चंगुल कमल चोपड़ा द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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चंगुल

चंगुल   
                         कमल चोपड़ा   

                    ​लड़की का चेहरा नहीं दिखाया गया था। धुंधले अक्स और आवाज़ के ज़रिए ही माँ-बाबूजी ने पहचान लिया था। उन्होंने कभी सोचा न था कि उनकी बेटी रोमांचक खबर बन जाएगी। एक साल पहले, अचानक गुम हो जाने के बाद, आज उसकी खोज-खबर न्यूज़ चैनल के ज़रिए उन तक पहुँच रही थी। उनके कोठरीनुमा घर में जैसे कोई ज्वालामुखी फट पड़ा था। ख़बर का एक-एक शब्द बहते-बरसते गरम लावे की तरह उनके वजूद को झुलसा रहा था— “बंबई पुलिस ने आज नारी शक्ति संगठन की कार्यकर्ताओं के साथ छापा मारकर एक गिरोह के चंगुल से आठ लड़कियों को आज़ाद करवाया। भोली-भाली लड़कियों को बहला-फुसलाकर शादी का झाँसा देकर यह गिरोह यहाँ लाकर उन्हें देह व्यापार के लिए मजबूर करता था और दिल दहला देनेवाली यातनाएँ देता था....”​आज़ाद कराई गई लड़कियाँ टीवी के पर्दे पर रोते-सुबकते अपने साथ हुए ज़ुल्मों का मुख़्तसर-सा बयान कर रही थीं। एहतियातन उनके चेहरे धुंधले ही दिखाए गए थे। बीच-बीच में ‘नारी शक्ति’ की मंजुला मैडम का खिला हुआ चेहरा बार-बार पर्दे पर उभर रहा था।​माँ और बाबूजी को काटो तो खून नहीं। अब वे अपना चेहरा किसे और कैसे दिखाएँगे? सारी दुनिया देख रही होगी ये ख़बर। इकलौती बेटी थी। ढूँढ-ढाँढकर थककर बैठ चुके थे। सोचा था अपने किसी प्रेमी के साथ भाग गई होगी। शादी करके रह रहे होंगे। भगवान ने चाहा और उनकी अक्ल ठिकाने आ गई, तो लौट आएँगे, पर....? लोग थू-थू करेंगे उन पर.... लोगों को तो मौका चाहिए। कैसे रह पाएँगे ये अब, इस समाज में? उनकी बेटी और वेश्या? इसमें उनका क्या दोष? लड़की का भी क्या दोष? उसके साथ तो उल्ट्या ज़ुल्म हुआ? नकली सहानुभूति, तकलीफदेह ताने, चुभता उपहास और भेदती नज़रें..                 दुनिया के सामने, जैसे नंगे हो गए हैं माँ और बाबूजी। फोन की घंटी बज रही थी। जिन्होंने ये खबर सुनी होगी, जले पर नमक छिड़ककर मज़ा लेनेवाले, वे रिश्तेदार होंगे। घंटी लगातार बज रही थी। कब तक कटेंगे वे दुनिया से? फोन नहीं उठाया तो वे यहाँ आ धमकेंगे। वे फोन की ओर बढ़े।​फ़ोन स्थानीय पुलिस चौकी से था— “आपने लड़की के गुम होने की रिपोर्ट लिखवाई थी न, लड़की मिल गई है। कुछ गुंडों के चंगुल में थी। आपको हमारे साथ मुंबई चलना होगा। थोड़ी कार्रवाई के साथ लड़की आपको सौंप दी जाएगी।”​बाबूजी की आवाज़ गुम हो गई थी। थानेदार कड़क रहा था— “बोलते क्यों नहीं? लड़की मिल गई, अब आप कहाँ गुम हो रहे हैं?”​“हम दोनों अस्पताल जा रहे हैं, दवाई लेने। वापिस आते ही हम खुद ही पुलिस चौकी पर हाज़िर हो जाएँगे?” वह बोले।​उनका मन हुआ वे कहीं भाग जाएँ। सचमुच ही ये कहीं गुम हो जाएँ। समाज की हमदर्दी, तानों और उपहास से बच सकें। अगले दिन सुबह पुलिस घर आ पहुँची थी— “आपको इसी वक्त हमारे साथ मुंबई चलना होगा, वरना मीडियावाले यहीं आ पहुँचेंगे....”​“टालने की कोशिश मत कीजिए। आप ऐसा क्यों कह रहे हैं, मैं समझ सकता हूँ, मैं भी एक बेटी का बाप हूँ।”​फुसफुसाती आवाज़ में बाबूजी ने कहा— “क्या पता, वो हमारी बेटी ही न हो?”​माथे पर बल पड़ गए थानेदार के। सख्त और सूखी आवाज़ में बोला “मुझे पता था, आप यही कहेंगे। लड़की ने खुद नाम-पता बताया है, आप अपनी इज़्ज़त देख रहे हैं? समाज से डर रहे हैं, जबकि हम, आप ही तो समाज हैं, फिर भी? पता चला है, वहाँ छुड़वाई गई आठ लड़कियों में से छह के माँ-बाप ने कह दिया है, ये हमारी बेटियाँ नहीं हैं। एक के माँ-बाप मर चुके हैं और एक आप.... वापिस उसी नरक में धकेल रहे हैं उसे? खुद अपने हाथों से?”​माँ की रुलाई फूट रही थी— “मुझे ले चलो मेरी बेटी के पास....”​एकदम सुन्न खड़े बाबूजी की ओर मुँह करके थानेदार ने पूछा— “अपनी बेटी को वापिस नहीं लाओगे तो उन गुंडों और आप में फ़र्क ही क्या रह जाएगा?”