खुदकुशी
कमल चोपड़ा
रातभर तेज़ आंधी के साथ बरसात और ओले उन दोनों के दिलो-दिमाग पर हथगोलों की तरह गिर रहे थे। रह-रहकर सतवंत सिंह खेत पर जाने के लिये उठ खड़ा होता। उसकी पत्नी कुलवीर कौर उसकी बाँह पकड़कर रोक लेती— “कुदरत के आगे इन्सान की क्या औकात?”कुछ दिनों से रह-रहकर चल रही तेज़ आंधी ओले और बरसात ने इलाके भर की फसलों को बरबाद कर दिया था। गाँव भर की औरतों की तरह कुलवीर कौर भी अपने पति सतवंत सिंह को लेकर बहुत चिंतित थी कि वह कुछ कर न बैठे। रोज़ाना ही तो खबरें आ रही थीं कि किसान आत्महत्या कर रहे हैं— कर्जों में डूबा किसान करे भी तो क्या? बीज, खाद, पानी और कीटाणुनाशक हर चीज़ में तो पैसा खर्च होता है। अब फिर से कर्ज लो, हाड़ तोड़ मेहनत करो। खुद भूखे रहकर दूसरों का पेट अन्न से भरो। तंगहाली और बदहाली खुद झेलो। सेठ, दलाल, सरकार और अब तो जैसे कुदरत भी किसान को खुदकुशी करने के लिये मजबूर कर रहे हैं।कुलवीर कौर का दिल दहलने लगा। सुबह उठते ही सतवंत सिंह खेत की ओर चला गया। एकाएक कुलवीर कौर को ख्याल आया कीटनाशक एल्डरेक्स थर्टी घर में पड़ी है। बहुत तेज़ ज़हर है। एक एकड़ के कीड़े मारने के लिये आधा लीटर ही काफी है। इतनी मात्रा इंसान पी ले तो उसे भगवान भी नहीं बचा सकता। कहीं यह दवाई सतवंत के हाथ न लग जाये!!एकाएक कुलवीर कौर उठी। उसने कीटाणु नाशक दवाई का डिब्बा एक खाली लोहे के ट्रंक में डाला। ट्रंक को ताला लगाया, परछत्ती पर चढ़कर वहाँ पड़े सामान के पीछे छिपा दिया ताकि उसके पति सतवंत के हाथ न लग सके। परछत्ती से उतरते वक्त उसका पैर फिसल गया। वह नीचे जा गिरी और उसकी टाँग की हड्डी टूट गई। कुछ क्षण के लिये उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। वह अपने आपको कोसने लगी। मैं तो अपने घरवाले को बचाने चली थी, एक और परेशानी खड़ी कर दी। कोढ़ में खाज! बैंक के रिकवरी वाले कर्ज़ा वापिस माँगने के लिए पहले ही से चक्कर काट रहे हैं।सतवंत खेत से लौटा तो पत्नी को यों पड़ा देखकर घबरा गया। वह दौड़कर गाँव के डॉक्टर को बुला लाया। उसने कहा– “टाँग की हड्डी टूट गई है। शहर ले जाओ। पलस्तर लगवाना होगा। तीन–चार हज़ार का खर्चा है।”तड़पकर रह गया सतवंत– “सिर पर पहले से कर्ज़ है। हे भगवान, अब कौन सी परीक्षा ले रहे हो? बरसात ने पहले ही कमर तोड़ रखी है। पल्ले फूटी कौड़ी नहीं, ऊपर से ये खर्चा....? अब किससे माँगूँ?”न चाहते हुए भी उसने अपने तीन–चार जान–पहचान वालों के पास जाकर उधार माँगा। सबने अपनी–अपनी असमर्थता जता दी। एकाएक उसे लाला रामपत की याद आई। वह उनके पास जा पहुँचा और अपनी परेशान बताकर कुछ पैसे उधार माँगे। छूटते ही लाला जी ने कहा– “देख भाई, बात ये है कि अब हमने किसानों को कर्ज़ देना बन्द कर दिया है। रोज़ ही तो खबरें आ रही हैं कि किसान आत्महत्या कर रहे हैं। पता नहीं कौन कब आत्महत्या कर ले? कल तूने भी खुदकुशी कर ली तो तेरे बाद किसको पकड़ेंगे? किसकी माँ को मासी कहेंगे? मेरे पैसे तो गये न चिता में।”थके कदमों से वह लौट पड़ा। उसकी आँखों के सामने लाला, दलालों और सरकारी लोगों के चेहरे घूम रहे थे। एकाएक वह मुड़ा और बोला– “किसान को मजबूर करके मारोगे तो खुद भी मरोगे। सोच के देखो, तुम खुद भी खुदकुशी कर रहे हो।”