद कीं। पहली बार बरसों बाद, उसे कोई बुरा सपना नहीं आया। उसे बस एक ही सपना आया—एक ऐसा सपना जहाँ वह, विराट और विवान एक मैदान में दौड़ रहे थे, हंस रहे थे, और आसमान में सूरज चमक रहा था।
संयोगिता की यात्रा अभी खत्म नहीं हुई थी। जिंदगी में और भी चुनौतियां आएंगी। लेकिन अब वह तैयार थी। क्योंकि अब उसके पास जीने की एक वजह थी। और वह वजह थी—**प्यार।**
**[समाप्त]**