पुरस्कार
कमल चोपड़ा
सदानंद एक सीधा-सादा आदमी था। वह मेहनत-मजदूरी कर अपना और अपने बच्चों का पेट पालता। रोजाना की तरह आज भी वह काम पर जा रहा था कि किसी ने पीछे से आवाज देकर उसे रोका, "अरे, सदानंद! आज तुम काम पर जा रहे हो? पता है आज हमारे गाँव दीनेपुर में सच्चिदानंदजी महाराज आ रहे हैं। लोग उनके दर्शन मात्र को तरसते हैं और तुम...? अरे, चलो आज तुम भी महाराज के दर्शन कर लो..."
सदानंद ने सोचा, काम तो लगे ही रहते हैं। चलो, आज मैं भी कुछ ज्ञान प्राप्त कर लूँ। वह भी उनके साथ हो लिया।
एक भव्य पंडाल में महाराज जी उपदेश दे रहे थे। वहाँ हजारों की संख्या में लोग थे। सदानंद भी भीड़ में होता हुआ किसी तरह आगे पहुँच गया और मंच के पास जाकर बैठ गया। महाराज की बातें उसे ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायक लग रही थीं।
लोग मंच के नजदीक आते। महाराज के आगे रूपए-पैसे आदि चढ़ाते। महाराज को प्रणाम करते और आगे बढ़ जाते। शाम होते-होते महाराज के आगे रूपयों, पैसों का ढेर लग गया। महाराज की दृष्टि उस ढेर पर पड़ी तो वह बोले, 'प्रिय भक्तजनों, आपको तो मालूम है, हम साधु-संन्यासी हैं। हमें इस माया से क्या काम है। खैर आप लोगों ने इतनी श्रद्धा से मुझे ये भेंट दी है तो मैं आप लोगों का मान अवश्य रखूँगा। यह धन इसी गाँव के किसी ऐसे व्यक्ति को पुरस्कार स्वरूप दिया जाएगा, जिसने अपने जीवन में कोई बड़ा परोपकार का कार्य किया हो।'
महाराज की घोषणा सुनते ही भीड़ में खलबली मच गई।
'धन्य हैं महाराज, अब देखें यह पुरस्कार किसे मिलता है।'
'जिसे यह पुरस्कार मिलेगा उसकी तो वाह-वाही हो जाएगी।'
'योग्य व्यक्ति को ढूँढ़ना बड़ा मुश्किल काम है। बड़े-बड़े परोपकारी आदमी बैठे हैं...'
उधर महाराज अपने सहायकों और गाँव के कुछ प्रतिष्ठित व्यक्तियों से योग्य व्यक्ति के बारे में विचार-विमर्श कर रहे थे और इधर गाँव वाले अटकलें लगा रहे थे।
'मुझे तो लगता है यह पुरस्कार सेठ जमनालाल को मिलेगा, जिन्होंने पिछले दिनों गरीबों में कंबल बाँटे थे।'
'देख लेना यह पुरस्कार लाला रोशनलाल को ही मिलेगा। पिछले दिनों उन्होंने पूरे गाँव में भंडारा करवाया था। गाँव भर ने मजे ले-लेकर खीर-पूड़ी उड़ाई थी।'
'अरे, यह पुरस्कार तो करोड़ीमल को भी मिल सकता है, जिन्होंने गाँव में अपने पिता की याद में मंदिर बनवाया था।'
अरे, बड़े-बड़े दानी बैठे हैं। जिसके पास माल होगा वही दान-पुण्य करेगा और मालदार को पुरस्कार मिल गया तो और मालामाल हो जाएगा...'
पुरस्कार किसे मिलेगा, जानने के लिए लोग बेचैन हुए जा रहे थे।
काफी देर बाद सच्चिदानंद जी महाराज बोले, 'भक्तजनो, यह पुरस्कार किसे दिया जाएगा, इसका निर्णय करना बहुत कठिन काम था, लेकिन मेरे सहायकों ने आखिर इसे हल कर ही लिया। तो सुनिए, यह पुरस्कार आप ही के गाँव के एक सीधे-सादे आदमी सदानंद को दिया जाता है।'
महाराज जी के घोषणा करते ही गाँव भर में खलबली मच गई- 'सदानंद ने ऐसा क्या पुण्य कर दिया। वह तो एक मामूली-सा गरीब आदमी है। इतने बड़े-बड़े दानी सेठों को छोड़कर महाराज ने उसे पुरस्कार देने की घोषणा क्यों कर डाली?' सदानंद भी हैरान था। उसे समझ नहीं आ रहा था, उसने कौन-सा काम कर दिया है जिसके लिए उसे महाराज पुरस्कृत करने वाले हैं? सदानंद ने डरते हुए महाराज जी से कहा, 'महाराज, मैं एक मामूली, गरीब मजदूर हूँ। आप से अवश्य ही कोई भूल हुई है। मैं इस पुरस्कार के योग्य नहीं हूँ।'
महाराज जी ने मुस्कुराते हुए कहा, 'नहीं, तुम ही इस पुरस्कार के योग्य हो। मेरे सहायकों ने अच्छी तरह पता लगा लिया है। यह पुरस्कार तुम्हें गाँव के बाहर से गुजर रही सड़क पर स्थित कंकर चौक के पास एक पेड़ लगाने के लिए दिया जा रहा है।'
'एक पेड़ लगाने के लिए!' हैरानी से लोगों के मुँह से निकला।
'हाँ, उस एक पेड़ के नीचे जाने कितने थके-हारे यात्री रोजाना विश्राम करते हैं। यह वृक्ष शुद्ध हवा देकर जाने कितने लोगों को स्वास्थ्य लाभ कराता रहेगा। इसकी घनी छाया में ताजा हो, लोग आगे बढ़ जाते हैं। कितने पक्षी उस पर अपना बसेरा किए हुए हैं। उसकी सूखी टहनियों से कितनों के घर चूल्हा जलता है। उस पेड़ के मीठे फल खाकर कितने ही लोग तृप्त होते हैं और आगे भी न जाने कितने वर्षों तक वह वृक्ष लोगों का भला करता रहेगा। भक्तजनो, हमारे प्राचीन ग्रंथों में लिखा है कि जो व्यक्ति अपने जीवन में एक पीपल, एक नीम और पाँच फलदार वृक्ष लगा देता है उसे इससे असीम पुण्य प्राप्त होता है। इसलिए निश्चित रूप से सदानंद ही इस पुरस्कार को पाने के योग्य है।'
महाराज की बातें सुनकर लोगों ने उनके निर्णय का समर्थन किया और जोरदार तालियाँ बजाकर खुशी जताई। सदानंद ने इतना बड़ा पुरस्कार पाकर महसूस किया कि अगर एक पेड़ लगाने से इतना पुण्य मिलता है तो और अधिक पेड़ लगाने से कितना पुण्य मिलेगा? मैं जीवन भर पेड़-पौधे लगाता रहूँगा।