इस एपिसोड को हम एक सवाल से शुरू करते हैं। चलिए बताइए क्या आपको आपका गोत्र याद हैं? अगर आप भारतवर्ष में रहते हैं तो आप किसी न किसी ऋषि परंपरा का हिस्सा ज़रूर होंगे। ये ऐसा समझिए किसी के जीवन में तीन लोगो का अहम role होता है जिसमें पहला है माँ।
माँ को सबसे ऊपर रखा गया इसलिए हिंदू धर्म में सभी लोगो को उनकी माँ के नाम से ही जाना जाता है जैसे कि कोशलया नंदन श्री राम, यशोदा नंदन श्री कृष्ण, कुंती पुत्र पांडव या राधा जी को कीर्ति सुता और कर्ण को राधेय कहना होगा। पहले सबसे पहले नाम के आगे माँ का नाम बोला जाता था। जिसे समय के साथ पुरुषत्व समाज ने ख़त्म कर दिया।
माँ के नाम के पीछे हिंदू धर्म में दो महत्वपूर्ण कारण माने जाते थे पहला एक बच्चे को भले ही उसके पिता का नाम, या गुरु का नाम ना पता हो लेकिन माँ के बारे में ज़रूर पता होता है।
और दूसरा पहले समाज महिला प्रधान ही था। अगर आप हड़प्पा सभ्यता के बारे में पढ़े तो आपको समझ आ जाएगा की व्यापार और घर के पालन की ज़िम्मेदारी पहले महिला ही निभाती थी।
दूसरा पिता, जब माँ का नाम बोल दिया जाता था फिर पूछा जाता था पिता का नाम। पिता का नाम पूछने का कारण होता था आपकी जाति पता करना। अगर आप आज भी किसी ग्रामीण इलाक़े में किसी बच्चे के पिता का नाम पूछेंगे तो वो पिता का पूरा नाम ही बताएगा। ये जाति जानने और और उसके बच्चे का कुल जानने के लिए महत्वपूर्ण सवाल माना जाता था।
तीसरा जब पिता और माता के बारे में पता चल जाता था तब उसके गोत्र के बारे में पूछा जाता था। अक्सर लोगो अपनी जाति को ही गोत्र समझ लेते हैं जबकि ऐसा नहीं है। जाति आपके कुल का विवरण देती है कि आपके पिता और आपका वंश क्या है लेकिन गोत्र बताता है कि आप किस ऋषि परंपरा से जुड़े हैं। मान लो मेरा गोत्र भारद्वाज है और किसी अनुसूचित जाति का गोत्र भी भारद्वाज ही है तो वो मेरा ऋषि भाई माना जाएगा। ये समाज में जातियों के बीच की दूरी को कम करने का एक तरीक़ा था।
जैसे जैसे लोगो ने गोत्र को महत्व देना बंद कर दिया या अपने गोत्र को भूल गए वैसे वैसे जातियों में दूरी बनने लगी। इससे एक बात और साफ़ होती है की पहले ऋषि परंपरा में सभी जातियों को शिक्षा का अधिकार था। सभी एक समान थे लेकिन जैसे जैसे ऋषि परंपरा आगे बढ़ी वैसे वैसे कुछ ऋषियों ने कुछ सीमित लोगो को ही अपना शिष्य बनाना शुरू कर दिया।
जैसे दोर्णाचार्य ने सिर्फ़ पाण्डवों और कौरवों को सिखाया। परशुराम सिर्फ़ ब्राह्मण और शूद्रों को ही सिखाते थे उन्होंने क्षत्रिय को सिखाने से मना कर दिया। जब परशुराम को पता चला कि कर्ण एक क्षत्रिय है जो छुपकर उनसे शिक्षा ग्रहण कर रहा है तो उन्होंने उसे श्राप भी दे दिया। इसी तरह कई ऋषियों ने अपने गुरुकुल को सीमित किया उससे बाक़ी जातियाँ शिक्षा से ना सिर्फ़ वंचित होने लगी बल्कि उनमें ऋषि परंपरा से जुड़ा रिश्ता भी ख़त्म होने लगा।
गोत्र हमारी वो पहचान है जो हमें एक समाज के रूप में जोड़े रखता है। जाति तो पहले महत्व रखती ही नहीं थी। एक शूद्र भी वो ही ज्ञान भारद्वाज ऋषि से पा सकता था जैसे एक क्षत्रिय। फिर उसका चुनाव होता था कि वह एक क्षत्रिय की तरह जीवन यापन करें या शूद्र की तरह।
गोत्र एक पुरानी पहचान है उसे भूले ना बल्कि उसपर गर्व करें। अब अगले एपिसोड में हम बात करेंगे उन महान महिलाओं के बारे में जिन्होंने ऋषि परंपरा में आकर अध्यात्म से जुड़े ज्ञान को अमर कर दिया।