सावन की एकादशी Vandna Sharma द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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सावन की एकादशी


श्रावण की एकादशी

एक समय की बात है। किसी गाँव में चार दोस्त थे - अजय, विजय, संजय और धनंजय। चारों के पास एक-एक अद्भुत कला थी। जो उन्होंने गुरुकुल में अपने गुरु की सेवा करके सीखी थी। अजय के पास संजीवनी विद्या थी। वह किसी भी मृत व्यक्ति को जीवित कर सकता था, शर्त यह थी - मृत्यु के बाद 24 घंटे से पहले ही अर्थात शरीर सड़ने से पहले ही उसके पास ले जाएँ तो उसकी विद्या कार्य करती थी। लेकिन उसके गुरु ने वचन लिया कि कभी भी अजय इस विद्या का प्रयोग नहीं करेगा।

विजय के पास पदचिन्ह पहचानने की विद्या थी। चाहे कोई व्यक्ति कितने ही दिन पहले वहाँ से गुजरा हो, विजय पक्षी, जानवर, मनुष्य सभी के पदचिन्ह खोजकर उनका पता-ठिकाना मालूम कर सकता था।

संजय के पास सुनने की तीव्र शक्ति थी। वह 10 km तक की ध्वनि को साफ सुन सकता था। और धनंजय के पास एक मंत्र था जिससे वह दो बार उच्चारण करता तो उसके पास एक वायुपान उड़नखटोला जैसा प्रकट होता, जिसमें बैठकर वो तेज गति से कहीं भी जा सकता था।

जब चारों दोस्तों की विद्या पूर्ण हुई तो उन चारों ने अपने गुरु को प्रणाम किया और अपनी विद्या का चमत्कार देखने के लिए चारों ने अलग-अलग दिशाओं में जाने का निर्णय किया और ठीक पाँच साल इसी स्थान पर मिलने का निश्चय किया। चारों ने बात मान ली कि ठीक पाँच साल बाद सावन मास की एकादशी को चारों यहीं गुरुकुल के सामने मिलेंगे।

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अजय पूर्व दिशा में गया। उस समय यात्रा के दो ही साधन थे - पैदल या बैलगाड़ी। अमीर आदमी था, चलते-चलते दोपहर हो गई। उसे अब भूख और प्यास लगी। एक सराय के सामने वो रुक गया। उसने दरवाजा खटखटाया कि कोई आए तो वह पानी माँगे। अंदर से एक बूढ़ी महिला रो रही थी। घर में मातम पसरा था। अजय के पूछने पर उसने बताया कि उसकी जवान लड़की आज सुबह कुएँ पर पानी भरने गई थी। वहीं उसका पैर फिसल गया और कुएँ में गिरकर मर गई।

अजय ने उस लड़की को देखा।  अजय ने उसके पिता से कहा - "महोदय, मैं आपकी बेटी को पुनः जीवित कर सकता हूँ, पर आपको उससे मेरा विवाह करना होगा।" सौम्या के पिता मान गए। अजय ने अपनी मंत्र विद्या से लड़की को जीवित कर दिया। अजय और सौम्या का विवाह हो गया। वह सौम्या के ही घर रहने लगा।

2. विजय की यात्रा - पश्चिम दिशा:  
दूसरा दोस्त विजय जो पदचिह्न पहचानने की विद्या जानता था, पश्चिम दिशा में गया। वह एक साहूकार के यहाँ काम करने लगा और अपनी विद्या के द्वारा साहूकार के व्यापार में सहायता करने लगा। अपनी बुद्धि और ईमानदारी से उसने साहूकार का दिल जीत लिया। साहूकार ने अपनी बेटी का विवाह विजय से करा दिया।

3. संजय की यात्रा - उत्तर दिशा:  
तीसरा मित्र संजय उत्तर दिशा में गया। थोड़ी दूर चलने पर उसे एक स्त्री के रोने का स्वर सुनाई दिया। वह उस ध्वनि का पीछा करते-करते एक जंगल में पहुँच गया। लेकिन उसे वहाँ कोई नहीं दिखाई दिया। वहाँ एक कुआँ था जो पानी से भरा था। चारों ओर कोई नहीं था। फिर से उसे रोने की ध्वनि सुनाई दी। वो ध्वनि उस कुएँ से आ रही थी। संजय ने कुएँ के पास ही एक पेड़ पर मचान बनाया और उस मचान पर चुपचाप बैठ गया। थका होने के कारण उसे नींद आ गई।

आधी रात को जब उसकी आँख खुली तो उसने देखा जंगल में चारों तरफ प्रकाश फैला हुआ था। कुएँ की जगत पर एक मणि रखी थी। वह प्रकाश उसी मणि का था। कुएँ का पानी गायब हो चुका था। अब उसमें सीढ़ियाँ दिखाई दे रही थीं। तभी एक साँप आया। उसने मणि को मुँह में उठाया और कुएँ के अंदर जाने लगा। साँप के जाने के बाद कुआँ फिर पानी से भर गया।

संजय को एक उपाय सूझा। अगली सुबह वह पेड़ से उतरा और पास के गाँव से एक लोहार से उल्टे कुंदे वाली कड़ाही बनवाकर ले आया। और मचान पर छुप कर बैठ गया। साथ ही एक मोटी रस्सी भी ले आया था। आज रात उसे नींद नहीं आ रही थी। वह साँप के आने का इंतजार करने लगा। कुछ ही देर में पूरे जंगल में फिर से प्रकाश फैल गया।

कुएँ से एक साँप निकला। उसने मणि को कुएँ की जगत पर रखा और भोजन की तलाश में कुएँ से दूर जाने लगा। जैसे ही वो साँप कुएँ से कुछ दूर गया, संजय ने रस्सी से कड़ाही को लटकाकर नीचे उतारा और धीरे-धीरे से सरका कर उस कड़ाही को मणि के ठीक ऊपर ढक दिया। कड़ाही में लगे उल्टे कुंदे कुएँ की जगत से चिपक गए।

जब थोड़ी देर बाद साँप आया तो मणि को वहाँ न पाकर गुस्से में कड़ाही पर सिर पटकने लगा। कुंदे में लगे कील से बार-बार सिर टकराने पर साँप लहूलुहान हो गया और मर गया। संजय सुबह होने का इंतजार कर रहा था। इंतजार करते-करते उसकी आँख लग गई। और जब सुबह वह उठा तो दोपहर हो चुकी थी। उसने झुककर नीचे देखा, साँप मरा पड़ा था। वह सावधानी से नीचे उतरा और साँप को एक ओर फेंक दिया।


संजय ने धीरे से कड़ाही उठाई तो उसके नीचे मणि चमक रही थी। संजय ने जैसे ही मणि को उठाया, कुएँ का पानी गायब हो गया। कुएँ में सीढ़ियाँ दिखाई दे रही थीं। संजय मणि हाथ में लेकर धीरे-धीरे नीचे उतरने लगा। थोड़ा नीचे उतरा तो कुएँ की दीवार में एक दरवाजा दिखाई दिया जिस पर एक मोटा ताला लटका हुआ था। उसने मणि को ताले पर छुआया तो दरवाजा खुल गया। अंदर जाकर संजय ने देखा एक सुंदर शहर बसा हुआ है। दुकानें भी सजी हुई हैं, लेकिन वहाँ कोई नहीं है। वह आगे बढ़ा तो उसे एक महल दिखाई दिया। लेकिन वहाँ भी कोई व्यक्ति नहीं दिखाई दिया। सुंदर तालाब और बगीचे से होता हुआ संजय एक कक्ष में पहुँचा। वहाँ एक सुंदर राजकुमारी बेहोश पड़ी थी। संजय ने उस मणि से राजकुमारी को छुआ तो वह ठीक हो गई। लेकिन वह संजय को देखकर रोने लगी।

संजय के पूछने पर वह बोली - उसने बहुत दिनों बाद किसी बाहरी व्यक्ति को देखा है। पर वो राक्षस साँप उसे भी मार देगा, वो फिर से अकेली रह जाएगी। संजय ने उसे बताया कि अब वो राक्षस जो साँप बनकर बाहर घूमने गया था, अब मर चुका है। अब उसे कोई परेशान नहीं करेगा। वह सुंदर युवती पास के राज्य की राजकुमारी थी। वो राक्षस उसे जबरदस्ती उठा लाया था और उससे जबरन विवाह करना चाहता था। उसी के रोने की आवाज बाहर संजय को सुनाई दे रही थी। राक्षस के उस नगर में धन-संपदा तो बहुत थी, लेकिन कोई व्यक्ति नहीं था। उस राजकुमारी का नाम छवि था।

खुशी से चहकते हुए छवि संजय के गले लग जाती है। संजय छवि को और मणि को लेकर कुएँ से बाहर आता है और छवि के माता-पिता से मिलने उनके राज्य जाता है। छवि के माता-पिता उसे देखकर बहुत खुश होते हैं। छवि अपने माता पिता को सारी बात बताती है। छवि के माता पिता संजय का विवाह छवि से करा देते हैं। और बहुत सी धन-संपदा देकर उनको विदा करते हैं।

संजय और छवि दक्षिण दिशा में एक नगर में जाकर बस जाते हैं। समय खुशी के समय बहुत तेजी से गुजरता है।

 लगभग पाँच साल बाद...

एक दिन जब संजय व्यापार करके घर लौट रहा था तो रास्ते में उसे एक बर्तन की दुकान पर धनंजय दिखाई देता है। दोनों दोस्त एक-दूसरे को पहचान जाते हैं। गले मिलते हैं और एक-दूसरे को अपनी कहानी सुनाते हैं।

संजय अपने मित्र को घर लेकर आता है और राजकुमारी छवि को अपनी चारों दोस्तों की कहानी सुनाता है। और छवि से कहता है कि सावन का महीना आ चुका है। वचन के अनुसार हम चारों दोस्तों को मिलना है। इसलिए हम दोनों अपने दोस्तों को ढूँढने कल निकलते हैं। शीघ्र ही तुम्हारे पास पहुँचेंगे।

ऐसा कहकर दोनों दोस्त विजय को ढूँढते हुए उसी नगर पहुँच जाते हैं जहाँ विजय कार्य करता था। बाजार में घूमते हुए उनकी भेंट विजय से होती है। तीनों बहुत खुश होते हैं। और एक सराय में भोजन करने बैठते हैं। तभी संजय को अपने मित्र की ध्वनि आती सुनाई देती है। संजय चौंक जाता है और कहता है - "अरे, ये तो अजय भी इसी शहर में है, उसकी ध्वनि पूर्व दिशा से आती प्रतीत हो रही है।"

विजय कहता है, "तुम उसके पद-चिह्न पहचान सकते हो, क्या पता वो यहीं से गुजरा हो।" संजय अपना वायुवान प्रकट करता है और तीनों वायुवान में बैठकर अजय के पदचिह्नों और ध्वनि का अनुसरण करते हुए अजय को ढूँढ ही लेते हैं।

संयोग से आज एकादशी का ही दिन था। अजय उन तीनों को देखकर बहुत खुश होता है और बताता है कि वह अपनी पत्नी के साथ अभी पास के नगर से लौटा है। अजय अपनी पत्नी सौम्या से अपने दोस्तों को मिलवाता है। चारों अपनी-अपनी कहानी सुनाते हैं।

अगली सुबह चारों दोस्त उसी गुरुकुल के सामने मिलते हैं। बारिश तेज गति से होने लगती है। सर-सर सावन बरस रहा है।


चारों दोस्त तय करते हैं कि अब वे चारों मिलकर एक बड़ा गुरुकुल खोलेंगे। जहाँ अजय मंत्र विद्या सिखाएगा, विजय व्यापार और पदचिह्न विज्ञान, संजय वीरता और साहस, और धनंजय- नीति, धर्म और संस्कार।

सावन की बारिश में चारों दोस्त और उनका गुरुकुल - आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल बन गए।

।। समाप्त ।।

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डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi