सहते-सहते कमल चोपड़ा द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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सहते-सहते

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कमल चोपड़ा

​पहली बार ही ऐसा हुआ कि वह अपने पति के चेहरे को देखकर कुछ भी अनुमान नहीं लगा पा रही थी कि उसकी आज कहीं दिहाड़ी लगी या नहीं? पूछने पर पता चला कि वह खाली हाथ ही लौटा है। पति को हाथ-मुंह धोने के लिए कहकर वह चूल्हे की ओर बढ़ी तो पति ने उसे रोक दिया। पत्नी झुंझलाई कि दिहाड़ी नहीं लगी तो क्या हुआ, रोटी नहीं खाओगे? जिंदगी रहे तो काम तो लगता ही रहेगा। पत्नी ने मजाक में कहा कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि आज वह कहीं से बर्फी-पेड़े खाकर लौटा है जो आज उसे भूख ही नहीं है।​चौंकते हुए पूछा पति ने कि उसे कैसे पता चला कि सचमुच आज वह बर्फी-पेड़े ही खाकर लौटा है। इसीलिए उसे भूख नहीं है। आज तो उसने इतनी मिठाई खाई है कि जिंदगी में भी नहीं खाई होगी। पेट इतना भर गया है कि...।​पत्नी ने हैरान होकर पूछा कि इतने बर्फी-पेड़े खाने के लिए उसके पास पैसे कहां से आए? तो पति ने बताया कि आज रास्ते में उसका पुराना ठेकेदार मिल गया था। वह उसे अपने साथ अपने घर ले गया। आज उस ठेकेदार के बेटे का सगुन-टीका होना था। उनके घर उनके काम में थोड़ा हाथ बंटाना पड़ा। बाद में ठेकेदार ने उसे थाल में से जी भरकर बर्फी-पेड़े खा लेने की छुट्टी दी और उसने छककर खाए। और वह काफी देर मिठाई के स्वाद के बारे में पत्नी को बताता रहा। स्वाद के आनंद का बयान करना उसे बहुत मुश्किल पड़ रहा था, इसलिए बताते-बताते वह बार-बार अटक जाता था। अपनी हर बात में पेड़े और बर्फी का जिक्र वह बार-बार कर रहा था।​मिठाई की इतनी प्रशंसा पत्नी को कुछ अस्वाभाविक-सी लगी। पति को इसका अफसोस था कि वह खुद तो खा आया पर अपनी पत्नी व बच्चों के लिए बर्फी-पेड़े नहीं ला सका, क्योंकि उसे इसकी इजाजत नहीं मिल पाई थी। – कहते हुए उसका चेहरा कुछ बुझ-सा गया था।​उसका लटका हुआ चेहरा देखकर पत्नी का शक विश्वास में बदल गया था कि हो, न हो वह झूठ बोल रहा है, बर्फी-पेड़े खाकर लौटा है। ​अंदर-ही-अंदर उसकी रूह कांपने लगी कि अभाव, दुःख और परेशानियां झेलते-झेलते इन्हें कुछ हो तो नहीं गया? कहीं इनका दिमाग तो नहीं चल गया? अवश्य ही इनकी कोई दबी हुई इच्छा है जो इनसे इस तरह का व्यवहार करवा रही है।​अपने आप पर काबू पाते हुए उसने पति का बिस्तर बिछा दिया और दो मिनट बाद वापस आने का कहकर बाहर निकल गई।​कुछ देर बाद लौटी तो उसके हाथों में हलवाई से खरीदे गए बर्फी-पेड़े का पैकेट था। पति की ओर बढ़ाते हुए उसने कहा कि अगर उसका बर्फी-पेड़े खाने को मन था तो वह पहले बताता तो वह पहले ही ले आती। पैसे अपनी मालकिन से मांग लेती जैसे कि आज मांग कर लाई है। मिठाइयों का क्या है? वह अपने पति पर बर्फी-पेड़े के हजारों थाल वारकर फेंक सकती है।​अब हैरान होने की बारी पति की थी कि इसे कुछ हो तो नहीं गया? मैं आज जी भरकर बर्फी-पेड़े खाकर लौटा हूं और ये अपनी मेहनत की कमाई से मेरे लिए फिर से बर्फी-पेड़े ले आई है। मैं खा भी नहीं पाऊंगा। और ये...? अभाव, दुःख और परेशानियां झेलते-झेलते कहीं इसका दिमाग तो नहीं चल गया?