देश के लिये कमल चोपड़ा द्वारा बाल कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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देश के लिये

​देश के लिये

कमल चोपड़ा   ​

      पूरी कक्षा बड़े ध्यान से सरला मैडम की बात सुन रही थी। मैडम कह रही थीं—​“ईश्वर ने इंसान को इतनी शक्ति दी है कि वह असंभव को भी संभव बना सकता है। ऐसा कुछ भी नहीं जो वह नहीं कर सकता। शारीरिक शक्ति काम न आ रही हो तो बुद्धि से मुश्किल-से-मुश्किल काम भी आसानी से कर सकता है। इंसान के मस्तिष्क में इतनी शक्ति होती है कि अपने जीवन में वह इसका पूरा-पूरा उपयोग भी नहीं कर पाता है, इसलिये हर व्यक्ति को अपने लिये कोई-न-कोई लक्ष्य निर्धारित कर लेना चाहिये और उसी के अनुसार परिश्रम करने में जुट जाना चाहिये। बुद्धि का भी उपयोग करना चाहिये। उसका मस्तिष्क उतना ही अधिक विकास करेगा........”​कहते-कहते मैडम एकाएक चुप हो गई। फिर बोलीं—“जैसे मैंने अध्यापिका बनने का लक्ष्य निर्धारित किया था और मैं अध्यापिका बन गई। क्या तुमने भी अपने लिये कोई लक्ष्य तय किया है कि मैं डॉक्टर, वकील या कुछ और बनूँगा?”​कक्षा में खुसर-पुसर शुरू हो गई। पीछे से किसी ने दबी जुबान में कहा—‘मैं तो हीरो बनूँगा।’ पूरी क्लास हँस पड़ी। किसी ने धीमी आवाज में...​कहा—'मैं डॉन बनूँगा।' कोई बोला—'मैं राउडी राठौर।' क्लास में हँसी के फव्वारे फूट रहे थे। मैडम ने सबको चुप कराते हुए कहा—"कौन क्या बनना चाहता है? अच्छा आप लोग एक-एक करके बताओ।"​एक-एक करके सभी विद्यार्थी बताने लगे। कोई बोला—'मैं डॉक्टर बनना चाहता हूँ।' कोई बोला—'मैं इंजीनियर बनना चाहता हूँ।' कोई बोला—'मैं कम्प्यूटर इंजीनियर।'​शाश्वत ने कहा—"मैडम, यह तो सपना देखनेवाली बात हो गई।"​मैडम ने कहा—"सपने देखना तो अच्छी बात है। सपने देखना, फिर उन्हें साकार करने के लिए जुट जाना चाहिये। तभी सपने सच्चे होते हैं, साकार होते हैं। सपने देखकर उन्हें पूरा करने के लिये कुछ नहीं किया तो वो खयाली पुलाव ही रह जाते हैं सच नहीं होते। सपना वो होता है जो जागते हुए देखा जाये और जो आपको सोने ना दे। सपने साकार करने के लिये लगन और बहुत परिश्रम जरूरी हैं।"​शाश्वत ने कहा—"मुझे वकील बनना है। इसके लिये मैं आज ही से परिश्रम करना शुरू कर दूँगा।"​अब शाश्वत के पास बैठे सजग की अपना लक्ष्य बताने की बारी थी। सजग चुपचाप अपने काम से काम रखनेवाला लड़का था। वह नवीं कक्षा में पढ़ता था। वह चौदह वर्ष का था। उसके पिता किताबों पर जिल्द बाँधने का काम करते थे। उसकी एक टाँग खराब थी, जिसकी वजह से चलने के लिये उसे बैसाखी का सहारा लेना पड़ता था।​खड़ा होने के कुछ क्षण तक वह चुप रहा फिर ऊँचे स्वर में बोला—"मैं देश का सिपाही बनना चाहता हूँ। मेरी इच्छा है कि मैं देश के लिये कुछ ​करूँ क्योंकि देश का नागरिक होने के नाते देश के प्रति मेरा फर्ज है कि मैं देश की सेवा करूँ।"​क्लास में खुसर-पुसर होने लगी। कोई धीमी आवाज में कह रहा था— 'पागल तो नहीं है यह?' कोई कह रहा था— 'ठीक से चल-फिर सकता नहीं, सीमा पर जाकर दुश्मनों से लड़ेगा?' पीछे से एक आवाज आई— 'अरे! सेना में इसे भर्ती कौन करेगा?' कोई हैरानी जता रहा था— 'अरे दिव्यांग है फिर भी ऐसा सपना देख रहा है...... दिमाग तो ठीक है इसका? किसी ने कहा— 'सैनिक!'   ​'टाँग के साथ-साथ दिमाग से भी लाचार है?' कोई अपनी हँसी को रोकने की कोशिश कर रहा था। बेचारा ......   ​मैडम ने डाँटकर सबको चुप कराया। फिर बोलीं, "मान लो तुम सिपाही नहीं बन सके तो..... इसके अलावा तुम क्या बनना चाहोगे?"  ​कुछ क्षण खामोश रहने के बाद सजग ने फिर दृढ़ स्वर में कहा— "मुझे तो देश की सेवा करने के लिये देश का सिपाही बनना है। बस कुछ कर दिखाना है।"   ​छुट्टी मिलते ही ज्योंही सजग स्कूल के मेनगेट से बाहर निकला, उसको क्लास के लड़कों ने घेर लिया और उसका मजाक उड़ाने लगे— "जब तू बॉर्डर पर लड़ने के लिए पहुँचेगा तो दुश्मन तेरी बैसाखी को देख... डरकर भाग जायेगा। बस बैसाखी को गन की तरह दुश्मन की तरफ उठा देना।"  ​दूसरे लड़के ने कहा— "फौजी की तरह मौत मरेगा तो इसकी तो बैसाखी नीचे गिर पड़ेगी......... हा हा.........."​लड़के हँस रहे थे। उसे छेड़ रहे थे। सजग पर क्या बीत रही थी। वह ही जानता था। शर्म और झेंप के मारे उसकी आँखों में आँसू आ गये थे।​उसका मन हो रहा था कि धरती फट जाये और वह उसमें समा जाये। वह उन लड़कों से लड़ा। अगर उसका पैर खराब है तो इसमें उसका क्या कसूर है? भगवान ने किसी को कैसा तो किसी को कैसा बनाया; उसे ऐसा बनाया है तो इसमें उसका क्या कसूर?​कुछ देर बाद वे लड़के आगे बढ़ गये। सजग जहाँ का तहाँ अकेला खड़ा रह गया। फिर वह स्कूल की दीवार के साथ बनी थड़ी पर बैठ गया। उसकी रुलाई ही फूट पड़ी। आँखों से आ रहे आँसुओं को वह बार-बार पोंछ रहा था।​कुछ देर बाद उसे लगा कोई उसके पास आकर खड़ा हो गया है। अपना सिर ऊपर उठाकर उसने देखा। सामने सरला मैडम खड़ी थीं। हड़बड़ाकर वह भी उठ खड़ा हुआ। मैडम के पूछने पर उसने पूरी बात बताई। पूरी बात सुनकर एक बार मैडम का चेहरा भी उतर गया।​भर्राये स्वर में सजग ने कहा, "शायद मैंने गलत सपना देखा? लक्ष्य ही गलत बनाया। मैं इस योग्य नहीं था कि....?"   ​एकदम सख्त स्वर में सरला मैडम ने कहा—"नहीं, तुम्हारा लक्ष्य एकदम सही है। इरादा पक्का हो तो सिर्फ तुम ही उस लक्ष्य के योग्य होगे। योग्यता तो परिश्रम से अपने में लाई जाती है।"   ​"लेकिन मिलिट्री में मुझे भर्ती करेगा कौन?"   ​"सेना में सीमा पर लड़ने के अतिरिक्त भी बहुत से काम होते हैं। सैनिकों का खाना बनानेवाले, मिलिट्री की गाड़ियाँ चलानेवाले ड्राइवरों की जरूरत होती है। मिलिट्री अस्पताल में सैनिकों के इलाज के लिये डॉक्टरों की जरूरत होती है। बड़े-बड़े इंजीनियरों की जरूरत होती है। सेना के रिसर्च और विकास के लिये वैज्ञानिकों की आवश्यकता होती है। ऐसे दर्जनों काम हैं जिनके​लिये लोगों की आवश्यकता पड़ती है। यह तुम्हें खुद निर्णय करना है कि तुम्हें सेना में क्या सेवा करनी है। तुम परिश्रम करके अपने में योग्यता लाओ।"​सजग समझने की कोशिश कर रहा था। मैडम कह रही थीं— "तुम्हारा लक्ष्य देश की सेवा है न, तो देश की सेवा तो तुम कहीं भी रहकर कर सकते हो। तुम आज से ही अपने-आपको एक सिपाही समझो— देश का सिपाही। वैसे, तो देश के हर नागरिक को देश का सिपाही होना चाहिये। क्योंकि देश के दुश्मन सीमा के बाहर ही नहीं देश के अंदर भी हैं.... हमें उनसे अपने देश को बचाना चाहिये। इन दुश्मनों से लड़ना चाहिये। सीमापार के दुश्मनों से तो देश के अंदर के दुश्मन ज्यादा खतरनाक हैं क्योंकि वे हमारे-तुम्हारे जैसा बनकर रहते हैं। हमें उन्हें पहचानना चाहिये और उन्हें दण्ड दिलाना चाहिये। हमें जहाँ कुछ गलत होता दिखे, हमें वहीं उसका विरोध करना चाहिये। जो भी जहाँ भी कोई कानून तोड़ता दिखाई दे, हमें उसे पकड़कर कानून के हवाले कर देना चाहिये। असहायों की सहायता करना भी देश के सच्चे सिपाही का कर्तव्य है। देश का हम पर जो ऋण है उसके नाते हम सभी को पहले देश का सोचना चाहिये। सभी देश के सच्चे सिपाही बनें। अपनी आँख और कान खुले रखें। हर वक्त चौकन्ने रहें, छिपे हुए गद्दारों, भ्रष्टाचारियों, मिलावटखोरों, आतंकवादी, षड्यंत्रकारियों, जमाखोरों, टैक्स चोरों, रिश्वतखोरों का पता लगायें और उन्हें बेनकाब करें? कानून और पुलिस की सहायता करें।"   ​सजग ने अपनी आँखें पोंछीं; मैडम ने देखा कि उसकी आँखें, फिर से चमक उठी थीं। मैडम ने कहा— "आज से तुम मेरे छोटे भाई हो! कभी भी मेरी मदद की जरूरत महसूस हो तो मुझे फोन करना, मेरे घर चले आना।​मेरे पति ए. सी. पी. श्री विक्रम सिंह भी इस काम में तुम्हारी मदद करेंगे, याद रखना, आज से तुम देश के सच्चे सिपाही हो!"​"जी दीदी!"​घर लौटते हुए सजग के कदमों में एक नया जोश और उत्साह भर गया। अपनी बैसाखी को वह सड़क पर ऐसे फटकारकर चल रहा था जैसे एक सिपाही अपना डंडा फटकारता हुआ चल रहा हो!     ​वह सोच रहा था—"मैं अपनी बैसाखियों को अपनी ताकत बना लूंगा। मेरी बैसाखी मेरी बन्दूक है। जब बन्दूक मिलेगी तो उसे बगल में दबाकर बैसाखी बना लूँगा!"