अध्याय - 8 आर्यावर्त और द्रविड़ में विभाजन
अक्सर ये बहस सुनने को आती है जहां हम आर्यन को विदेशी और द्रविड़ को सच्चे भारतीय मानते हैं। लेकिन क्या आर्यन सच में विदेशी हैं? 19वीं और 20वीं सदी के यूरोपीय इतिहासकारों (जैसे मैक्स मूलर) ने यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि आर्य भारत के मूल निवासी नहीं थे, बल्कि वे लगभग 1500 ईसा पूर्व में मध्य एशिया या स्टेपी क्षेत्र से भारत आए थे।
इसके उन्होंने कई तर्क भी दिये जैसे की संस्कृत, लैटिन, ग्रीक और जर्मनिक भाषाओं में गहरी समानता है। साथ ही, तुर्की में 1400 ईसा पूर्व का एक संधिपत्र मिला है, जिसमें वैदिक देवताओं जैसे की इंद्र, मित्र, वरुण और नासत्य (अश्विनी कुमार) के नामों का उल्लेख है। इसे इस बात का प्रमाण माना गया कि आर्य पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ रहे थे।
हाल के कुछ डीएनए (अध्ययनों (जैसे 'R1a1' हैलोग्रुप) में यह दावा किया गया कि मध्य एशियाई स्टेपी के लोगों और भारतीय उच्च जातियों के पुरुषों के डीएनए में समानताएं हैं।
लेकिन क्या आर्य यहाँ आकर द्रविड़ के साथ युद्ध किया? बिलकुल नहीं। सिंधु घाटी सभ्यता के किसी भी स्थल पर सामूहिक नरसंहार या युद्ध के कोई पुरातात्विक साक्ष्य नहीं मिले हैं, जो 'आर्य आक्रमण' की थ्योरी को पूरी तरह से नकारते हैं।
हिंदू धर्मग्रंथ, वेद और पुराण पूरी तरह से इस बात का समर्थन करते हैं कि आर्य भारत के ही मूल निवासी थे। ग्रंथों में कहीं भी किसी 'बाहरी मातृभूमि' का उल्लेख नहीं मिलता।
ऋग्वेद के नदी सूक्त में भारत की 25 से अधिक नदियों का वर्णन है, जिसमें गंगा, यमुना, सरस्वती, शतुद्रि (सतलुज), और परुष्णी (रावी) शामिल हैं। यदि आर्य बाहर से आए होते, तो उनके सबसे पवित्र ग्रंथ में मध्य एशिया या यूरोप की नदियों (जैसे वोल्गा या दनुबे) का उल्लेख अवश्य होता।
वेदों में सरस्वती को 'नदीतमा' (नदियों में सर्वश्रेष्ठ) कहा गया है। आधुनिक उपग्रह (Satellite) चित्रों से सिद्ध हो चुका है कि यह नदी राजस्थान और हरियाणा से होकर बहती थी और लगभग 2000 ईसा पूर्व तक सूख चुकी थी। चूंकि ऋग्वेद में इस नदी को बहते हुए वर्णित किया गया है, इसलिए ऋग्वेद की रचना 2000 ईसा पूर्व से बहुत पहले भारत की धरती पर ही हुई थी।
हिंदू पौराणिक ग्रंथों (रामायण, महाभारत, पुराण) में 'आर्य' शब्द का प्रयोग किसी 'नस्ल' या 'जाति' के लिए कभी नहीं किया गया।
रामायण में माता सीता भगवान राम को 'आर्यपुत्र' कहती हैं, जिसका अर्थ 'श्रेष्ठ पुरुष के पुत्र' से है, न कि किसी विदेशी नस्ल से। इसके विपरीत, जो अनैतिक कार्य करते थे, उन्हें 'अनार्य' कहा जाता था।
हरियाणा के राखीगढ़ी (हड़प्पा कालीन स्थल) में मिले कंकालों के आनुवंशिक (Genetic) अध्ययन से यह साबित हुआ कि उत्तर और दक्षिण भारत के लोगों का मूल जीन पूल (Gene Pool) एक ही है। आनुवंशिक रूप से उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय कोई दो अलग-अलग नस्लें नहीं हैं, बल्कि वे एक ही प्राचीन आबादी का हिस्सा हैं।
पौराणिक ग्रंथों में 'द्रविड़' किसी नस्ल का नाम नहीं, बल्कि एक भौगोलिक पहचान है। विंध्याचल पर्वत के दक्षिण के क्षेत्र (दक्षिण भारत) को 'द्रविड़ देश' कहा जाता था और वहां रहने वाले लोगों को द्रविड़।
आर्यों द्वारा द्रविड़ों पर अत्याचार करने या उन्हें युद्ध में खदेड़ने की बात ऐतिहासिक और वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह असत्य है।यह सिद्धांत अंग्रेजों द्वारा भारत को "उत्तर बनाम दक्षिण" और "जातिगत आधार" पर बांटने के लिए गढ़ा गया एक राजनीतिक हथियार (Divide and Rule Policy) था।
साथ ही भगवान विष्णु ने भी दक्षिण हो या उत्तर भारत सभी जगह अवतार लिए। शिव के एक पुत्र गणेश उत्तर और कार्तिकेय दक्षिण में पूजे जाते हैं।
और आख़िरी बात जो लोग ये सोचते हैं की घर, परिवार और कर्तव्य को छोड़कर अगर वो वैराग्य अपना लेते हैं तो उन्हें ईश्वर प्राप्त हो जाएँगे तो वो लोग भूल जाते हैं कि जिस ईश्वर को वो पाना चाहते हैं वो भी इन चीज़ों के बिना ईश्वर नहीं बन सकते।
द्रविड़ हो या आर्यावर्त, सभी उस ईश्वर को मानते हैं जिन्होंने इस भारत में अवतार लिये। एक दिन मैं अपने पापा के साथ बैठा था। सोशल मीडिया पर एक दावा बार-बार दिख रहा था—“सभी राक्षस द्रविड़ थे।” मैंने पापा से पूछा, “क्या यह सच है?”
पापा मुस्कुराए और बोले, “बेटा, पहले यह समझो कि हमारे ग्रंथों में हर असुर राक्षस नहीं होता।”
मैं हैरान होकर बोला, “मतलब?”
पापा ने कहा, “हिरण्याक्ष, हिरण्यकशिपु, प्रह्लाद और महाबली ये दैत्य थे, राक्षस नहीं। वहीं रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद और शूर्पणखा राक्षस कुल से थे। यानी सबसे पहले तो लोग दैत्य और राक्षस का अंतर ही भूल जाते हैं।”
मैंने पूछा, “तो फिर क्या सभी राक्षस दक्षिण भारत के थे?”
पापा बोले, “नहीं। हमारे ग्रंथ ऐसा नहीं कहते। राक्षसों का उल्लेख केवल लंका तक सीमित नहीं है। रामायण में ताड़का और उसका पुत्र मारीच उत्तर भारत के दंडकारण्य और सिद्धाश्रम के आसपास मिलते हैं। सुबाहु भी वहीं था। महाभारत में बकासुर एकचक्रा नगरी के पास रहता था, जिसे आज के उत्तर भारत से जोड़ा जाता है। हिडिंब और हिडिंबा का वर्णन हिमालय क्षेत्र में मिलता है, और घटोत्कच भी उसी वंश का था। यानी राक्षसों और अन्य असुर कुलों का वर्णन भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में मिलता है, केवल एक क्षेत्र में नहीं।”
मैंने कहा, “तो ‘सभी राक्षस द्रविड़ थे’ कहना गलत है?”
पापा बोले, “हाँ। यह निष्कर्ष न तो रामायण देती है और न ही महाभारत। प्राचीन ग्रंथ राक्षस, दैत्य, दानव और असुर जैसे अलग-अलग कुलों का वर्णन करते हैं। उन्हें सीधे किसी आधुनिक जातीय या भाषाई पहचान से जोड़ देना इतिहास नहीं, बल्कि एक आधुनिक व्याख्या है।