दिसंबर के अंतिम सप्ताह की वह रात हड्डियाँ जमा देने वाली थी। ठंड ऐसी कि लगता था नसों में दौड़ता हुआ खून भी कहीं रुक-रुक कर चल रहा हो। चारों ओर कोहरा इस तरह पसरा था, मानो धरती ने सफ़ेद चादर ओढ़ ली हो। सड़क, पेड़, बिजली के खंभे..सब धुंध की परतों में खोए हुए थे।
मैं पहली फैक्ट्री से दूसरी फैक्ट्री की ओर निकल पड़ा था। दोनों के बीच मुश्किल से पाँच किलोमीटर की दूरी रही होगी, लेकिन उस रात हर मीटर किसी अनजाने सफ़र जैसा लंबा लग रहा था। स्वेटर, कोट और मफलर में खुद को समेटे मैं धीरे-धीरे बाइक चला रहा था। बीच में दो छोटे बाज़ार पड़ते थे। रोज़ रोशनी से जगमगाते दिखते थे, मगर उस रात कोहरे ने सब कुछ निगल लिया था। समझ ही नहीं आया कि दुकानें खुली हैं या बंद।
एक ढाबे पर बाइक रोकी। खाना पैक कराया। सोचा, कमरे पर जाकर कौन बनाएगा? पैकेट डिक्की में रखा और फिर चल पड़ा।
मेरा कमरा दूसरी फैक्ट्री से ज़्यादा दूर नहीं था। अब शायद दो किलोमीटर का रास्ता बचा था। सड़क लगभग सुनसान थी। रात के नौ-साढ़े नौ बज चुके थे। ऐसी ठंड में कोई घर से बाहर निकले भी क्यों?
तभी धुंध के बीच एक धुंधली-सी आकृति दिखाई दी।
जितना पास पहुँचता गया, वह आकृति उतनी साफ़ होती गई।
एक युवती थी।
शॉल में लिपटी, सड़क किनारे खड़ी थी एक जर्जर लैंपपोस्ट के ठीक नीचे । उसने हाथ के हल्के-से इशारे से मुझे रुकने का संकेत दिया।
मैंने बाइक रोक दी। वह मुस्कुराई। शॉल थोड़ा हटाया। आँखों में गहरा काजल, होंठों पर गहरी लिपस्टिक। मौसम से बिल्कुल उलट, वह बिना स्वेटर के खड़ी थी। जैसे ठंड से नहीं, किसी और चीज़ से लड़ रही हो।
इठलाते हुए धीरे से बोली ..."चलोगे क्या, साहब?"
मैं समझ गया कौन है यूँ ही पूछा । "कितना लोगी?"
"एक घंटा... पंद्रह सौ।"
मैं थोड़ा मुस्कुराया और बोला "यहाँ तो सौ-दो सौ में भी लोग मिल जाते हैं। पंद्रह सौ? ऐसा क्या है तुममें?"वह भी मुस्कुरा दी।
"वो तो साथ चलकर ही पता चलेगा, साहब।"
"नहीं... पंद्रह सौ नहीं दे सकता।"
कुछ पल चुप रही। फिर बोली..
"अच्छा... आपके लिए एक हज़ार।"
मैंने सिर हिलाया।
"नहीं।"मैं बाइक स्टार्ट करने लगा।
पीछे से आवाज़ आई-"पाँच सौ... बस पाँच सौ, साहब..."
मैंने बिना पीछे देखे कहा.."मन नहीं है।"
और आगे बढ़ गया।
पीछे से उसकी "साहब... साहब..." की आवाज़ कुछ दूर तक कोहरे में तैरती रही, मैं फैक्ट्री का चक्कर लगाकर कमरे पर पहुँचा,हाथ-मुँह धोया खाना खोलकर बैठा। लेकिन पहला निवाला भी मुँह तक नहीं जा सका। बार-बार वही चेहरा आँखों के सामने आ जाता।
इतनी कड़ाके की ठंड...रात का समय...सिर्फ़ पाँच सौ रुपये के लिए कोई सड़क पर खड़ा हो सकता है? दिल अजीब-सी बेचैनी से भर गया। भूख जाने कहाँ गायब हो गई। दस बजने वाले थे। सोचा..क्या वह अब भी वहीं होगी? मैंने खाना फिर से ढक दिया। बाइक उठाई...और वापस उसी रास्ते पर चल पड़ा।वह अब भी वहीं थी। मुझे देखते ही उसके चेहरे पर उम्मीद की मुस्कान आ गई।
"पाँच सौ ही दे दीजिए, साहब..कबसे खड़ी हूं ."
मैंने बाइक बंद कर दी। कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर पूछा...
"क्यों करती हो यह सब? कोई नहीं है क्या तुम्हारा? इतनी रात, इतनी ठंड... किसके लिए कर रही ?"उसने नज़रें झुका ली।
काफ़ी देर तक कुछ नहीं बोली फिर बहुत धीमी आवाज़ में कहा..."बच्ची भूखाी है, साहब... सुबह उसके खाने का इंतज़ाम करना है।"
"अरे तो कोई और काम नहीं है क्या या मेहनत करना नहीं चाहती, आसान काम चुना है ?"
वह फीकी-सी हँसी हँसी आसान काम?।
"छह महीने की बच्ची है... उसे छोड़कर कहाँ जाऊँ? बारह-बारह घंटे कौन संभालेगा?"
"उसका पिता?"मैंने कहा..
कुछ क्षण बाद बोली..
"उसे बेटा चाहिए था... बेटी हुई तो मुझे घर से निकाल दिया। पहले से उसकी एक और बीवी थी उसके बच्चे नहीं थे बेटे की चाह में मुझ गरीब से शादी की थी पर बेटी ने अरमान तोड़ दिया उसका । अब उसने फिर शादी कर ली बेटे के लिए ही मैं माँ बाप के घर आ गई थी चार, पाँच महीनों से वही हूं।"
उसकी आवाज़ काँपने लगी थी सर्दी से या दर्द से पता नहीं ।
"पिछले महीने बापू भी नहीं रहे... करंट लग गया था फैक्ट्री में ही जहाँ काम करते थे । माँ हैं.बूढ़ी . दमे की मरीज़ भी है कभी-कभी दो-तीन घंटे बच्ची को संभाल लेती हैं... बस।"
फिर उसने मेरी ओर देखा"मजबूरी है साहब शौक नहीं ।"
मैंने पूछा...
"कोई रिश्तेदार नहीं है जो मदद करे तुम्हारी ?"
वह व्यंग्य भरी मुस्कान के साथ बोली..
"गरीब का कौन रिश्तेदार होता है, साहब?"
कुछ पल हम दोनों ही चुप रहे, कड़वे सच सुनने या बोलने के बाद लोग कुछ देर ख़ामोश हो ही जाते हैं।
फिर उसने बहुत धीरे से पूछा..
"चलेंगे ना साहब ?"मैंने सिर हिला दिया "नहीं।"
उसने दोनों हाथ जोड़ लिए।"बच्ची भूखी रह जाएगी..साहब ."
मैंने पर्स निकाला।
उसमें जितने रुपये थे उस वक़्त करीब दो-तीन हज़ार..सब उसके हाथ पर रख दिए ये लो ।
वह अचरज से मेरी तरफ देखने लगी..।
मैंने कहा.."ये रख लो काम आएगा बहन।"
वो डबडबाई आँखों से मेरी तरफ देख रही थी..
फिर जाने क्यों मेरे मुँह से निकल गया.."तुम्हें अपनी और अपनी माँ इज़्ज़त की परवाह नहीं है ?"
उसने रुपयों को देखा...फिर मेरी आँखों में देखते हुए बहुत गंभीरता से कहा..
"भूख... इज़्ज़त से बड़ी होती है, साहब।"
मेरे पास कोई शब्द नहीं था कुछ और पूछता।
वह मुड़ी कुछ कदम चली फिर पलटकर बोली...
"शुक्रिया..."
मैंने आवाज़ दी"सुनो"वह रुकी।
"अगर कभी लगे कि कोई दूसरा काम कर सकती हो... तो पास वाली फैक्ट्री में आ जाना मैं वहाँ सुपरवाइज़र हूँ। कोशिश करूँगा कि काम मिल जाए।"
उसकी आँखों में पहली बार चमक उभरी। "आपका नाम क्या है साहब ?""उदित।"
उसने धीरे से सिर झुकाया"जी... उदित साहब।"
और फिर...वह कोहरे में धीरे-धीरे ओझल हो गई।
मैं कमरे पर लौटा। टेबल पर रखा खाना अब भी वैसे ही मेरा इंतज़ार कर रहा था।मैंने उसे उठाया गर्म करने के लिए गैस जलाई। नीली लौ को देर तक देखता रहा ऐसा लगा...उसका चेहरा दिख रहा है उसमें और वो बार-बार...बस एक ही वाक्य बोल रही है...
"भूख... इज़्ज़त से बड़ी होती है, साहब!"
~रिंकी सिंह