स्वयंवधू - 69 Sayant द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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स्वयंवधू - 69

इसमें धुम्रपान और शराब का सेवन है। लेखक इसे प्रोत्साहित नहीं करता।  
साथ ही, इसमें हिंसा, खून-खराबा और कुछ जबरन संबंध भी शामिल हैं। पाठकगण कृपया विवेक से पढ़ें।

69. कमरे के पीछे का कांड 

कवच एक बार जो गया, वापस कभी नहीं आया ना उससे जुड़ा कोई व्यक्ति उसकी सुध लेने आया।

उसे उसी डॉक्टर के हवाले कर गया जिसने उसे ज़िंदा लाश बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
और कवच के जाते ही डॉक्टर सुधीर ने अपना नाच शुरू कर दिया।

वो अपने दो-तीन भरोसेमंद डॉक्टर्स को साथ अंदर एकदम से आया और एक अजीब बैंगनी रंग का इंजेक्शन देकर अपनी घड़ी को गहरी साँस लेते, अपने पैर थपकाते हुए देखने लगा।

दो मिनट के अंदर, अंदर ही उसे साँस लेने में तकलीफ होने लगी।

डॉक्टर के पैर रुक गए। उसकी आँखें घड़ी से दो पल के लिए उसपर गिरी, फिर उँगली पटकते हुए वापस एक मुस्कान लिए घड़ी देखने लगा।

और अपने में फुसफुसाया, "एक मिनट।"

ठीक एक मिनट बाद-

उसकी हाथ-पैरों ने एक-एक साँस के लिए तड़पना शुरू कर दिया था।

उसका चेहरा खुशी से उजल गया।
"दो मिनट...", वो फिर अपने में फुसफुसाया,

दो मिनट–
मशीनें आवाज़ करने लगी, जैसे कही बड़ी विपदा आ गई हो।

 सुधीर अब खुले में मुस्कुरा रहा था।

तीन मिनट—
मशीनें और बज़र बज-बजकर पूरे हस्पताल में चिल्ला-चिल्लाकर बता रहे कि इमरजेंसी है, तत्काल मदद चाहिए।

वो वहाँ छोटी-छोटी साँस लेने के लिए तड़प रही थी।

और सुधीर, वो वही था, उसकी टीम वहीं थी। सब खड़ी होकर सारा तमाशा देख रहे थे।

पाँच मिनट के तकरीबन का समय बीत गया होगा, महाशक्ति और उसकी ज़िंदगी के बीच चल रहे संघर्ष में... जहाँ वो हारने लगी थी।

उसकी चंद साँसे ही बची थी तब सुधीर ने अपनी घड़ी पर थपकी देना बँद किया और उसे देखा।

सिर्फ देखा।

ना वो एक इंच हिला, ना उसकी विकलांग टीम।

सब खड़े होकर उसके मौत का तमाशा, अपनी चमकती हुई आँखों से देख रहे थे।

मैं उसकी ऊर्जा को सीधी रखने को पूरी कोशिश कर रही थी, ताकि वो अपनी ऊर्जा पर से नियंत्रण खो अंदर ही अंदर, जल ना जाए।

मैं अंदर से बस वही कर सकती थी। बिना कवच के इसे बचाना संभव नहीं।

एक महाशक्ति को महाशक्ति बनने के लिए सारे शक्तियों की ऊर्जा लगती है, वो अपने में शक्तिशाली नहीं बन सकती। उसे ज़िंदा रहने के लिए कवच की आवश्यकता है। मेरी शक्ति भी इसी से जुड़ी हुई है।

मुझसे जो बन पड़ा, मैंने किया पर उसका शरीर अपनी साँसे खो रहा था।
उसने तड़पना भी बँद कर दिया था। वो एकदम शांत थी। उसके बस चंद साँसे ही बाकी थी कि सुधीर की घड़ी नीची हुई।

अन्य डॉक्टर सीधे हो गए, जैसे मानो किसी जंग के लिए तैयार थे।
उसने एक पलक झपकाई और सब उसकी तरफ़ ऐसे भागे जैसे वो वहाँ उसकी जान लेने नहीं, बल्कि उसकी जान बचाने आये हो।
एक मशीन देख रहा था, उसमें कुछ कर रहा था।
दूसरे दोनों ऑक्सीजन सिलेंडर, ऑक्सीजन मास्क बाहर से लेकर आए, उसे ऑक्सीजन देकर सारी अन्य जाँच और इलाज कर रहे थे मानो जैसे उन्होंने हर एक किन्तु परन्तु पर तैयारी की हो। 

कही से सुधीर आया और उसकी आँखें खोलकर देखी।

पूरा अस्पताल सायरन की गूँज से भर गया।

"आइसोलेशन, नाउ!", वहाँ खड़े सुधीर ने दृढ़ता भरे स्वरों में कहा।

इसके इतना कहते ही शायद बाहर खड़े मेडिकल फौज उसे एक झटके में उठाकर ले गए।

सीरियस कंडीशन में बता, उसे ब्लॉक के सबसे सुनसान कोने के आईसीयू में शिफ्ट करवा दिया, सबसे अलग-थलग रख दिया। 

वहाँ हर तीन घंटे में कोई आता और आई. वी बैग में दो-तीन इंजेक्शन मार जाता। पता नहीं क्या दवाइयाँ भर जाते थे। दावा थी कि ज़हर, कुछ कह नहीं सकते। उनकी नियत देखकर यह ज़हर ही हो सकता है।

दूसरे दिन पुलिस और कमिश्नर साहब एक उमीद की किरण के तरह आए उसे देखने, पर वहाँ चौकीदारी कर रहे सुधीर के वफादारों ने उन्हें रोक दिया।

कुछ देर के बातबाती के बाद सुधीर वहाँ भागते हुए आया।

लगा कि वो बच गई।

सुधीर सहमा हुआ था जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो।

सुधीर और कमिश्नर साहब आमने सामने थे।
दोनों एक दूसरे की आँखों में आँखें डाल देख रहे थे।
वहाँ से उसके सारे पीछे पत्ते छट गये थे।

लगा दोनों में चिल्लम-चिल्ली और हंगामा होगा पर दोनों ने उनसे वही आँखों में बात की।

एक पलके यहाँ झपकी, दो पल्के वहाँ। एक ने नज़रे टेड़ी की तो दूसरे ने आँख मारी।
इनके सब सांकेतिक बातचीत के बीच कमिश्नर के आधे होंठ ऊपर हुए और सुधीर के सीने पर कुछ धमकाने की तरह इशारा कर वहाँ से चला गया।

सुधीर काफी देर तक मौन था।

उसके प्यादे सहमे थे।

तनाव में उसने सब को हाथ हिलाकर कुछ बोला और वो वहाँ से निकल गए।

सुधीर वही खड़ा, कमरे के सामने आगे-पीछे, गोल-गोल तेज़ गति में घूम रहा था।

कई चक्कर काटने के बाद वो अंदर आया और उसे लंबी देर तक यूँही टकटकी लगाए देखा।

कोई भाव नहीं।
ना दुश्मनी, ना मानवता, ना तरस।
देख, "तेरे पास खोने के लिए तेरे जान के अलावा कुछ नहीं पर मेरे पास यह पूरा हॉस्पिटल है... और मेरा बेटा भी।
अगर यही तेरी किस्मत, तो यही तेरी किस्मत।",
कह वो बाहर निकल गया।

उसके जाने के बाद उसने अपनी आँखें हल्की सी मिचकाई।
उस मिचकाई को देख मेरा दिल चहक उठा।
मैंने तुरंत उसे आवाज़ लगाई।
"महाशक्ति, क्या तुम मुझे सुन सकती हो?",

"ममममम....ममममम!....", हल्की सी कुछ आवाज़ आई तो मैंने फिर आवाज़ लगाई,
"महाशक्ति, क्या तुम मुझे सुन सकती हो?",

"ममम! मम!....ममममम!....", की हल्की आवाज़ आई।

देखने पर वो बाहर से बेहोश थी।

उसकी आँखें इधर-उधर भय में घूम रही थी।

तुरंत, "देखो महाशक्ति तुम्हें मुझसे बात करने के लिए मुँह से जवाब देने की ज़रूरत नहीं।"

उसने पलक झपकाई।

"मैं, मैं हिल क्यों नहीं पा रही? वृषा कहाँ है?",
अपने होंठ हिलने की कोशिश की। कोई आवाज़ नहीं।
वह पूरी तरह से घबराई हुई थी।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके साथ जो क्या रहा था।

मैंने ध्यान केंद्रित कर महाशक्ति की अव्यवस्थित चेतना में जाकर उससे बातचीत शुरू की।

"महाशक्ति?"

उसकी हालत और बिगड़ने लगी।
मशीनें आवाज़ करने लगी।

"महाशक्ति, महाशक्ति!", मैंने उसे फिर आवाज़ दी।

दर्द भरी पुकार ने मेरा सीना छलनी कर दिया।

"अभी नहीं, अभी नहीं। मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़ती हूँ। मैं महाशक्ति नहीं! मैं महाशक्ति नहीं जिसके साथ जुड़ना चाहिए था… मुझे छोड़ो, मुझे छोड़ो…"

उसने पीड़ा भरी स्वरों में रो-रोकर पूछा, "वृषा ने ऐसा क्यों किया? बस क्यों किया?",

वो अंदर से टूट रही थी पर बाहर से मृत जैसी शांत थी। आँखें भी बँद।

वो बिलखते हुए कवच को पूछ रही थी, "वृषा कहाँ है? उन्होंने मुझसे सच बोलने का वादा किया था। वृषा कहाँ है? वृषा कहाँ है?"

मुझसे उसकी यह दशा देखी नहीं जा रही थी। अगर वो सच्चाई चाहती है तो उसे सच्चाई मिलेगी।

"तुम्हें सच जानना है? हाँ? तुम्हें सच जानना है?",

"हाँ मुझे जानना है। जानना है कि मैं ही क्यों? हमेशा मैं ही क्यों?", उसने हताशा से पूछा,

"सब जानते हुए तुम्हें क्या जानना है? तुमने तो सब सुना है, अब और क्या जानना है?"

बँद आँखें से आँसू लगातार बह रहा था।

पूरी रात वो ऐसे ही रही।

दूसरे दिन दवाइयाँ, इंजेक्शन, रक्त परीक्षण में बीता।

आईवी में पहले के मुकाबले सतरंगी रंग के दवाएँ और मिलने लगे।
उन दवाइयों से उसके शरीर में असहनीय दर्द होने दर्द होने लगा। जगह-जगह नीले गाँठ बनने लगे।
हर एक दावा के बाद उसकी जहन जाँच होती।
डॉक्टर उसके आस-पास 'हार्ट रेट', 'स्टेबल', 'नेगेटिव प्रोग्रेस', जैसे शब्द खुसपुसाते सुना।

ऐसे ना जाने कितने दिन बीत गए।

सुधीर आधी रात को आता और उसे रात भर ऐसे ही देखता रहता।
वो सब बेहोश शरीर में कैद झेल रही थी।
डॉक्टर्स और नर्सेस से घिरी।

सब उस सफ़ेद कमरे जैसा बस इस बार सब बेटा करा रहा था।

शायद उसके ज़िंदा लाश बनने के सातवें दिन या आठवें दिन बाद सुधीर आधी रात में, जेब में हाथ रखे उसके कमरे में आकर टीवी चालू करता है।
टीवी चालू कर, उसकी तरफ़ पीठ कर टीवी देख रहा था।
टीवी से निकलने वाली नीली रोशनी पूरे कमरे में फैल गई, खासकर उस नीली रोशनी का शिकार वो थी।

इसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

उस दिन के बाद से उसने एक बार कुछ पूछने की कोशिश तक नहीं की। सब बस चुप-चाप झेल रही थी।

टीवी के चालू होते ही खुशियों भरी संगीत बजने लगती है। पूरा चालीस पचास इंच का टीवी एक नवजात बच्चे के फोटो से भर गई और रिपोर्टर्स और पैनलिस्ट बस एक दूसरे को बधाई दे रहे थे।

रिपोर्टर कह रही थी- "इतनी दुखो के पहाड़ को झेलने के बाद, अपनी बहन को अपनी नई जिंदगी के शुरू होने के चंद दिन पहले, अपनी शादी के कुछ ही दिनों पहले अगवा होने के बाद, टूटी सुहासिनी ने अपने परिवार को, अपने बूढ़े माता-पिता को संभाला। अपने छोटे भाई को एक सुरक्षित रास्ता दिखाया। एक पत्नी के सारी ज़िम्मेदारियाँ निभाई। एक कुशल बिजनेस्वमेन बन अपना परचम लहराया।
इतना कुछ, झेलने के बाद आखिरकार साहसी सुहासिनी और हर कदम पर उनका साथ दे रहे उनके पति शिवम रेड्डी के घर नए खुशियों का आगमन हुआ है। उनके घर, उस हादसे के तीन साल, तीन साल के बाद आज एक नई खुशी का माहौल आया है।"

हेडलाइंस- दुखो के अंबार से निकला रेड्डी परिवार। कब मिलेगी उनका खोया भाग?

ख़बर सुन हम दोनों को बड़ा झटका लगा।
"!तीन साल?!", मुझे बहुत बड़ा झटका लगा, "तीन साल कैसे बीत गए? आठ महीने समीर के सफ़ेद कोठरी में कैद, तीन महीनों का इलाज, पाँच महीने राहुल की मंगेतर और अब यहाँ।
कुल मिलाकर सोलह महीने होते है मतलब एक साल और चार महीने बीते है।

आज 2023 के नवंबर का कोई दिन होगा ज़्यादा से ज़्यादा, ऊपर नीचे कर। पर तीन साल कहाँ, कैसे गए?", मैं बौखला ही रही थी कि नीचे से आवाज़ आई,

"हमें पूरे होश में आए अरसा भी तो बीत गया है।"
लंबी, गहरी साँस लेने लगी।
कुछ सेकंड्स लेने के बाद उसने कड़वी हँसी हँस कर कहा, "मुझे मरे लगभग तीन साल हो गए है।", और कड़वी हँसी के बाद, "कोई भी गुमशुदा आदमी कुछ महीने बाद मृत घोषित कर दिया जाता है तो मुझे अपनी बरसी मनानी चाहिए। तीन साल पहले, इसी महीने के आस-पास तो मेरी चोरी हुई थी।

हा, हा, हा।

तीन साल तो तीन साल ही सही।
चलो आखिरकार उन्हें खुशी तो मिली।
अब सब ठीक रहेगा।"

" 'खुशी तो मिली' से तुम्हारा क्या मतलब है?", मैंने पूछा,
 
पर अपनी बात कह उसने वापस चुप्पी साध ली। 

उसकी बात में निराशा थी।

ख़बर सुनाने के बाद सुधीर ने टीवी बँद किया और असहज अभिव्यक्ति रख सावधानी पूर्वक उसकी तरफ चलकर आया।
पूरे वक्त उसका दायां हाथ उसकी दाईं तरफ़ की पॉकेट पर ही था।

संभलते हुए वो उसके पास गया। उसे सोता हुआ देख रहा था।

चेहरे में ऐसे भाव जैसे किसीने उसे रौंद दिया हो। इतना खुन्नस और बेदर्दी...

उसके खुन्नस से जी भर के देखने के बाद।
उसने अपना हाथ जेब से बाहर निकाला। गुलाबी, बैंगनी रंग के तरल पदार्थ से भरा इंजेक्शन, जो आपस में हिलने के बावज़ूद मिल ही नहीं रही थी।

उसने अपने हाथ बढ़ाया। उसके हाथ, हवा में लहराते सूखे पत्ते की तरह काँप रहे थे।

उसके चेहरे की अभिव्यक्ति और शरीर का चाल, सब एक दूसरे के विपरीत जा रहा था।

अपने काँपते हुए हाथों से उसके ऊपर से कंबल को ध्यान से हटाया, दाईं हाथ को संभालकर उसकी नसों को ढूँढा।
नस पकड़ाई में आने के बाद उसकी नज़र, बाहर की तरफ गई, दरवाज़े पर।

अपनी शरीर पर चल रहे इतने हलचल को महसूस वो भी सतर्क हो गई थी।

"धन्यवाद...", उसने भावनाओं भरे स्वर में कहा। जैसे अपनी अंतिम विदाई दे रही हो।

मैं तुरंत हड़बड़ाकर, "तुम्हारा मतलब क्या हैं?",
उसने फिर जवाब देना बंद कर दिया।
"रुको! इधर सुनो!",

मैं चिल्लाते रह गई और सुधीर ने अपने हाथ में इंजेक्शन थाम उसे शून्य अभिव्यक्ति से देखा।

उसे समझ आ गया।

मुझे समझ आ गया होने क्या वाला था।

समीर या उसके बेटे के आदेश पर, उसे ठिकाने पहुँचाने की साज़िश रची गई थीं।

जैसा दो साल पहले हुआ बिल्कुल वैसा बस यहाँ उसे बचाने वाला एक नहीं था। उम्मीद में भी नहीं।

कोई आपा खोए अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा था, कोई प्यार का दावा ठोक वापस आने का वादा कर गया था, और बाकी बचे, नए मेहमान की खुशी मन रहा था।

इसके पास कोई नहीं।

बस एक सीमित शक्ति के अलावा।

अभी नहीं!

सुधीर के हाथ और इंजेक्शन उसके नस तक पहुँचे।

उसके आँखों से आँसू के कुछ बूँद गिरे।

इतनी आसानी से?

"क्षमा…", सुधीर इंजेक्शन सेट करते हुए 
आत्मग्लानि से कहा।

इससे पहले मैं कुछ कह पाती, सुधीर और उसकी नहीं मिलने वाले दवाओं ने काम कर दिया।

बिना वक्त दिए। उसके नसों में बह रहा खून धीरे-धीरे गाढ़ा होने लगा।
गाढ़ा हुआ खून एक जगह गुट बनाकर जमकर दिमाग और दिल तक बहना बँद कर रहे थे।
दर्द से उसकी आँखें बाहर फट आई।

उसने साँस लेने ले लिये बहुत बड़ा मुँह खोला पर डॉक्टर सुधीर ने पहले ही ऑक्सीजन मास्क, और सारी अन्य मशीने, जो उससे जुड़ी थी सारी बँद कर निकालने लगा।
सुधीर उसपर एक तरस खाने के मूड में नहीं था।
वो उसकी आई वी ड्रिप को बेदर्दी से कठोर हाथों से खींचकर निकाला।
उसके नसों पर गहरा घाव तो हुआ था पर शरीर में बहता खून ही नहीं बचा था कि वो निकल पाए।
वो तड़पने की स्थिति में भी नहीं थी। मौत हर एक पल के साथ नज़दीक आ रही थी।

डॉक्टर सुधीर बस उसकी आखरी साँस का बेताबी से इंतज़ार कर रहा था।
उसके चेहरे में उतावलापन साफ़ झलक लग रहा था।वो बार-बार अपनी घड़ी देख रहा था।
यहाँ सिर्फ मौत ने ही इसपर करुणा बरसायी। मौत ने अपने अंधेरे चादर में उसे जितनी जल्दी हो सके अपने आलिंगन में लेने की तैयार था।
रहम उसमें थी बिना ज़्यादा वक्त लगाए, तड़पाए, मौत ने उसे हमेशा के लिए अपनी मीठी नींद से घेर लिया।
उसके गले और हाथ में रहे सारे रत्न, उसकी भविष्य की तरह अंधकार में समा गए।

यह आत्महत्या है!
आत्महत्या एक पाप है। सबसे बड़ा पाप है!
उठो! लड़ो!
लड़ो मारो!
मारो! मारो!
मारो!
मैं चिल्ला-चिल्लाकर यह सब कहना चाह रही थी पर मेरी… मेरी भी…मेरी भी चेतना धीरे-धीरे इस मीठी कभी ना ख़त्म होने वाली नींद में घुलने लगी।

यह नींद डरावनी और मीठी जुगलबंदी थी। मौत भी इस जिंदगी से काफी सुखद लग रही थी। विरोध के बावजूद में खुद को उस जन्नत में समाता देख पा रही थी।
शून्य में खोना।
मैंने उसे ढूँढ़ने के लिए अपनी नज़रे घुमाई पर महाशक्ति काफी पहले मेरे आँखों के सामने सो ओझल हो चुकी थी, पर उसकी ऊर्जा अब भी मेरे पास ही लग रही थी।
मैं थोड़े और दूर उसे ढूँढते हुए आगे बड़ी पर एक सफ़ेद चमकीली रोशनी ने मुझे अपने अंदर खींचकर नीचे पटक दिया।