बंटवारा राज बोहरे द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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बंटवारा

कहानी

बंटवारा

 

"ममा ये कैसा खाना है?हमसे नहीं खाया जा रहा।" रीशु झुंझला कर कहा तो झेंपती हुई तृषा बैठक से उठ के भीतर आई और बेटे को चुप रहने का इशारा किया।

रीशु समझ नही सका, उसने दुबारा कहा " हम पिछली बार इसी घर मे आये तो कितनी तरह की डिस बनती थी,इस बार सब बेस्वाद चीजें बन रही।आखिर क्यूँ?'

तृषा ने धीमे स्वर में कहा ' तब गिजू  चाचा की शादी में  आये थे, अबकी बार उन चाचा की मम्मी की डैथ में आये हैं।'

'तो फर्क क्या हुआ?'

'फर्क यह है कि तब उत्सव का समय था। रिवाज है कि गांव में विवाह, जन्म या त्यौहार पर विशेष भोजन बनता है, लेकिन मृत्यु के समय भोजन गौण हो जाता है। इन दस दिन में इस घर में बिना नमक मिर्च और बिना छोक बघार की उड़द की दाल के साथ टिक्कर बनाये जाते हैँ.'

"तो हम कहीं और जाकर क्यों नहीं रह रहे?"

"इसलिए कि गांव में जिस घर में कोई डेथ हो जाती है उस घर के लोग अपना घर छोड़ कर अन्यत्र नहीं जाते।"

"तो चलो शहर अपने घर चलते हैं।"

"नहीं, हम यहीं रहेंगे। हम एक खास मकसद से इस बार गाँव आये हैँ...अपनी खेती की पैतृक जमीन का बंटवारा होना है। वो तभी इजीली होगा ज़ब हम इन गम के दिनों में इस घर में सबके साथ रहेंगे।" सावधान होते हुये नीचे स्वर में तृषा बोली।

"क्यूँ भला?"

"इसलिए कि हमारी सारी खेती पर गीजू चाचा का कब्ज़ा है। उनसे हिस्सा बंटाने के लिए प्रेम का बर्ताव जरूरी है।"

"तो हम क्या तेरह दिन तक ऐसे ही इस छोटे गंवई घर में रहते रहेंगे। हर चीज सबसे साझा करते हुये और सीमित साधनों में दिन काटते हुये।"

" हमको सीमित जगह में रहना और अमित वस्तुओं का सजा उपयोग करना आपसी समझ और पारिवारिक जीवन की अनिवार्य स्थित है। "

"क्या हुआ बेटा?" अचानक गिजु यानि गजेंद्र वहाँ आ गए थे जिन्हे देख के माँ बेटे सहम गए।

"चाचा, मुझसे यह सब खाया नहीं जा रहा। यह मोटी रोटी और बिना मसाले की दाल।"

"तो हम तुम्हे किसी के साथ बाजार भेज देते हैं। मोमोज, नुडल जो भी खाना हो, खा आओ.."  गजेंद्र मुस्कान के साथ बोले "अब तुम केवल बारह साल के तो हो, अकेले नहीं जा पाओगे, अन्यथा भेजी देता।"

"कौन जा रहा नूडल खाने?"तीखी आवाज के साथ पापाजी कि बुआ वहाँ पल भर में प्रकट हो गयी थीं।

    रिशु सहम गया। वह क्या उसकी माँ और चाचा भी सहम गए थे... बुआ गरज रही थीं "तेरही होने तक इस घर का कोई भी आदमी उड़द की दाल और टिक्कर के शिवाय कुछ न खायेगा!"

   "मै आज से कुछ न खाऊँगा!" रिशु ने बुआ-दादी से गुस्से में कहा।

   "तो भूखा ही रहना!" कहती बुआ वहाँ से अगले किसी सदस्य को ज्ञान देने निकल गई थीं।

   गिजु चाचा के जतन की बदौलत रीशु को उस दिन के बाद मनचाहा खाना मिलने लगा ।

    रिशू को आदत थी कि वह म्यूजिक सिस्टम पर पंजाबी और पश्चिमी गाने सुनकर डांस करता था।लेकीन घर के शोक राग में यह सम्भव न था। तृषा से मोबाइल फोन लेकर पांचवे दिन बेटे ने अपने कमरे में पश्चिमी संगीत सुनते हुये कहा "अब मै वही सुनूगा जो मुझे पसंद है, पर परम्परा भी याद रखूँगा।

   तेरही के बाद तृषा के प्रस्ताव पर गजेंद्र के मामा, फूफा, जीजाजी और मोहल्ले के दो वृद्ध सज्जन बुला कर वंटबारे की सभा आयोजित किया जाना तय हुआ।

  सुबह दस बजे सब जुटने लगे।सभी लोग अपने अपने रिश्तों के अनुसार एक दुसरे को "साहब " "भैया " "चाचा " कह कर सम्बोधित कर रहेगा थे और इससे सभा में सहज़ सामंजस्य बन रहा था।

  सभी बुजुर्ग अचरज में थे कि घर के दोनों भाई बंटवारे कि जिद नहीं कर रहे थे लेकिन स्त्रियां जिद कर रही थीं।

   बुआ भी वहाँ बैठी थीं कि लाइट चले जाने से रिशू वहाँ आ गया। बुआ सबको सुनाते हुये बोलीं "अगर आज बंटवारा हुआ तो शिवेंद्र कभी गाँव नहीं आ सकेगे, और गजेंद्र कभी भी शहर के उस घर में नहीं जाएंगे जिस घर में शिवेंद्र, रिशू और तृषा रहती है।

    यह सुना तो रिशू स्तम्भत रह गया... वह सहसा बोला "पापा, प्लीज ऐसा कुछ नहीं करो न कि हमें गाँव और गिजु चाचा से मिलना कठिन हो जाये।"

   सभी चौंक गए।

    शिवेंद्र और गजेंद्र कि ऑंखें मिली और नीचे झुक गयी... शिवेंद्र बोले "मुझे अगर नया फ्लैट खरीदने लायक पैसे कहीं से मिल जाते तो न बंटवारा चाहिए न कोई मनभेद!"

   गजेंद्र बोले "अपनी सड़क वाली बंजर जमीन बेच देने पर इतना पैसा आसानी से मिल जायेगा दादा!"

  होता होता बंटवारे का मसला  रुक गया।

   दस साल बाद हवाई अड्डे खडे होकर नौकरी पर विदेश जाने वाले युवा रीशु ने पिता से कहा "अब मैं वही सीख लूंगा और अपनाऊगा जो मुझे वैश्विक दुनिया में आगे बढ़ने में मदद करेगा।"

  एक पल रुक के वह बोला " भाई चारे का भाव तो दुश्मन को भी मित्र बना देता है पापा, फिर अजनबी को तो यार बना ही देगा.। "

   शिवेंद्र सोच रहे थे "घर के बंटवारे को रुकवाने वाला रिशू अनायास हम सबका गुरु बन बैठा। शुभकामनायें हैँ कि यह जहाँ जाये इसी भाई चारे लो फैला ये…"

     प्रसन्न मन से पति पत्नी घर लौट चले जिनके साथ गजेंद्र और उसकी पत्नी कल्पना भी यही शुभकामनायें भेज रही थी।

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