स्वयंवधू - 68 Sayant द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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स्वयंवधू - 68

68. अलविदा वृषाली...


खून से लतपथ कमरे में दोनों लहू में रेम एक दूसरे के आलिंगन में पूरी दुनिया के सामने लाईव आ गए थे।


मीडिया की पूरी फ़ौज अपने कैमरों के साथ डॉक्टर सुधीर के केबिन में घुस आयी और हर एक पल को दुनिया भर में फैलाने लगी।

बीना एक सेकेंड गवाएं कवच फुर्ती में आ गया। अपने शरीर को चोट और दर्द के बावजूद अपने शरीर को कैमरे और उसके बीच रख दिया और उसे सोफे से सरकाकर नीचे छिपा दिया।

वो नीचे मुँह छुपाए दुबककर बैठ गई।

उसी चंद सेकेंडस में काले कपड़े पहने कुछ लोग उन्हें साफ करने लगे। और उनके कैमरों और ख़ुफ़िया यंत्र को भी।

कवच दर्द को झेलते हुए सोफे को पकड़कर उठा। उसने महाशक्ति से सिर को हल्के से थपकाकर फुसफुसाया, "यही रहो।"

कवच अंदर से कश्मकश में था।

वो सब सेट कर घूम ही रहा था कि उसे हाथापाई की आवाज़ सुनाई देने लगी।

"सर, आप मीडिया से है, इसका मतलब यह नहीं कि आप कुछ भी बोल दे!"

एक आदमी जो रिपोर्ट्स को बगल कर रहा था उसने एक रिपोर्टर की बात सुन गुस्से से आग बबूला हो गया।

रिपोर्टर ने टिप्पणी की, "बाप को मरता छोड़ यह रंगरेलिया मनाई जा रही है। क्या कहना है आपका इसमें वृषा बिजलानी? इतने वक़्त से कहाँ गुलचररे उड़ा रहे है?"

कवच के दूसरे आदमी ने उसे मारने के लिए हाथ उठाया।

सबकी साँसे रुक गई।

उस रिपोर्टर ने मंद-मंद जाशी भरी और डर का नकाब पहना।)

सब उसकी तरफ देखने थी।

कैमरो की नज़र उस पर थी।

एक इंच आगे और उसके लिए सब तबाह। पूरी दुनिया वृषा बिजलानी के खिलाफ हो जाते। कवच को तो फिर भी कुछ नहीं होता पर वो आदमी सलाखों के पीछे ही सड़ता।

पर उसे उसकी परवाह कहाँ थी उसे बस अपने बॉस को बचाना था।

उसका हाथ रिपोर्टर की तरफ़ उड़कर आ ही रहा था कि, "रुको कार्तिक!", कवच ने एक आवाज़ दी और उसका हाथ बीच हवा में रुक गया। ना चाहते हुए भी कवच के अंगरक्षक को उसे छोड़ना पड़ा और पीछे हटना पड़ा।

कवच पूरे मीडिया के सामने आया पर अपने पुराने अंदाज़ में।

अपना कठोर ठंडा अंदाज़।
पीठ सीधी, सीने चौड़े और आवाज़, ठंडकता और आदेशात्मक। उससे उलट जो वो अभी था।

पूरे मीडिया वाले कवच का क्लोजअप ले रहे थे, पीछे पड़े खून और चमड़े के साथ। कवच ने पीछे मुड़कर देखा और अपना हाथ सिर पर मारा, "बस पाँच प्रश्न, उसे एक भी ज़्यादा नहीं।"

कवच की बयान सुन सब स्तब्ध रह गए।

कवच ने सन्नाटा सुन फिर सिर पर हाथ मारा, (मेरी बोली भी उसकी तरह हो गई है।)

कवच ने टेडी नज़र से सोफे की तरफ देखा।

वो सोफे के पीछे से सब सुन रही थी।

"आई एम सॉरी। बट-",
सबने अपना माइक कवच के मुँह से चिपका दिया।

तभी डॉक्टर सुधीर वहाँ अपने डॉक्टरों और सिक्योरिटी की टोली ले वहाँ आ पहुँचे।
उसी वक्त पुलिस का जत्था भी वहाँ आ धमका।

"मुझे खेद है पर आप सभी को जाना होगा।", मीडिया के सभी लोगों ने अपना माइक डॉक्टर सुधीर के मुँह में घुसाकर पूछने लगे,

रिपोर्टर एक: सूत्रों से पता चला है कि समीर बिजलानी सर और वृषा सर दोनों यहाँ सड़क हादसे के कारण भर्ती हुए है पर यहाँ-

उसे टोककर, डॉ. सुधीर: इस बारे में हम अभी कुछ नहीं कह सकते। पुलिस जाँच कर रही है।

रिपोर्टर दो: इस चमड़े और इतने सारे खून के बारे आपका क्या कहना है?

उसी समय उस क्षेत्र के कमिश्नर साहब भी वहाँ पहुँचे।

उन्होंने मीडिया को बस दो शब्द कहे।

क्या?

पता नहीं।

पर उनके एक बयान के बाद वहाँ से वो लोग इतनी शांति से गए, जैसे आंधी के बाद तूफ़ान।

कमिश्नर साहब खुद कवच से मिलने आए।

कवच उनके साथ गया।
और पीछे डॉ. सुधीर महाशक्ति को रास्ता साफ़ होने के बाद अपने साथ लेकर गया।

वहाँ जितना हो सकता लोग वही बिजनेस, दफा नुकसान की बात कर रहे होंगे और यहाँ, उसे, बाजू के कमरे में ज़बरदस्ती, उसके मर्ज़ी के बिना नींद का इंजेक्शन दे सुला दिया गया।

वो बिना परिस्थिति जाने चिंतित अभिव्यक्ति लिए थी।

उसका लॉकेट उसके गले में था।

पता नहीं कब कवच ने उसे लॉकेट पहना दिया?

मुझे भी पता नहीं चला।

जो भी हो—

कमिश्नर के आते ही सारी चीज़ें जैसे थम गई।

पूरे हॉस्पिटल में सब शांत था और कवच भी। कवच इससे मिलने आधे सेकेंड के लिए भी नहीं आया।

चार दिन बीत गए लेकिन कवच का नामोनिशान कही नहीं था।

दिन-ब-दिन डॉ. सुधीर के निगरानी में उसकी हालत बिगड़ती ही जा रही थीं।

पता नहीं वो उसे क्या अनाब-शनाब देने लगा कि वो चार दिन बीत गए।
चार दिन बीत जाने के बाद भी वो एक बार भी होश में नहीं आई।

बस असंतुलित साँसे और गहरी नींद में सिर्फ 'मम्म', 'डै' कर रही थी और 'कान्हा' का नाम पुकारना।

अच्छी ख़ासी मेरी शक्ति, जिसे मैं धीरे-धीरे सुधार ही रही थी कि कवच, जिसका काम था अपनी शक्ति और नियति कि रक्षा करना उसने फिर छोड़ गया!

कवच का कहना था कि वो असली महाशक्ति नहीं है बस अपनी बहन की जगह एक मोहरा बनने के लिए लाई गई थी।
उसने ही कहा था कि महाशक्ति एक ऊर्जावान, सृजन की शक्ति रखने वाली महिला ही बन सकती है। उसके जैसे कमज़ोर आत्मसम्मान और खुद पर विश्वास वाली, कभी नहीं बन सकती।

कठोर पर सत्य।

पर मैंने दुनिया देखी है, लोगों को नसों से जाना है, पहचाना है और जिया है। एक बार समीर नाम का काँटा उनकी रास्ता से हट जाए तो इसे भी रास्ते से उखाड़ कर फेंक देंगे।

महाशक्ति की चेतना पर बैठे सोचते हुए...
इसलिए कही वो इससे ठिकाने तो नहीं लगाना चाहता?

नहीं, नहीं! मुझे अपने शक्तियों पर अविश्वास नहीं करना चाहिए।

कवच की हरकत देखकर लगता नहीं वो उसपर खरोंच भी देख सकता है पर उसकी हरकते और हालात देख कुछ और ही लगता है।

पर लोग नियत का सर्टिफिकेट लेकर नहीं घूमते।

फू…

गहरी साँस ले।

मन शांत कर, मैंने सही गलत पर महाशक्ति की चेतना पर बैठकर इन चारों दिनों में सब देखा और गहन विचार-विमर्ष किया। और इस नतीजे में पहुँची की,

मेरी मज़बूरी नहीं है यह, सुहासिनी और राज महाशक्ति और कवच बनने से कुछ अलग नहीं होता। चीज़ें और अत्यधिक आसान और स्पष्ट होगी और पूर्व कवच भी सहयोग रहेगा।

यह सबसे उचित उपाय लगता है,

कवच- वृषा बिजलानी है! और,
महाशक्ति- वृषाली राय!!

सत्य यही है कि मैं इस बच्ची से जुड़ चुकी हूँ।

मेरा कोई शारीरिक अस्तित्व नहीं है पर में इसके अंदर की गर्माहट को महसूस कर सकती हूँ जो इसके नीचे दबा हुआ है।

महाशक्ति भले ही सुहासिनी बेहतर हो सकती है पर मेरा, इस परम शक्ति का जुड़ाव इसके साथ बँध चुका है।

सुहासिनी के साथ अन्याय हो सकता है पर योग्यता इसमें भी है। हमेशा बड़े ही काबिल नहीं होते और छोटे धुरंधर। लोग यह भूल जाते है, ज़्यादातर शांत दिखने वाली पानी ही जान लेता है।

मेरा दाँव यही है।

महाशक्ति बनने के पहले अगर यह नहीं बची तो, इस दुनिया में शक्ति का अंश भी नहीं बचेगी। यह पूरा दक्षिण भाग और भू मध्य भाग मेरे जाने से वापस उसी परिस्थिति में पहुँच जाएगा जैसे सदियों पहले था। शायद पूरी दुनिया...

मेरे अस्तित्व में आने से पहले।

"...कान्...", नीचे शारीरिक रूप से कैद महाशक्ति ने दर्द में पिछले दस मिनिट में पता कितनी बार कान्हा का नाम ले लिया होगा।

मुझसे रुक नहीं गया।

अगर, भेदभाव करना है तो सही से करो।

यही रहेगी मेरी महाशक्ति।

मैंने,जोश में, मेरी ऊर्जा का एक छोटा भाग उस रत्न से निकलकर उसके अंदर, उसके मांसपेशियों में डाल दिया जो उसकी रक्षा करेगा जब तक उन्हें उसके गर्दन का राज़ ना पता चल जाए जिसे लेकर डॉक्टर सुधीर भी आसक्त है। 

मैं शांत हो ही रही थी कि लंबी कद-काठी वाला, नर्स के कपड़े पहने चुपके से, दबे पाँव अंदर आया।

उसके पैर सीधा महाशक्ति के बिस्तर के पास जाकर रुकें। कमरा पूरा अंधेरे से भरा हुआ था। मैंने उसे ध्यान से नहीं देखा। लगा कोई दूसरी दवाई लेकर आए होंगे।
पर उसकी हाथों में कुछ नहीं था।
कवच होगा लगा अलग भेष में।
उसकी कद-काठी कवच जैसी थी। वही लंबा चौड़ा था पर कवच जैसा नहीं और उसकी ऊर्जा भी अलग थी। कवच सी नहीं थी। मेरा ध्यान उसपर गया। उसका पूरा चेहरा सफ़ेद मास्क से ढका हुआ था।

वो खड़ा हो बस उसे देख ही रहा था। कई मिनट तक उसे देखता रहा। मुझे यह ठीक नहीं लग रहा था पर उसकी अंगूठी बिल्कुल शांत था जोकि नहीं होना था। जब भी कोई शक्ति अगर मुसीबत में हो तो, रत्न के काला होने के कारण उसकी अर्धांग या अर्धांगिनी को पता चल जाना चाहिए पर यहाँ ऐसा क्यों नहीं हो रहा था, मुझे समझ नहीं आ रहा था। यह आदमी खतरा है या चेतावनी, पता नहीं पर इतना पता है कि मुझे ही इसे बचाना होगा।

मैंने उसकी चेतना से कवच की चेतना में कूदी।

हाँ, मैं अब चाहूँ आ जा सकती हूँ उस जंगल की रात के बाद। बस कुछ वक्त के लिए।
समीर के उस रक्त मिश्रित पुष्पीय रस में कुछ तो ऐसा था जिसने मेरे अंदर की सहस्त्र वर्षों की कैद शक्तियों को भी महाशक्ति और उसके कवच से छिपाकर रखा है। छोटे में कहुँ तो, मेरी शक्तियाँ सीमित में और सीमित हो गई।
मैं जैसे कवच की चेतना में पहुँचकर उसे आगाह करने जा ही रही थी कि मेरे सामने वही दृश्य था जो में छोड़कर गई– अब कम अंधेरा कमरा, नकाबपोश सामने, वो तकलीफ़ में रोती सोती हुई।

कवच ने बिना एक सेकेंड लगाए उसे गर्दन से पकड़ा और बाहर खींच ले गया पर मैं पीछे रह गईं उसके स्पर्श मात्रा से में कवच के अंतर्मन से निकालकर बाहर फेंकी गई।

वो समीर था!

...या उसका अंश?

पर वो यहाँ कैसे? महाशक्ति के हाथों को काबू कर मैंने ही एक्सीडेंट के पहले उसके अंगों को बेकार कर दिये थे जिससे वो खुद को बचा ना सके।

फिर यह? कुछ तो गड़बड़ है? कुछ तो गड़बड़ है! कुछ तो गड़बड़ है!

कही समीर ने प्राण शक्ति के साथ अपना अंश तो उस आदमी में समा तो नहीं लिया?

नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।

बिना मेरी मर्ज़ी के, महाशक्ति भी ऐसा कभी कर ही नहीं सकती।

सब काफी उलझा हुआ था।

मेरा सिर इतना चकरा रहा था कि मैं वापस उसकी चित्त पर बैठ गई।

यहाँ कुछ तो ऊँच-नीच थी।

समीर जैसी ऊर्जा और शरीर किसी और का?

तभी कवच, लाल सना हाथ लेकर अंदर आया।

उसके कपड़ों पर लाल छिटे थे।

ज़रूर खून था।

कवच ने अपने हाथ अपने रुमाल में पोंछकर महाशक्ति के पास टूटे अभिव्यक्ति के साथ गया।

वो अब भी अस्पताल के कपड़ों में था।

उसे दर्द में तड़पता देख वो और टूट गया।

उसकी आँखें नम थे और स्वर, टूटे, "सॉरी बच्चे, सॉरी। मैं फिर अपना वादा तोड़ रहा हूँ।

तुम्हें वापस इन दरिन्दों के साथ छोड़कर जा रहा हूँ।",

उसने महाशक्ति का हाथ कसके पकड़ लिया जैसे वो उसे छोड़ना नहीं चाहता था।

"पर चिंता मत करो। इस बार मैंने काफी तैयारी की है और तुम्हें सुरक्षित रखने का एक ही रास्ता है बच्चे, समीर के जड़ों को काटना।

उसके एक्सीडेंट की खबर पूरे देश-विदेश में फैल गई है।

लोगों का शक तुमपर है।

प्रजापति ने भी अपने गंदे खेल शुरू कर दिए है। मेरे पास रुककर सब बताने का वक्त नहीं है।

मुझे अभी, इसी वक्त निकलना होगा और पता नहीं कब मैं तुम्हें वापस देख पाऊँगा? पाऊँगा की भी नहीं, पता नहीं।"

उसके हाथ को प्रेमभरे होठों से चूमकर,

"बस तुम सुरक्षित रहो। हँसती मुस्कुराती रहो।

मैं तुम्हें, तुमसे छीनी गई ज़िंदगी वापस लौटकर रहूँगा। धीरज रखना बस बच्चे।"

पता नहीं क्या हुआ पर कवच के कुछ शब्द से उसके शरीर ने खुद को ढीला छोड़ दिया और एक मुस्कान धारण कर सोती रही।

उसे जी भर के निहारते हुए कवच एक पल के लिए उसमें खो गया।

आँखों में उसे छोड़कर जाने का दर्द साफ़ झलक रहा था।
हाथ उसका साथ छोड़ना नहीं चाहता था।
उसे बताना था कि वो उससे कितना प्यार करता है और उस पर अपना सब कुछ लूटना चाहता था।
उसकी ज़िंदगी एक हसीन सपने जैसे मीठी करना चाहता था पर सच्चाई हमेशा सपने से अलग ही होती है।

कवच के अभी की सच्चाई थी कड़वी अलगाव।
जो ना जाने कितने साल बाद रुकेगा।

कवच के आँखों से उसके दर्द के दो बूँद उसके गालों पर जा ठहरे।

कवच ने कोमलता से अपने आँसू पोंछे और सच का स्वीकार करते हुए अपनी अंतिम सफ़ाई खाली कमरे में कहा जहाँ सुनने वाला कोई नहीं था,

"वो प्रजापति भी मौके का फायदा उठा ज़रूर तुम मासूम पर हाथ शतप्रतिशत आज़माना चाहेगा।

इसलिए मैं, मेरी शक्ति का एक अंश, मेरा एक अंश मैं तुम्हें देकर जा रहा हूँ।
मेरी गैरहाज़िरी में यह तुम्हें सुरक्षित रखेगा।
कोई भी तुम्हारे साथ वैसी बत्तमीज़ी करने की सोच भी नहीं पाएगा।
और अगर गलती से भी कोशिश करेगा तो उसका वो भाग विकलांग हो जाएगा।"

कवच की नज़र उस रहस्यमई चोट पर गया।

उसकी गर्दन में स्थित वो चोट उसे अंदर से अंदर खाए जा रही थी।

कवच का हाथ वहाँ गया।

(वृषाली को दर्द हुआ पर था पर जानना होगा कि यहाँ है क्या? इसमें मुझे, मेरी और समीर की शक्ति का अंश महसूस हुआ। सवाल बहुत है और जवाब दफ़न।)

कवच ने उसे हल्का छू अपना हाथ वापस लिया।

कवच की नज़रे उसपर से हट ही नहीं रही थी।

उसका जी घबरा रहा था।

उसके बिना वो कैसे सुरक्षित रहेगी?

उन भेड़ियों से बच पाएगी?

बच पाएगी, पर कब तक?

(प्रजापति, और कपूत मेरी सबसे बड़ी चिंता है।)

उसने चिंता के बीच उसने पिछले कवच, ज़ंजीर का लॉकेट महाशक्ति के हाथ में एक ब्रेसलेट की तरह बाँध दिया।

"तुम्हें पता है वृषाली, मेरा मतलब मीरा।", कवच ने हँसकर कहने की कोशिश की, पर कह नहीं पाया।

उसका गला भर हुआ था।
तन झुका हुआ था।
कंधे बोझ तले दबे हुए थे।
आँखें सुकून ढूँढ़ रही थी,
और दिल, उसे।

जो बेहोश फिर बिना सच जाने दर्द के गोद में सो रही थी।

उसने उसका हाथ प्रेम से पकड़ा।

थोड़ी हिम्मत जुटाई, और उसके हाथ में रखी रत्न की प्रेमपूर्वक चूमा।

यही उम्मीद में कि मैं सच जानते हुए भी उसकी रक्षा करूँ।

कवच, अंगूठी पर हाथ फेर अपनी ऊर्जा इक्ट्ठा कर महाशक्ति पर एक सुरक्षा घेरा डालने पर केंद्रित करने लगा।

थोड़ी देर में एक पतली पीली परत दर्द से ग्रसित महाशक्ति पर आ गया।

चक्र की तरह उसके ऊपर घूमते-घूमते उसमें समा गया।

कवच ने शांति की साँस ली।

(कुछ वक्त के लिए तो यह सुरक्षित है। सरयू बाकि देख लेगा।)

कवच अपना काम कर धीरे से उसका हाथ छोड़ उठ ही रहा था कि उसके हाथों ने हिलने से मना कर दिया।

कवच का दिल दर्द से कराह उठा। वो उसे छोड़कर, जाना नहीं चाहता था।

वो कुछ बोलने लायक नहीं बचा। कब वो उसकी ज़िंदगी बन गई, दोनों को नहीं पता।

कवच जाना नहीं चाहता था पर हालात की मज़बूरी थी।

उसने महाशक्ति के ठोड़ी को प्रेम से पकड़ा और जाने से पहले आखरी बार स्वार्थी तो स्वार्थी बन ही सही, अपनी दिल को सहारा देने के लिए उसकी होठों से होठ मिलाकर एक दंपत्ति की तरह वापस मिलने का वादा कर निकला।

(मैं वापस जल्द ही आऊँगा।)

इस बार वो पीछे नहीं मुड़ा और सिर झुकाए सीधे कमरे से बाहर निकल गया। यह आखरी बार था जब मैंने उसे देखा।

कवच वापस फिर कभी नहीं आया।