बैटाडिन,
शहर के बीचो बीच खड़ा पाँच सितारा होटल जैसा भव्य नजर आता वह भवन , जैसे अपनी आन बान, शान के साथ सेवा के लिए तत्पर खड़ा है l सत्य यही है कि इसको तैयार भी तो सेवा कार्यों के लिए ही तो किया गया था l प्रतिष्ठित अस्पतालों की तरह इस अस्पताल परिसर में भी चिकित्सक, नर्स , कर्मचारी, पहरेदार जैसै हर आगंतुकों मरीजों, परिजनों की सेवा के लिए प्रतीक्षारत खड़े नजर आतेl जो इमारतें मजबूत वर्षों वर्ष रह पाई उनकी नींव पहले कितनी मजबूत की गई होगी। तभी तो वही अटल खड़ी रह सकती है। या यूं कहूँ कि भ्रम होता है कि उन्होंने जन्म ही सेवा कार्य के लिए लिया हैl
अपने मृदु व्यवहार से कुछ समय के लिए भर्ती हुए सभी मरीजों की हर एक मांग को पूरा करने को तत्पर नजर आते| अस्पताल परिसर के हर कर्मचारी | मरीज की हर मांग को अतिथि के समान पूर्ण करने का प्रयास भी करतेl कभी कभी लगता है उनके स्नेह सेवा सहयोग और समर्पण का अक्षय पात्र द्रोपदी का अक्षय वह अक्षय पात्र है जो उसे वनवास काल में भगवान सूर्य ने दिया था l जो मरीज के धन पात्र को भले घटाता रहता हो पर उनके उस पात्र में सब के लिये हर क्षण सब तरह की सेवा उपलब्ध है।
मैं भी अपने घुटनों के दर्द से लाचार उस परिसर में कुछ समय के लिए अपना इलाज करवा रही थी। उन असहनीय पीड़ा के पलों में बैठी देखा करती, देखते रहने के सिवा मैं कर भी क्या सकती थी? जानती भी तो थी ही कि ‘मेरी हर एक शिकायत पर एक इंजेक्शन तैयार था’ जो मेरी पीड़ा को तुरंत हर लेता । आज सोचा मैने जो देखा महसूस किया उसे क्योंन न कलम बद्ध कर दूँ |
मुझे लगता जैसे उस परिसर का निति वाक्य हो कि 'इन परिसर में कोई मरीज उदास मायूस और कमजोर न दिखे'। मरीज के परिजनों को अपने तिलस्म से भ्रमित करते कर्मचारी, डॉ नर्स आदि ,कुल मिलाकर वातावरण सदैव खुशनुमा रहता । पहले मेरी सोच यह थी कि " हमेशा आन्नद में रहने के लिये सुविधाओं की नहीं, समझ की जरूरत है"। जो समझ आया वो यह था कि ' इस सकारात्मक ऊर्जा का कारण, वहां का कठोर अनुशासन, सेवा भाव और स्वच्छता और उचित प्रशिक्षित लोगों का होना ।
उस पल मुझे भी अपनी पीड़ा से कुछ राहत मिली जब मैंने बाल शिशु सी मोहक मुस्कान, श्वेत किन्तु वक्र दंत पंक्ति, पूर्ण आत्मविश्वास भरी सधी हुई चाल से चलकर आये एक सुदर्शन हंसमुख पुरुष को अपनी टीम के साथ अपने पलंग के पास खड़ा पाया। " हेलो मैम हम आपकी ड्रेसिंग के लिए तैयार हैं, क्या आपको कोई असुविधा है?" मैंने भी राहत की सांस लेते हुए हामी भरी, शायद मेरे जवाब से वे ऊर्जा समृद्ध व्यक्ति संतुष्ट नहीं थे। ।"वैसे हंसमुख चेहरे वाले लोग मायूस चेहरों के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते, क्योंकि उनकी ऊर्जा आपस में मेंल नहीं खाती।" डॉक्टर ने पुनः अपना परिचय दिया और मुझे प्रसन्न करते हुए जो शब्द कहे वह झूठ होते हुए भी मुझ में उत्साह का संचार कर गए। उस सुदर्शन डॉ ने मुझसे कहा "आप इस वार्ड की सबसे हिम्मत वाली महिला हैं। आप जब तक मुझे प्रफुल्लित नजर नहीं आएंगी मैं अपना काम आरंभ नहीं करूंगा। न जाने उस मोहनी मूरत की ऊर्जा ने मेरी ऊर्जा को किस तरह झकझोर कि मैं सीधी बैठ गई और मुस्कुराने लगी थी। ड्रेसिंग की पीड़ा के अनजाने भय से मेरे मन में आवाज उठी थी| मेरी नजर में उसका व्यक्तिव एक सुगढ़ हीरे सा तराशा हुआ था |कभी सुना था कि हीरे को मुकुट में इसलिए धारण करते है क्योंकि, न केवल वह देखने में सुन्दर होता है उसका मुख्य गुण उसकी कठोरता है। प्रतिभाशाली व्यक्ति भी हीरे की भांती होता है। सम्मान ,सहयोग दो तो यश फैलायेगा और अपमान किया तो घायल कर के रख देगा। इसलिए प्रतिभाशाली व्यक्ति को सदा सहयोग दो ।
उस समय मेरे मन की आवाज यही थी। उन्होंने पुनः मीठे शब्दों में कहा था "अब तो आपको दर्द भी कम है ना? ना चाहते हुए भी मैं उसकी सकारात्मक के आगे नतमस्तक थी। अपना कार्य आरंभ करने से पूर्व उसकी टीम स्वच्छ चमकती पोशाक व सुरक्षा दस्तानों से सज्ज थी। वो मेरी पट्टी खोलने के उपक्रम में लगे थे। कहते हैं कि "कृष्ण ने अपने जीवन में जिसे भी स्पर्श किया उसका सारा क्रोध, शोक, पीड़ा हर ली। मुझे उस सुदर्शन युवक के स्पर्श में ऐसा ही एहसास होने लगा था। नजदीक खड़ी नर्स उनके हर आदेश को पूर्ण करने के लिए तत्पर नजर आई।
पहले ही आदेश की तैयारी के लिए उसने अपने प्रशिक्षित उपक्रम में अपने दक्ष हाथों से जादू के पिटारे में से चमकता, स्वच्छता के मापदंड अनुसार सामान निकाल कर सब सामान तैयार कर दिया था। मेरे पांवों की ड्रेसिंग लिए मुझे लेटने के आग्रह के साथ ही उस सुदर्शन युवक ने जो अपने हाथों में दस्ताने पहने मुँह पर मास्क लगाया फिर भी अपनी चमकती लुभावनी पोशाक में मनमोहक लग रहा था |
उन्होंने आदेश दिया "बैटाडिन" – बैटाडिन ! और उस जादूई पिटारे में बैटाडिन का न मिलना..... उस सौम्या चेहरे की सौम्यता को कठोरता में बदलता चला गया । जैसे कोई अक्षम्य अपराध हुआ हो , अनेक प्रसंग हमारे समक्ष आये हैं जब सदा मुस्कुराने वाले का चेहरा अनेक बार कठोरता में भी बदलता देखा गया है। मुझे उस समय द्वारकाधीश कृष्ण का मुखड़ा याद आ रहा था जो समयंतक मणि के लिए सतराजित द्वारा लगाए आरोप के समय था |
कुछ पल में ही बस 'बेटाडिन' दवाई उनके हाथ में थी। विद्युत गति से उनके हाथ अपना काम कर रहे थे। इशारे मात्र से साधन उपलब्ध हो रहे थे। किंतु दृढ़ इमारत से मजबूत जैसा वह कुशल व्यक्तित्व सबसे महत्वपूर्ण वस्तु की अनुपस्थिति को नहीं बर्दाश्त कर पा रहा था। मेडिकल की भाषा में इस लापरवाही को उसने इतने स्पष्ट शब्दों में बखाना कि नर्स का चेहरा रोने रोने को आया था। दया, क्षमा,संवेदना इस प्रोफेशन में नहीं होती। यह मुझे समझ आ गया था। और उस सुदर्शन युवक के लिए मेरे मन में उठे थे भाव कि "मुफ्त में नहीं सीखा होगा इसने उदासी में मुस्कुराने का हुनर, बदले में जिंदगी के हर खुशी तबाह की होगी" । कुछ पल के लिए मेरा सारा दर्द, पीडा नदारद थी।
अपना काम समाप्त कर तुरंत उन्होंने अपने मनोहर भाव से मुझे देखा। उनके सौम्य स्मित में उम्र दराज महिला के लिये सम्मान का भाव अव्यक्त नहीं था। अपने सधे कदमों से मेरी पीड़ा हर कर वे जा चुके थे। मुझे उस मनोहर लुभावनी चितवन के वो शब्द "बैटाडिन" याद रहेंगे |
सांत्वना के लिए नर्स को देखा तो उसने मात्र यही कहा "आज इनके सही प्रशिक्षण के कारण ही हम यहाँ तक पहुंच पाए हैं" अर्थात सभी उनके व्यवहार और काम के प्रति निष्ठा से परिचित थे। मनोहर मंजुल के आचरण ने मुझे संकेत दे दिये कि "जो शिलाएं तराशने का दर्द और छेनी हथौडी की चोट नहीं सह पाईं वो मंदिर में आस्था का प्रतीक न बनकर देहरी बनकर बस पूजी गईं ।
सुदर्शन युवक ने कुछ पल में मुझे समझाया कि आप कोई भी काम को यदि पूरी लगन से नहीं करते तो आपकी छोटी छोटी भूले आपको सफलता नहीं दिला सकती, जिनके लिए आप प्रयास रत हैं। जीवन में दो ही विकल्प मिलते हैं हमें या तो ‘भाग लो’ या ‘भागलो’ ।आज मैं उस वातावरण से बाहर आते समय सोच रही थी कि इस इंद्रपुरी समान स्थान पर जहां यक्ष ,किन्नर ,गंधर्व से डॉक्टर सहायक आप की सेवा को तत्पर हैं। सभी सुविधा सम्पन्न इस भवन में भगवान करे उनकी सेवा की किसी आवश्यक ही न पड़े।
आज के नव युवकों की सोच के लिए यही कह सकती हूँ आपके जीवन की .त्रासदी यह नहीं है की आप अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाये। त्रासदी तो जीवन में कोई लक्ष्य ही न होने की है।
प्रभा पारीक ,भरूच गुजरात
स्वतंत्र पत्रकार