श्री: संघर्ष एवं प्रेम - पाठ 4 Janshi Saroha द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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श्री: संघर्ष एवं प्रेम - पाठ 4

फ्लैश बैक end 

वर्तमान में ,

श्री सीता जी से बात कर रही थी । सीता जी ने श्री से पूछा कि अब और भी ज्यादा भक्ति करने की क्या आवश्यकता है पिछली बार भी मैने तुम्हे समझाया था फिर फिर भी तुम्हारा ये रूप मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।

श्री ने उनकी बात सुन कर कहा। आंटी आप मेरी मां जैसे है । जिस प्रकार वो मुझे समझाती है उसी प्रकार आपने भी मुझे समझाया। मेरे हित चाहने की इच्छा से आपने मुझे ये सब समझाया था। लेकिन मेरे लिए तो मेरा हित बस नारायण भक्ति में ही है ।
अब मैने अपने सभी भावनाओं को बहुत मुश्किल से मारा है । और अब मैं साधना के मार्ग में हु । लेकिन मेरी साधना कभी भी मुझे मेरी जिम्मेदारियों से दूर नहीं कर रही। साधना करते हुए मैं अपने परिवार की जिम्मेवारी भी उठा रही हु और आगे भी उठाऊंगी आप चिंता मत करिए । 
यू तो विवाह हर स्त्री के लिए आवश्यक नहीं लेकिन फिर भी मैने तो अपना जीवन नारायण के हाथों में शॉप दिया है । अब तो वो आधिपुरुष नारायण ही जाने की मेरा भविष्य क्या होगा । सभी लड़कियों की तरह मेरा भी विवाह होगा या फिर वो मुझे साधना मार्ग दिखाएंगे। उनके आगे किसी की नहीं चलती 😊। जो वो चाहते है वहीं होगा आंटी जी । आप चिंता मत करो । मैं पहले अपने सपने पूरा करनी चाहती हु IAS बनकर देश की सेवा करना चाहती हु । 

तत्पश्चात विचार करेंगे मेरे आगे के जीवन के बारे में 
और आंटी जी मैने आपसे कभी नहीं कहा कि मैं विवाह नहीं करूंगी न ही ब्रह्मचारिणी होने का ये अर्थ है कि हम विवाह न करे 😌। सही मायने में तो एक पतिव्रता नारी ही ब्रह्मचारिणी है अगर कोई मुझे इसी रूप में इसी वेष में धारण करेगा तो मुझे भी विवाह करने में कोई संकोच नहीं । 🙌🏻

सीता जी श्री के तर्क के आगे  कोई जवाब न दे पाई उन्होंने बस इतना कहा कि श्री को जैसा ठीक लगे वो वही करे ।

सीता जी ने श्री से कहा ठीक है तुम हाथ मुंह धो लो  थक कर आई हो मैं खाना लगा देती हु ।

श्री भी वहां से चली जाती है ।वो हरि की छोटी बहन प्रिया के कमरे में रुकती है। प्रिया और श्री भी अच्छी दोस्त थी । इसलिए प्रिया को कोई समस्या नहीं थी श्री को अपने कमरे में रखने में । 
श्री हाथ मुंह धो कर नीचे डाइनिंग टेबल के पास आई । सीता जी ने उसे बिठाया । सब मिल कर खाना खा रहे थे। हरि भी श्री के प्रति एक अजीब सा आकर्षण महसूस कर रहा था । बीच बीच में वो श्री को खाना खाते हुए देख लेता।

हरि मन में सोचता है कैसी लड़की है ये ये त्रिपुंड क्यों लगाती है मैने तो आज तक किसी लड़की को त्रिपुंड लगाते हुए नहीं देखा वेश भूषा तो ऐसी रखी हुई है मानो शिवभक्त हो लेकिन मुख पर नारायण नाम लेती है ये क्या लॉजिक है भला । 🥲

पुछूं क्या इससे अरे नहीं बाबा अपनी बड़ी बड़ी आंखों से देख कर ही मार डालेगी । 😳
अभी पूछने में बहलाई नहीं है पर कुछ भी कहो मुंह देखकर तो कोई कहे नहीं सकता कि ये लड़की शरीर के रोग से ग्रस्त है ।
दूर से तो कोई समस्या लगती भी नहीं । पास जाने पर ही पता चलता है की इसे कोई समस्या है । खैर फिर भी अपनी वेश भूषा के कारण लगती बड़ी सुंदर है 🥰। आज कल कहा मिलती है ऐसी लड़कियां।🫣

हरि सोचते सोचते अपना खाना खा रहा था सीता जी उसे टोकती है कि हरि क्या सोच रहे हो इतनी देर से...
हरि अपनी सोच से बाहर आता है सीता जी से बोलता है नहीं मां कुछ भी नहीं बस ऑफिस के काम के बारे में सोच रहा था
खाने के समय केवल खाना ऑफिस के बारे में ऑफिस में सोचना समझे ।
हरि बोला जी माँ...
श्री ने अपना खाना पूरा किया अपनी थाली धोने जाने लगी सीता जी ने उसे रोक दिया और कहा कि तुम्हे बर्तन धोने की कोई जरूरत नहीं अभी बेटा सर्वेंट कर देंगे । 
श्री ने कहा नहीं आंटी जी में अपने झूठे बर्तन किसी और से नहीं धुलवाती । आप चिंता मत करो मैं साफ कर दूंगी थाली । 
सीता जी श्री के तर्क से कुछ भी नहीं बोल पाती । श्री अपने बर्तन धो कर पढ़ाई करने चली जाती है ।
रात के 10 बजे हरि उसके कमरे में आता है । कॉफी लेकर हरि श्री से बोला तुम अभी पूरी रात पढ़ाई करोगी इसलिए मैं तुम्हारे कॉफी ले आया 
श्री ने जवाब में कहा —जी धन्यवाद परंतु मैं पूरी रात जाग कर पढ़ाई नहीं करूंगी भगवान ने दिन बनाया है पढ़ाई करने के लिए रात बनाई है सोने के लिए फिलहाल हम सोने के लिए जा रहे थे । 
हरि श्री की बात सुन कर उसकी तरफ देखता है और बोलता है फिर अब इस कॉफी का क्या करु ?
श्री ने कहा हमने काफी पीने के लिए मना थोड़ी किया है लाइए दीजिए काफी। 😊

श्री हरि के हाथों से काफी ले लेती है और प्रिया के पास बेड कर आ जाती है श्री ने देखा हरि अभी भी वही है...
श्री ने हरि से पूछा क्या आपको कुछ चाहिए ? 🤔
हरि ने कहा नहीं मैं तो बस यूंही अच्छा मैं चलता हु ...
हरि वहां से जाता हुआ सोचता है  जानना है मुझे बहुत कुछ तुम्हारे बारे में क्या हो तुम क्या है तुम्हारे जीवन का आधार  
और भी बहुत कुछ ।😌

हरि सोचता सोचता ही सो जाता है अगले दिन हरि की आँख 3 बजे खुलती है । वो पानी पीने के लिए रसोईघर की तरफ जाता है किसी चीज से टकराता है । उसकी चीख निकलने वाली थी अचानक वो अधखुली आंखों से सामने देखता है । उसके सामने श्री बैठी हुई थी ध्यान योग की अवस्था में ।

कुछ पल के लिए हरि श्री को एक तक देख रहा था ।
हरि मन में बोला ये क्या है इतनी सुबह नहा भी ली और अब ध्यान लगा रही है ये कोई समय है भला 😳 ध्यान लगाने का । अचानक श्री अपनी आँख खोलती है । अपने सामने हरि को पा कर वो हैरान हो जाती है उसे यू अचानक से अपने सामने देखकर श्री की चीख निकलने वाली थी हरि उसके मुंह पर हाथ रख देता है और बोलता है चीखों मत मैं हु ....
और ये कोई समय है यहां बैठ कर ध्यान लगाने का ।
श्री हरि का हाथ अपने मुंह से हटाकर एक तरफ करते हुए बोली —आप यूं अचानक हमारे सामने आकर बैठ गए हमने आप को अचानक ही देखा तो हम डर गए इसलिए चीख निकल गई माफ कीजिए । 🥲
पर आप यहां क्या कर रहे है ?
हरि ने कहा वा मेरे सवाल मेरे से ये क्या बात हुई पहले तुम बताओ ये कोई समय है या बैठी हुई ध्यान मुद्रा में 
श्री ने कहा —ये तो हमारा नित्य नियम है प्रभु का ध्यान करना ।हमें नहीं लगता कि हमने किसी को 3 बजे परेशान किया 

हरि उसकी बात सुन कर बोला —(यार) तुम एक दम से हरि को गाड़ी वाली बात याद आई यार नहीं बोलना 😅हरि एकदम से बोला अरे नहीं मेरा मतलब है तुम इतनी सुबह कैसे उठती हो वैसे मैं भी 5 बजे उठ जाता हु लेकिन तुम तो मुझसे भी आगे 3 बजे ही वाओ। 🙃

श्री ने उसकी बात का जवाब देते हुए कहा हम इंसान चाहे तो किसी भी प्रकार से अपने शरीर को ढाल सकते है । मैने पिछले 5 वर्षों से नित्य ही इसी नियम का पालन किया इसलिए अब अगर मैं न भी चाहूं तो भी मेरी आंख 2:30 बजे खुल जाती है। और सुबह तो जल्दी ही उठना चाहिए मनुष्य को सदैव ही प्रकृति के अनुसार अपनी दिनचर्या का पालन करना चाहिए । 
हरि भी श्री की बातों से सहमत था । 

Dhanyawad 🙏🏻 
🙌🏻🙏🏻🕉️