एक लड़का और लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते।
ये लाइन तो आपने सुनी ही होगी लेकिन ऐसा क्यों कहा जाता है? क्या ये दर्शाता है कि दोस्ती में लिंग भेदभाव होता है या प्यार की भावना दोस्ती की भावना से ज़्यादा शक्तिशाली है?
चलिए शुरू से शुरू करते हैं दोस्ती में जाति का क्या महत्व है? मेरे दादा जी कहा करते थे हर जाति कि अपनी दोस्ती होती है।
पहला क्षत्रिय - इसमें राजपूत जाति की बात करते हैं। राजपूत दोस्ती में वफ़ादारी ढूँढता है। एक राजपूत के अगर दो दोस्त है जिसमें एक राजपूत ही है और दूसरा वाल्मीकि जाति से आता है लेकिन अगर वो ये समझता है की राजपूत दोस्त से ज़्यादा वाल्मीकि जाति का दोस्त वफ़ादार है तो वो अपने आप उस दोस्त को ज़्यादा तवज्जो देने लगेगा जो उसके लिए वफ़ादार है जो उसे कभी धोखा नहीं दे सकता चाहें परिस्थिति कुछ भी हो। ऐसे में उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता की वफ़ादार दोस्त मुस्लिम हो, वाल्मीकि हो या एक महिला।
दूसरा ब्राह्मण - इसमें पंडित जैसे तिवारी, दुबे की बात करते हैं। पंडित दोस्ती में जाति देखता है। अगर उसके दो दोस्त है जिसमें पहला ब्राह्मण है और दूसरा वाल्मीकि या मुस्लिम तो फिर उसके लिये चाहें ब्राह्मण दोस्त कैसा भी हो वो फिर भी उसे ही ज़्यादा तवज्जो देगा। उसके लिए दोस्ती में उसकी समान जाति ज़्यादा महत्व देती है। दोस्त महिला हो लेकिन ऊँची जाति उसके लिए उतना काफ़ी है। जातिवाद गहराई से दिमाग़ में घुसा होता है जिसकी वजह से ब्राह्मण पवित्रता के कारण चाहकर भी ऐसे को अपना मित्र या गहरा दोस्त नहीं बना पाता जो दूसरी जाति का हो। इसलिए ठाकुर पंडित की दोस्ती इतनी गहरी हो जाती है लेकिन आपने कभी नहीं सुना होगा कि लोग पंडित भंगी कि दूसरी कि मिसालें दें।
तीसरा वैश्या - इसमें आप बनिया जैसे गुप्ता और अग्रवाल का उदाहरण ले लीजिए। बनिया दोस्ती में मुनाफ़ा देखता है। अब अगर बनिया के दो दोस्त है जिसमें एक वाल्मीकि से लेकिन IAS ऑफिसर है या किसी भी तरह से उसे लाभ दे सकता है और दूसरा ब्राह्मण है लेकिन मध्यम वर्गीय परिवार से है और उसे किसी भी तरह का लाभ नहीं दे सकता, तो उसकी दोस्ती उस समय वाल्मीकि से ज़्यादा गहरी हो जाएगी। चाहें फिर वो मुस्लिम हो, महिला हो या वाल्मीकि। बनिया भले ही धार्मिक हो लेकिन वो ब्राह्मण की तरह जाति देखकर दोस्ती नहीं करेगा वो वहाँ मुनाफ़ा और लाभ देखकर दोस्ती करेगा।
आख़िरी है शूद्र जाति - इसमें आप वाल्मीकि या किसी भी अन्य शूद्र उपजाति का उदाहरण ले सकते हैं। शूद्र दोस्ती में समानता ढूँढता है। समझिए अगर वाल्मीकि का एक दोस्त उसी की जाति है और दूसरा राजपूत लेकिन अगर वो ये देखता है की उसकी जाति का दोस्त उसे वो इज्जत नहीं दे रहा जो राजपूत दोस्त देता है तो वो अपने आप राजपूत दोस्त को तवज्जो देने लगेगा।
इसी तरह धर्म और लिंग भेदभाव की बात करते हैं। लिंग भेदभाव पितृसत्ता से निकला एक रूप है। स्त्री को दबाने का एक क़ानून। तुम्हें पता है एक स्त्री कि पहली बार इतिहास में हत्या कब की गई?
इतिहास में स्त्री की हत्या सबसे पहले एक पिता के कहने पर एक पुत्र द्वारा अपनी माँ की गई। अपनी माँ की हत्या करके वो पुत्र अपने पिता का हो गया और वहाँ से शुरू हुआ पितृसत्ता।
पितृसत्ता का जनक क्योंकि वो बालक वो पुत्र था इसलिए उसे इस पितृसत्ता वाले समाज ने अपना भगवान मान लिया। आज हम सब उस पुत्र की पूजा करते हैं परशुराम जी के नाम से।
पुत्र ने जब अपने पिता की इस आज्ञा की भी पूर्ति कर दी तब से सभी पिता के मन में पुत्र प्राप्ति को कामना शुरू हुई। आज जो औरतें पुत्र पाना चाहती है और बेटी नहीं। लेकिन वो महिलायें उसी पितृसत्ता वाली मानसिकता का शिकार हैं जो उनके ही ख़िलाफ़ एक दिन खड़ी हो जायेगी।