संयोगिता बाथरूम से बाहर आई। उसने अपने बालों को ठीक किया था और चेहरे पर पानी के छींटे मारकर थोड़ी ताजगी लाने की कोशिश की थी, लेकिन उसकी आँखों के नीचे के काले घेरे और उसके चेहरे का उदास भाव सब कुछ बता रहे थे।
विराट अभी भी बिस्तर के किनारे बैठा था। उसने एक तौलिए को कमर में लपेट रखा था और सिर झुकाए हुए था। जब संयोगिता ने उसे देखा, तो विराट ने धीरे से सिर उठाया। उसकी आँखों में गहरा अपराधबोध और शर्मिंदगी थी।
विराट (भारी आवाज़ में) -
सॉरी... संयोगिता। मुझे लगा... संपूर्णा थी। नशे और अंधेरे में मैं भ्रम का शिकार हो गया। मैंने तुम्हारा सम्मान नहीं किया।
संयोगिता ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। वह सीधे खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई, ताकि विराट की नजरों से बच सके।
संयोगिता (शांत, लेकिन ठंडी आवाज़ में) -
कोई बात नहीं, मिस्टर विराट... इसमें आपकी गलती नहीं थी। मेरी ही गलती है कि मैं आपकी बीवी की हमशक्ल हूँ।
उसने मुड़कर विराट की तरफ देखा। उसकी आँखों में न गुस्सा था, न रोना। बस एक अजीब सा सुन्नपन था।
संयोगिता बोली -
हम दोनों के बीच जो रात में हुआ, उसे आप बुरे सपने की तरह भूल जाएं। और कपड़े पहन लीजिए। मैं नहीं चाहती कि किसी को कुछ भी पता चले। यह कंपनी के लिए, आपके परिवार के लिए, और मेरी नौकरी के लिए खतरनाक होगा।
विराट चुपचाप उसे देखता रहा। संयोगिता की यह ठंडक उसे विराट को और ज्यादा बेचैन कर रही थी। अगर वह चिल्लाती, रोती या गुस्सा करती, तो विराट को लगता कि शायद वह माफ़ी मांग सकता है। लेकिन यह औपचारिक दूरी... यह दिखा रही थी कि संयोगिता ने उस रात को अपने दिल से निकाल फेंका है, या फिर उसे इतनी गहराई में दबा दिया है कि वह कभी बाहर नहीं आएगा। विराट ने सिर हिलाया।
विराट बोला -
ठीक है। मैं तुरंत तैयार हो जाता हूँ।
संयोगिता ने दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाए।
संयोगिता बोली -
मैं बाहर इंतजार करूंगी। जब आप तैयार हो जाएं, तो पीछे के रास्ते से निकलिए। मैं सामने वाले रास्ते से निकलूंगी। हमें अलग-अलग दिखना चाहिए।
इतना कहकर संयोगिता कमरे से बाहर निकल गई और दरवाजा बंद कर दिया। कमरे के अंदर विराट अकेला रह गया। उसने अपने हाथों को देखा, जिनसे उसने कल रात संयोगिता को छुआ था। उसे अब भी संयोगिता की खुशबू महसूस हो रही थी, लेकिन उसके साथ-साथ संपूर्णा की यादें भी ताज़ा हो गई थीं।
उसे एहसास हुआ कि उसने सिर्फ संयोगिता का सम्मान नहीं तोड़ा था, बल्कि शायद उसने उस नाज़ुक रिश्ते को भी तोड़ दिया था जो विवान की वजह से बन रहा था।
बाहर कॉरिडोर में, संयोगिता दीवार से सटकर खड़ी हो गई। जैसे ही दरवाजा बंद हुआ, उसके पैरों में वह ताकत खत्म हो गई जो वह ऑफिस में दिखा रही थी। वह कांपने लगी। उसने अपनी बांहों को कसकर पकड़ लिया, जैसे वह खुद को टूटने से बचा रही हो।
संयोगिता (मन में) -
तूने कहा था कि एक साइको किलर की कोई लव स्टोरी नहीं होती... तो फिर तूने यह क्या किया, संयोगिता? तूने अपनी पहचान क्यों बेच दी?
उसकी आँखों से एक आंसू टपका, लेकिन उसने तुरंत उसे पोंछ लिया।
तभी उसके फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर नाम था— **'माँ'**.
संयोगिता ने गहरी सांस ली, अपने चेहरे पर एक नकली मुस्कान लाई, और फोन उठाया।
संयोगिता (सामान्य आवाज़ में) -
हाँ माँ? जी, मैं ऑफिस में हूँ। सब ठीक है।
लेकिन उसके मन में तूफान चल रहा था। क्योंकि उसे पता था कि आज शाम को जब वह घर जाएगी, तो वह वही संयोगिता नहीं होगी जो कल थी। और शायद... विराट भी नहीं। माँ की आवाज़ में जो चिंता थी, उसने संयोगिता के टूटे हुए दिल पर नमक छिड़क दिया।
संयोगिता बोली -
हाँ माँ, मैं बिल्कुल ठीक हूँ।
कॉल कट गया। फोन हाथ से फिसलकर नीचे गिरा, लेकिन संयोगिता को इसकी परवाह नहीं थी। वह वहीं कॉरिडोर की दीवार से सटकर बैठ गई। अब जब कोई उसे देख नहीं रहा था, तो उसके चेहरे का वह नकाब उतर गया। वह रो पड़ी।
लेकिन यह रोना सामान्य नहीं था। यह एक दबी हुई चीख थी, जो सालों से उसके भीतर कैद थी और आज बाहर निकल रही थी। उसे शरीर में बहुत ज्यादा दर्द हो रहा था। हर हड्डी टूटी हुई लग रही थी। पेट में एक अजीब सी जलन थी, और उन निशानों में, जो कल रात विराट ने नशे की हालत में उसके शरीर पर बनाए थे, भयानक चुभन महसूस हो रही थी। लेकिन शारीरिक दर्द से कहीं ज्यादा गहरा दर्द उसके दिल में था।
संयोगिता (मन में, खुद को कोसते हुए) -
अब मैं वो लड़की नहीं रही... जो किसी मर्द के साथ सोई न हो। अब मैं 'कुंवारी' नहीं रही। मेरी वो पवित्रता, जिसे मैंने अपने अतीत के खून के बीच भी बचा कर रखा था... आज एक भ्रम के लिए बर्बाद हो गई।
उसे अपना आप घृणित लग रहा था। वह 'संपूर्णा' नहीं थी, फिर भी उसने उस रात को होने दिया। क्या इसलिए कि वह विराट से प्यार करने लगी थी? या इसलिए कि वह अकेली थी? या सिर्फ इसलिए क्योंकि विराट ने उसे संपूर्णा समझ लिया था?
सवाल अनगिनत थे, लेकिन जवाब कोई नहीं था। तभी लिफ्ट के खुलने की आवाज़ आई। संयोगिता तुरंत संभली। उसने अपने आंसू पोंछे, बालों को ठीक किया और खड़ी हो गई। उसने अपनी साड़ियों की प्लेट्स को सीधा किया और एक गहरी सांस लेकर ऑफिस के मुख्य हॉल की तरफ बढ़ी।
उसे पता था कि दिन अभी शुरू हुआ है। और उसे 'CEO संयोगिता' बनकर रहना होगा, चाहे उसके अंदर की लड़की कितनी भी टूटी हुई क्यों न हो।
दोपहर तक, ऑफिस में सब कुछ सामान्य लग रहा था। विराट अपनी टेबल पर बैठा काम कर रहा था, लेकिन उसका ध्यान कहीं और था। वह बार-बार संयोगिता के केबिन की तरफ देख रहा था, लेकिन संयोगिता ने पूरे दिन उससे आँख मिलाने से बचा। शाम को, जब विवान स्कूल से वापस आया, तो वह सीधा विराट के पास गया।
विवान -
पापा! मम्मा कहाँ हैं? मुझे उनसे मिलना है।
विराट का दिल धक् से रह गया। 'मम्मा' शब्द सुनकर उसे कल रात की याद ताज़ा हो गई।
विराट (हिचकिचाते हुए) -
वो... वो अभी मीटिंग में हैं बेटा। थोड़ी देर में आएंगी।
विवान ने मासूमियत से सिर हिलाया और खेलने लगा। तभी संयोगिता का केबिन से बाहर निकला। वह थकी हुई लग रही थी, लेकिन चेहरे पर वही पेशेवर मुस्कान थी। जैसे ही विवान ने उसे देखा, वह दौड़कर उसके पास गया।
विवान -
मम्मा!
संयोगिता ने विवान को गोद में उठा लिया। विवान के स्पर्श ने उसे थोड़ी राहत दी, लेकिन जैसे ही उसकी नजर विराट पर पड़ी, वह सहम गई। विराट भी उसे देख रहा था। दोनों की नजरें मिलीं। उस नजर में न तो प्यार था, न ही गुस्सा। बस एक गहरा,
अनकहा सवाल था—
अब हमारा रिश्ता क्या है?"
संयोगिता ने नजरें झुका लीं और विवान को लेकर लिफ्ट की तरफ बढ़ गई। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि ऑफिस के एक कोने में, राहुल (विराट का दोस्त) खड़ा यह सब देख रहा था। और उसके हाथ में एक छोटा सा पेन ड्राइव था, जिसमें कल रात के कुछ ऑडियो क्लिप्स रिकॉर्ड हुए थे—जो गलती से उस कमरे के पास रखे डिवाइस में कैद हो गए थे। राहुल मुस्कुराया।
राहुल (मन में) -
लगता है खेल अब असली मजेदार होने वाला है।