स्वयंवधू - 67 Sayant द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

स्वयंवधू - 67

67. हमारा इतिहास भाग 2


(अभी …हाह… क्यों? …अभी क्यों?…)
महाशक्ति डर से अपनी साँस खोते हुए रही थी।

कवच हिचक में मुट्ठी बाँध खड़ा था।

उसके पास सोचने का वक्त नहीं था।
उसे बस एक्शन लेना था।

(इसका रास्ता है सच्चाई। सच बोल दो कवच।)

मेरी आकाशवाणी कवच के कानों से होते हुए उसके नस-नस में घुस गई।

अपनी हिचक की मुट्ठी छोड़,
"मैंने तुम्हें कभी काम की नज़रों से नहीं देखा वृषाली।"
कवच ने धीमी पर दृढ़ स्वर से बोला।

महाशक्ति ने उसे कठिनाई से साँस लेते हुए देखा।

मेरा यही काम है, अपने भूले-भटके शक्तियों को लाइन पे लाना।

वो धीमे-धीमे अपनी शक्ति की तरफ सच्चे दिल से चल रहा था, "हाँ वृषाली, मैंने कभी भी तुम्हें काम या मोह के आवेश में आकर ना देखा और ना दूसरे को देखते हुए बर्दाश्त कर सकता हूँ।"

महाशक्ति साँस लेने में तकलीफ़ होने के बावजूद उसे नम आँखों से देखती रही।

कवच ने उसके ठुड्ढी को कोमलता से पकड़ा, "नहीं पता कबसे पर मेरी यह भावना इन आवेशों में नहीं बना है, बल्कि सम्मान, साथ और भरोसे पर बना है।"

उसने उन्हीं नम आँखों से कवच को देखा और उसकी हाथों को।

कवच ने शांति की साँस ली। उसे लगा कि वो उसे माफ़ कर रही थी। तभी महाशक्ति की अभिव्यक्ति बदल गई और कवच के हाथ को धक्का मारकर गुस्से से अपनी अटकती साँस को संभालते हुए, "हाथ मत लगाना मुझे!"

गुस्से से टेबल पर हाथ पटककर अपनी ऊँगली पर लगी अँगूठी और लॉकेट दिखाते हुए, "इसीलिए बिना मेरी इजाज़त के अँगूठी और लॉकेट पहनाकर आपने मुझे अपने अधीन कर लिया ताकि मैं कभी आपकी चंगुल से भाग ना पाऊँ? हा-हाह… हाँ!?", अपनी साँस को काबू में करते हुए,

"आपकी चिकनीचुपडी बातों पर अब! और मैं बिना सच्चाई जाने विश्वास नहीं करने वाली। मैं शराफ़त से पूछ रही हूँ मिस्टर वृषा बिजलानी मुझे यहाँ लाने का असली कारण!"

कवच उसे ऐसे साँस लेते तड़पता देख मज़बूरी में अपनी आँखों को भींचा,
(उसे खुद इलाज़ की बहुत ज़रूरत है पर बिना सच सुने, बिना जवाब के वो किसीको अपने नाखून भी छूने नहीं देगी।)

(मर जाऊँगी पर इस बार जवाब सुने बिना नहीं मानूँगी।)
महाशक्ति ने दिल में सोचा।

कवच सब समझ उसके सामने घुटनों के बल बैठकर अपनी तरफ की बात बतानी शुरू की।

"यह सब 2018 में शुरू हुआ था और इसका कारण तुम्हारी बड़ी दीदी सुहासिनी है। उसी के कारण तुम आज यहाँ इस हालत में हो।"

"क्या?!", महाशक्ति को धक्का लगा।

"हाँ, इसका कारण सुहासिनी राय, तुम्हारी बड़ी बहन है। जिसे यहाँ असल में महाशक्ति बनना था और इस ज़िम्मेदारी को निभाना था।"

महाशक्ति कवच को अचंभे उसे बस सुन रही थी।

"जब शिवम ने मुझे उससे पहली बार अपनी गर्लफ्रेंड के तौर से मिलवाया था तभी मैं उसके अंदर छिपी ताकतवर शक्ति को पहचान गया था।
सुहासिनी राय, आखरी पाँचवीं परिवार की सदस्या है और इस पीढ़ी की महाशक्ति।
पर मेरे अलावा यह बात और एक इंसान जनता था, और वो था राज। असली शक्ति ही उसकी ऊर्जा की ताप को समझ सकते थे।",

महाशक्ति कहूँ या गलत महाशक्ति, जो भी हो वो बातों की गंभीरता समझ सब सुन रही थी। पर,

उसके आँख में आँसू थे यह जानकार कि यह सब, कवच अब तक जो भी कर रहा था वो उसके लिए नहीं बल्कि उसकी बड़ी बहन को बचाने के लिए कर रहा था।

(यहाँ भी दूसरी।)

उसने अपने सीने को कसकर पकड़ा।

साँसे तेज़ थी पर अब ना रोने की कोशिश में।

कवच को उसकी चिंता हुई।

महाशक्ति ने उसे हाथ हिलाकर उसे आगे बोलने का इशारा किया।

कवच ने सौम्यता से सारी बातें बताना जारी रखा, "दरअसल, रेड्डी परिवार की फैमिली डायनामिक्स थोड़ी अलग है जो मैं तुम्हें अभी नहीं बता सकता पर इतना ज़रूर है कि राज, तुम्हारे अनुमानुसार बड़ा है और उसे पता था कि सुहासिनी एक महाशक्ति की बड़ी दावेदार है या वो ही महाशक्ति है।"

वृषाली ने काँपती आवाज से पूछा, "तो दी को महाशक्ति बना देते। महाशक्ति से बड़ा और ताकतवर तो कोई और हो ही नहीं सकता। दी महाशक्ति और जीजू कवच।"

कवच ने दर्द भरी मुस्कान दी, "क्योंकि शिवम कवच नहीं है। सुहासिनी का असली कवच राज था पर समीर के महत्वाकांक्षा के कारण मैं बना।
गुस्सा,
अपने भाई के लिए प्यार,
और उसे महाशक्ति होने का असली मतलब पता था इसलिए वो तुम्हें ढूँढ रहा था।
तुम्हें ढूँढ रहा था ताकि सुहासिनी के पहले तुम्हें यह लॉकेट पहना दे और उसके छोटे भाई की भार्या बच जाए इन दरिंदगी से।",

कवच उसके उलझे चेहरे को देख रहा था।
"तुम्हें सब तभी समझ आएगा जब मैं सारा इतिहास तुम्हारे साथ साझा करूँगा। क्या मुझे इजाज़त है?", कवच ने धीरे से हाथ आगे बढ़ाकर पूछा।

(दूसरी तो दूसरी ही सही। ना मेरी शक्ति, ना मेरी ज़िम्मेदारी!)
उसने आँसू पोंछते हुए धीरे से हाँ में सिर हिलाया और कॉफी टेबल पर हाथ थपथपाकर उसे वापस ऊपर बैठने का इशारा किया।

कवच घुटने पकड़कर उठा और उसके सामने उसे निहारते हुए बैठा।

महाशक्ति के चेहरे पर एक ठहराव या ठहराव का मुखौटा था जो कवच को सच्ची हिम्मत दे रहा था।

महाशक्ति ने कवच को अगल-बगल दिखाकर पूछा, "हम एक्सीडेंट के केस में यहाँ भर्ती हुए है। क्या हम इतनी देर, इतने कांडो के बाद बात कर सकते है?"

खून भरे कमरे को दरकिनार कर।

"चिंता मत करो। कोई ज़ुर्रत नहीं करेगा।", कह उसने अपनी कहानी जारी रखी।

"तो?", उसने कवच को जारी रखने का इशारा दिया।

"कवच और महाशक्ति एक ही साथ नहीं बने।

वो दोनों वक्त की मज़बूरी में अलग-अलग बनाए गए थे।

एक शक्तियों को बचाने के लिए और दूसरा उसी शक्ति को बचाने वाले के लिए।

हमारे पूर्वजों को अपनी घटती शक्ति के त्रासदी में ऐसी चीज़ की ज़रूरत थी जो उनकी ज़ाया जाती शक्तियों का संग्रह कर सके और आगे आने वाली पीढ़ी तक पहुँचा सके।

इसलिए जब भी वो एक छत के नीचे आते इसी की बात करते।

तुम्हारे पूर्वज यानि राय परिवार के मुखिया ने ऐसे ही एक मुलाकात के दौरान यह दवा किया था वो सबकी परेशानी का हल निकल सकते है।
हल, हल थी स्त्रियाँ।"

"स्त्रियाँ?", 'स्त्रियाँ' सुन वो सीधी बैठ गई।

"उनका कहना था कि अगर हम, शक्तियाँ अपने रत्न का प्रयोग कर ही अपने अंदर की शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते है तो उसका उपयोग कर अन्य शक्तियों की शक्ति को सोखकर रख सकते है।
खासकर स्त्री, क्योंकि स्त्री में ही सृजन की शक्ति होती है और उनसे ही उत्तराधिकारियों को अपनी शक्ति मिलती है।

राय मुखिया का मानना था कि वो ही सारी शक्तियों को सोखकर संजोकर रख सकती थी।

उनके अलावा कोई नहीं!

सब उनकी बात से सहमत थे।

पर ज़ंजीर मुखिया और खुराना मुखिया इससे खुश नहीं थे। उनकी बचाई हुई शक्ति उस शक्ति के साथ खत्म हो जाए, यह उन्हें गवारा नहीं था। वो चाहते थे कि उनकी शक्ति ऐसे ही ज़ाया ना जाए उनके बच्चों, उनकी आगे की पीढ़ी तक उनकी विरासत बन आगे बढ़ती जाए।"

उसने अविश्वास के साथ कहा, "गाँव बसा नहीं लूटाने कि तैयारी शुरू! गजब कांडी थे हमारे पूर्वज।
वो लोग जिन्हें अपनी शक्तियाँ इतनी प्यारी थी तो अपने परिवार में एक बंदे को पकड़ते और उसमें अपनी सारी ऊर्जा डाल देते तो सस्ते में काम नहीं निपट जाता? हर परिवार का अपना खज़ाना।", महाशक्ति ने तंस कसा।

"कांडी तो थे पर ज़रूरत से अधिक आशावादी भी थे। इसलिए मेरे पूर्वज ने सुझाव दिया कि, जैसे यह लॉकेट है जो पैदा होते साथ ही हमारी शक्ति को अपने अंदर सोख इस्तेमाल करने योग्य बनता है।
बता दूँ कि उसके बिना हम शिशु अवस्था में ही क्षमता से अत्यधिक शक्ति के कारण अंदर से जलकर खत्म हो सकते है।"

"मतलब शक्ति जितनी पैदा होते समय होती उतनी ही बड़े होते वक्त होती? पर हमलोग तो उसके बिना भी ज़िंदा है। और आपके अनुसार दी महाशक्ति है तो वो कैसे जली नहीं?
महाशक्ति तो सबसे बड़ी ऊर्जा है, उससे ज़्यादा ऊर्जा हम सबको मिलकर भी नहीं बनती तो..."

गहरी साँस ले, "तुम तीनों अलग प्रजाति हो! ऐसा मैं कहना चाहता था पर महाशक्ति सिर्फ एक खोल है, ऊर्जा नहीं। और हज़ारवी पीढ़ी आते-आते हमारी शक्तियों इतनी कमज़ोर हो गई कि बिना इन सबके भी साधारण ज़िंदगी जी सकते–",
कवच बोल ही रहा था कि उसे समुद्र के किनारे हुई उनकी बात याद आई।
दोनों के बीच पर हुई बात को याद करते हुए उसने महाशक्ति से पूछा, "याद है वृष-मीरा उस दिन बीच में, समुद्र के किनारे तुमने कहा था कि बचपन से ही तुम बीमार रहती थी कुछ भी भरी या हल्का मसाला भी नहीं खा पाती थी और तुम्हारी एलर्जीस। बदन ऐसा जैसे ज्वालामुखी पीला दिया हो?",

"…हाँ…?", उसने हिचकिचाते हुए उत्तर दिया।

"और पहली बार किडनैप होने के बाद अचानक से तुम ठीक होने लगी?", कवच अपना दिमाग दौड़ते हुए पूछा,

हाँ में हाँ मिलाकर, "सही कहा आपने।"

फिर...फटी आँखों से, "किडनैपिंग? नहीं यह...", कह उसने अँगूठी को अविश्वास से देखा, "वृषा यह इस अँगूठी को पहनने के बाद हुआ है।
उसे पहनने के बाद! मुझमें अचानक ऊर्जा आ गई, मैं जल्दी उठने लगी, देर रात तक एक आम आदमी की तरह आपके साथ बिना बीमार हुए काम कर पा रही थी। मैं, मैं सामान्य हो रही थी!"

कवच ठुड्ढी पर सोचते हुए हाथ रखकर दिल में सोचा,
(उसी वक्त से मेरी तबियत भी सुधारने लगी थी। मुझे लगा था दवाईयाँ आखिरकार काम कर रही थी।) महाशक्ति को देख (मेरी सुधरती सेहत का कारण यह भी ही सकती है।
सुहासिनी है कि यह?
अगर सुहासिनी ही होगी तो अब इसका क्या?
शिवम का क्या?
वो मेरे लिए बहन समान है।)

"कभी सुहासिनी और विरासत ने कभी ऐसे लक्षण दिखाए?", कवच ने प्रश्न किया,

ना बोलते हुए, "एक बार भी नहीं। शायद वो अंदर से ताकतवर होंगे इसलिए?",

"हो सकता है। हमारे पूर्वजों को भी उन्हीं के तरह शक्ति चाहिए होगी जो अंदर से बाहर, दोनों तरफ से मज़बूत हो और सृजन की शक्ति रखती हो। जो इस मामले में सुहासिनी ही हो सकती है।

तो हम कहाँ थे?", कवच सोचा रहा था।

महाशक्ति ने याद दिलाते हुए दबी आवाज़ में कहा, "शक्ति सोखनी वाली बात।"

"थैंक्स, तुम्हारे परिवार, राय मुखिया के कहने पर क्षेत्रिय परिवार के मुखिया ने सारी शक्तियों को इक्ट्ठा किया था।

अपनी कल्पना को उन्होंने सभी को चमकाके दिखाई जैसे यह ही इनकी अस्तित्व तो बचा सकती है और उसे सम्मानित दिखाने के लिए महाशक्ति कहलाने लगे। सभी को लगा यह सुरक्षित और सराहनीय कार्य है इसलिए जब राय मुखिया ने अपनी कुशल सोलह साल की बड़ी बेटी आगे किया था तब सभी ने खुद को आगे किया पर अंत में वो ही चुनी गई।

उनकी थ्योरी यह थी कि महाशक्ति के अंदर हर एक परिवार के सदस्यों की शक्तियों का अंश डालकर आगे की पीढ़ी के लिए महाशक्ति तैयार कर दे। चलती फिरती शक्ति का भंडार, जो उनकी शक्तियों को संजोकर ज़रूरत आने पर उसका इस्तेमाल कर सके।

सबसे पहले हर परिवार के मुखियों ने अपनी ऊर्जा, अपनी शक्तियों को उनकी चुनी हुई महाशक्ति में डाला फिर सारी स्त्रियों ने, फिर दूसरी पीढ़ी और पिछली पीढ़ी ने। तीनों पीढ़ियों ने अपनी शक्तियाँ एक-एक उसमें एक साथ डाल दी।

सब संतुष्ट, सब गौरवान्वित महसूस कर रहे थे। सबको लगा कि उनका सुनहरा इतिहास वापस जागृत होने वाला है।
उन्हें चमत्कार की उम्मीद थी।"

महाशक्ति सब ध्यानपूर्वक बिना अपने अंग हिलाये बड़े ध्यान से सुन रही थीं। उसे चमत्कार और उम्मीद की उम्मीद थी।

कवच अपनी कहानी जारी रखा था, "पर उसका असर चमत्कारी नहीं था।
नाना प्रकार की शक्तियाँ, उनकी ऊष्मा, उनकी ऊर्जा वो बच्ची संभाल नहीं पाई। शक्तियाँ सोखने के कुछ ही पल वो चक्कर खा नीचे गिर पड़ी और दो घंटे में ही खून की उल्टियों पर उल्टियाँ कर वही अंदर से उन ऊष्मा से जलकर तड़प-तड़पकर खत्म हो गई।

राय परिवार और खुराना परिवार उन्हें बचाने के लिए कूदा पर बस उनकी मौत का दर्दनाक मंज़र देख सकते थे।

उस किताब में लिखा था, उनके होंठ, उसकी जिह्वा, उनके गले, अंदर से बाहर तक सब जल चुका था।"

महाशक्ति की आँखें खौफ़ से फट चुकी थी। डर से वो अजीब सी हो गई थी।

कवच भी अजीब हो गया था। बिल्कुल अपराधबोध, "शुक्र बस इतना है कि खुराना मुखिया के अनुसार, दर्द समझने के पहले ही उनके अंगों ने महसूस करना बँद कर दिया था।

जब उन्होंने उनके शरीर की जाँच की तो वो इतनी सारी अलग-अलग ऊष्मा और ऊर्जा की गर्मी से वो अंदर से जलकर खत्म हो गई।"

महाशक्ति ने शांति की गहरी साँस ली।

कवच कड़वी हँसी हँस, "किताब में यह भी लिखा था कि उनकी मौत काफी दर्दनाक थी। राय मुखिया का कहना था कि शुरुआत से ही वो ऊष्मा की तपिश में जल रही थी पर किसीने उसपर ध्यान नहीं दिया।"

"क्या?!", उसने उस लॉकेट को सिहर कर खौंफ से देखा। उसके हाथ काँपने लगे।

कवच ने उसके काँपते हुए हाथ को कोमलता से संभालते हुए पकड़कर बोला, "उस मंज़र को देख सबकी हालत ऐसी ही हुई थी। राय परिवार में मातम छा गया था।"

महाशक्ति ने इस बार कवच के हाथों को नहीं झटका।

कवच खुश था।

मन ही मन मुस्कुरा, "राय मुख्या चालबाज था और मौकापरस्त था, पर बेटियों पर जान छिड़कता था।

अपनी बड़ी बेटी को इतनी बुरी तरह तड़पता मारता देख उसने पश्चाताप में खुद तो एक कमरे के अंदर कैद कर सही या गलत का गहन अध्ययन किया।

उन्होंने हर एक संभावनाओं को बारीकी से जाँचा और लिखा।

पर दुख की बात थी कि वो शोक और रिसर्च में इतना डूब गए कि उन्होंने खुद को सबसे अलग थलग कर लिया और दुख के बादलों में चल बसे और उनके देहांत के दो दिन बाद सभी को पार्थिव शरीर के पास उन्हें यह लॉकेट मिला।"

"ओह! यह तो बहुत दुखद था। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे।", उसके मुँह से दुख में निकला,

कवच भी दुख के साथ, "हम्म्म। आशा यही है। उनके तैयार किए गए तरीके को बाकी मुखियाओं ने पढ़ा और उसमें सुधार करने लगे।

पाँच साल के बाद उन्होंने फिर से महाशक्ति प्रोजेक्ट पर काम किया।

इस बार सोच-समझकर।

खुराना परिवार ने एक पवित्र लेप और एक काले फूल का द्रव्य तैयार किया जो महाशक्ति को ऊपर से और अंदर से बचा सके।

रेड्डी परिवार ने उस लॉकेट को और गहराई से जाँच उसको और शक्तिशाली और सुरक्षित बनाया।

बिजलानी मुखिया और क्षेत्रिय मुखिया नई और शक्तिशाली शक्ति को अलग-अलग पैमाने पर तौल रहा था।

सब तैयारी होने के बाद उन्होंने फिर से समारोह की तैयारी शुरू की।

इस बार खामोशी में।

सभी लोग पुराने किले में जमा हुए। पूरे किले को लाल और काले फूल से भर दिया था खासकर काले नीर फूल और काले गुलाब से।

सारी बड़ी महिला शक्तियों ने मंत्रों से सुसज्जित एक विशेष स्नान होने वाली नई महाशक्ति को दिया और उसे श्वेत रंग की चमकदार साड़ी और चाँदी के जेवरातों से सजाकर बाहर आधी रात को पूर्णिमा की किरणों लाया गया।

कहा जाता है कि चंद्रमा की चाँदनी में वो एक देवी की तरह चमक रही थी। सभी उसे देख कर मंत्रमुग्ध रह गए।

सारी शक्तियों ने भी चाँदी से ज़ेवरात पहने थे ताकि उनकी ऊर्जा भी शीतल तो नहीं सामान्य ताप की रहे।
पुरुषों ने भी गले में चाँदी की लॉकेट, चाँदी के कड़े और चाँदी की बालियाँ पहनी थी।

सारी तैयारी करने के बाद सबने अपनी एक पंक्ति बना ली।

पुरुषों की पंक्ति, स्त्रियों की पंक्ति और पिछली पीढ़ी जो बचे शक्ति थे उनकी एक पंक्ति।

सबसे आगे थी स्त्रियों की पंक्ति रखी गई।
पहले सारे बड़ों ने अपनी शक्तियों का एक अंश अपने उत्तराधिकारियों को एक ऊर्जा के गोले के रूप में दिया। लिखा गया था कि सबकी ऊर्जाओं का रंग अलग था।

लाल था क्षत्रिय परिवार का, नीला था बिजलानी परिवार का, भूरा था खुराना परिवार का, हरा था खुराना परिवार का और नारंगी था राय परिवार का।

ऊर्जा को देख सब भौचक्के रह गए। इतनी ऊर्जा किसीने एक साथ एक जगह पर नहीं देखी थी।",

महाशक्ति ने रोचकता से देखा, " फिर?"

कवच को भी उसकी रोचकता देख अलग रोचकता लग रही थी, "फिर उनके उत्तराधिकारियों ने उनकी ऊर्जा को अपनी ऊर्जा से मिलाया।
उनकी ऊर्जा तेज़ थी।
उन्होंने फिर सारी ऊर्जा अपनी अर्धांगियों को दिया जिन्होंने उस ऊर्जा को अपनी शीतल ऊर्जा से मिलाया।

शीतल कह रहा हूँ पर उनकी ऊर्जा में शीतलता नहीं थी।

उनकी ऊर्जा में उग्रता थी।

उन्होंने धीरे-धीरे ऊर्जा महाशक्ति की लॉकेट में डाल रहे थे।

स्त्रियाँ उस ऊर्जा को संभाल नहीं पा रहे थे फिर अचानक उस ऊर्जा के गोले में एक विस्फोट हुआ और सारी ऊर्जा एक झटके में महाशक्ति के लिए बनाए विशेष रत्न में समा गया।",

महाशक्ति ने शांति की साँस ली।

तभी मुस्कुराते हुए कवच ने रोमांचक आवाज़ में कहा, "सबकी साँसे अटक गई।

सब बस नई महाशक्ति को देख रहे थे।

वो भी खुद को अंदर ही अंदर टटोल रही थी।

सबको लगा कि सब खत्म हो गया पर असली खेल अब भी बाकी था। जैसे ही पहली महाशक्ति से उस ऊर्जा को सोखा, उसके सीने से–"

कहानी में अच्छा रोमांच चल ही रहा था कि दरवाज़ा 'खट-खट' करता बज उठा।

महाशक्ति के चेहरे से उत्साह की अभिव्यक्ति छिन गई।

उसे सुखदायी अंत छिन गया।

कवच कहानी छोड़ दरवाज़ा देखने के लिए उठा। उससे रहा नहीं गया।
उसे लगा (इस बार उन्हें जाने दिया तो पता नहीं फिर कब?)।
इसलिए उसने कवच का हाथ एकदम से पकड़ लिया।
कवच का हाथ एकदम से खिंच गया। 

कवच को भी इस खिंचाव की आशंका नहीं थी।

इसलिए जब उसने उसे खींचा तो उसके चोटिल शरीर भी इस अचानक हुए हमले को संभल नहीं पाया और पीछे लड़खड़ाने लगा।
महाशक्ति भी उसे संभालने के लिए उसे संभालते हुए खड़ी हुई पर कवच का धक्का लग दोनों सोफे जा गिरे।

महाशक्ति और महाशक्ति के ऊपर कवच।

एक दूसरे के आलिंगन में।

देखकर लोगों को गलतफहमी हो जाए।

"ओह! क्या तुम ठीक हो?", कवच थोड़ा ऊपर हो, उसके सिर को संभालते हुए हल्के करहट के साथ पूछा।

महाशक्ति उसे बस ऐसे हैरान देख रही थी।

तभी कमरे का दरवाज़ा खुला और कुछ लोग बिजनेस कपड़े पहने मीडिया का जत्था अपने कैमरों के संग अंदर घुस आया।

दोनों खून से लथपथ, खूनी कमरे में एक दूसरे के आलिंगन में पूरी दुनिया के सामने लाईव आ गए।