श्री: संघर्ष एवं प्रेम - पाठ 1 Janshi Saroha द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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श्री: संघर्ष एवं प्रेम - पाठ 1

ये कहानी एक लड़की की है जिसका नाम श्री है ।श्री का पूरा शरीर भले की कुरूप था लेकिन पता नहीं कैसे उसका मुंह ठीक था । बोले तो सुंदर था । मुंह देख कर तो कोई कहे नहीं सकता था कि उससे कोई शरीर का रोग भी है ।लेकिन जब कोई हाथ पैर देखता तो सब का मन दुखी हो जाता । सब श्री की चिंता करते ।

और किस तरह से उसके कुरूप शरीर के बाद भी एक हरि नाम का सुंदर सा लड़का उसे प्यार करेगा .


तो ये कहानी तब से शुरू होगी जब श्री अपनी मां की कोक में थी । किन परिस्थितियों में उसका जन्म हुआ और संघर्ष करने के बाद किस प्रकार से उसका पूरा जीवन बदल गया । उसका प्यार उसकी किस्मत उसकी कामयाबी सब कुछ श्री को कैसे मिला ।
तो शुरू करते है श्री की कहानी ....


जब श्री अपनी मां गीता जी  की कोक में थी तब उसकी मां ने बहुत संघर्ष कर के उसे जन्म दिया । वैसे घर में किसी चीज की कमी नहीं थी गीता जी के पति सरकारी नौकरी करते थे अच्छी खासी सैलरी थी । लेकिन जिम्मेदारी बहुत थी शादी शुदा बहने और उनके पति सब एक परिवार में रहते घर के कामों से दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं था उनका । घर का सारा काम श्री की मां गीता जी करती । पैसे कमाने का काम गीता जी के पति कृष्ण जी का बाकी सब बैठ कर खाने वाले । आलसी प्राणी थे ।
अब कमाने वाला एक खाने वाले 10 तो गरीबी तो होगी ...

3 बहने और उनके पति उनके 3–3 बच्चे और इन सब का जिम्मेदारी केवल गीता जी और उनके पतिदेव कृष्ण जी उठा रहे थे ।

इतनी गरीबी थी और जिम्मेदारी की गीता जी अपनी कोक में पल रहे बच्चे के बारे में सोच ही नहीं पाई । गीता जी की  एक दोस्त थी सीता उन्होंने अपने बेटे और गीता जी के कोक में पल रहे बच्चे की शादी तक की बात कर दी थी उन्होंने कहा था अगर गीता जी को लड़की हुई तो वह उसकी शादी अपने बेटे से करेंगी दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलना चाहती थी । फिर एक दिन वो दिन आया जब श्री का जन्म हो गया लेकिन एक शरीर के रोग के साथ श्री का जन्म हुआ। श्री का पूरा शरीर में धारियां नजर आती थी हमेशा उसका शरीर फटा फटा सा रहता था । बस उसका चेहरा बच गया था किस तरह से पता नहीं क्या थी इसमे भगवान की इच्छा ...

लोग भी कहते कहा उसकी मां इतनी सुंदर कहा ये कुरूप। हां श्री को ऐसे ही कई सारे शब्द से पुकारा जाता था कुरूप, सड़ी हुई ख़ाल, बुढिया। 
और न जाने क्या क्या । अब ऐसी लड़की जो कुरूप हो उससे भला कौन ही शादी करता ।
सीता जी भी अपनी कही बात भूल गई । खैर उनकी गलती नहीं थी कौन माँ अपने बेटे के लिए कुरूप ब्याह कर लाती ।गीता जी को भी अपनी बेटी के लिए रोना आता एक तो बेटी और ऊपर से कुरूप ।क्या होगा उसका भविष्य । कौन करेगा उससे विवाह । 

छोटी सी श्री को क्या पता था लोग उसे क्या कहते है क्या नहीं । फिर एक दिन वो आया जब श्री का दाखिला  विद्यालय में हो गया । श्री बचपन से ही पढ़ाई में अच्छी थी बस ये एक कृपा अवश्य भगवान की चाहे शरीर कैसा भी हो लेकिन वो मन की बहुत अच्छी थी बचपन से दूसरों की मदद करने के लिए हमेशा आगे रहती । लेकिन स्कूल के बच्चे उसके पास न तो बैठते न उससे बात करते जब उनका मतलब निकल जाता तो वह श्री को अनदेखा करते थे। श्री को बहुत बुरा लगता लेकिन उसने भी धीरे धीरे खुद को संभाल लिया । और स्वीकार किया कि वो जैसे है वैसे ही ठीक है लोग अब कुछ भी बोले उससे चुप चाप सुन लेती थी। 
पहले तो बुरा लगता था पर धीरे सब की आदत सी हो गई अब क्या करे ।श्री ने सोच लिया था कि ये सब उसके पूर्ण जन्म के कर्म फल है जिससे कोई नहीं बच सकता 5th स्टैंडर्ड में ही उसमें इतना तो समझ आ ही गई थी । उसके माता पिता उसका जगह जगह इलाज करवाते लेकिन कोई आराम नहीं हुआ । अब तो श्री भी शो पीस बनते बनते थक गई थी जहां जाओ वही अपना सारा वर्णन दो कैसे हुआ क्यों हुआ लेकिन सबका जवाब एक ही आता की ये कभी ठीक नहीं हो सकती ।.. 😔

लेकिन श्री को पता था कि शरीर खराब है इसका मतलब ये नहीं कि वो कुछ कर ही नहीं सकती उसने अपनी किस्मत को स्वीकार किया अपने आप को भगवान को समर्पित कर दिया । आगे की रहा तो उससे केवल वही दिखा सकते थे ।
फ़िर वह 11th standard में आई और उसने निर्णय लिया कि वह अपने अंदर के डर को खत्म करेगी और अब एक नई श्री बनेगी जो अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीएगी कोई कुछ भी कहे लेकिन कभी भी विचलीत नहीं होगी ।
श्री ने कविताओं की रचना करना प्रारम्भ किया अपने स्कूल फंक्शन में वो अपनी कविता गाने लगी और उसकी सारी कविता देश के लिए होती। जोश से भरी हुई कविता जिसे सुनने वाले के अन्दर भी जोश भर जाता। उसका टैलेंट स्कूल में धीरे धीरे फेमस हो  गया । अब उसके थोड़े बहुत दोस्त बनने लगे । सारे लड़के उसे अपना बहन मानते । रक्षाबंधन में उससे राखी भी बनवाते ।




दरअसल ,
अब चाहे जो हो श्री का शरीर कैसा भी हो लेकिन सीने में तो उसके भी लड़की वाला दिल ही था । जो सपने देखता था किसी राजकुमार के पर जब भी बेचारी अपना शरीर देखती अपने मन को मार देती ।  
जैसे जब बारिश होती है मोर नाचता है कि वो कितना सुंदर है पर जब वो अपने पैर देखता है तो उदास हो जाता है वैसा ही श्री के साथ भी होता जब अपना मुंह देखती तो सोचती कि क्या कमी है उसमें लेकिन शरीर की तरफ देखकर सारे अरमानों को दबा लेती । उसकी माँ ने एक बार उससे अनजाने में ही अपनी दोस्त सीता की वो बात बताई थी कि वह दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलना चाहती थी । पर क्या करे श्री का शरीर ऐसा था कि कोई उससे छूना तो दूर उसे देखना भी पसंद न करे। लेकिन श्री के मन में तो ये बात घर कर गई । 
अब तो जब भी सीता जी और उनके बच्चे छुट्टियों में आते तो श्री उनसे मिलती । बहुत खुश होती पर अपनी शरीर की वजह से चुप ही रहती सोचती कि अपने मन की खुशी के लिए किसी और का जीवन बर्बाद नहीं करेगी । एक दिन 12th स्टैंडर्ड के बोर्ड एग्जाम में उसके 99.9 परसेंट नंबर आए। श्री और उसके माता पिता तो बहुत खुश थे लेकिन बाकी परिवार वाले तो तब भी ताने मारने से बाज नहीं आ रहे थे । 

Dhanyawad 🙏🏻 🕉️ 🙌🏻