राधा का संगम - प्रकरण 13
दादू अपनी साली को बहन मानते थे.. ऊस से राखी बंधवाना भी चाहते थे.. ऊस ने सुहानी को गुजारिश भी की थी.
लेकिन ऊस ने यह कहकर झुठला दिया था की ऊस की मा मना कर रही हैं. वह रिश्ते बदलने के खिलाफ थी.
" भगवान ने हमे जो रिश्ते से जोड़ा हैं उसी को निभाना चाहिये."
हसमुख भी ऊस बात के खिलाफ था.
दादू ने उसे गुजारिश की थी.
" तुम मुझे बड़े भैया कहकर बुलाओ. "
" क्यों? " ऊस ने सवाल किया था.
" उसी में मुझे अपनापन का एहसास होगा.. "
दादू के कहने पर ऊस ने अपने जीजू को ' बड़े भैया ' कहकर बुलाना शुरू किया था लेकिन ऊस में कोई गहराई नहीं थी, अपनेपन का कोई एहसास नहीं था.. वह केवल औपचारिक बन कर रह गया था.
' गुड मोर्निंग बड़े भैया! '
' गुड इवनिंग बड़े भैया!! '
' गुड नाईट बड़े भैया!!! "
दादू ने अपनी साली को सही मायने में अपनी बहन के रूप में स्वीकार लिया था. लेकिन ऊस घर में इस रिश्ते की कोई इज्जत नहीं थी.
दादू भी ऊस वक़्त एक बात भूल गये थे.
" सगे बाप बेटी को भी ज़्यादा समय अकेले, एकांत में नहीं रहना चाहिए. "
सुहानी के अतीत ने अपने भीतर छिपे शत्रु को भड़काया था और अपनी साली के साथ दुर्व्यवहार कर बैठे थे जिस का ऊस ने कोई विरोध नहीं किया था. ना तो उन्हें रोका था.
दादू को अपनी गलती का एहसास था. ऊन्हो ने सुहानी की मांफी भी मांगी थी और किसी को बताने से इन्कार किया था.
अपने भीतर के शत्रु को वह भाई की ढाल बनाकर महात करना चाहते थे.
लेकिन ससुराल में मा के व्यवहार ने उसे कामयाब नहीं होने दिया था. वह दो तरफा बातें करती थी.
" स्त्री चाहे तो किसी भी स्त्री को भी अपने पति को भी राखी बांध सकती हैं. "
और दूसरी ओर एक साली को अपने जीजू को राखी बांधने से रोक रही थी..
सुहानी के लिये पेपर में अमेरिकन लड़के की शादी का इश्तेहार छपा था. यह देखकर दादू खुश हो गये थे. ऊस लडके के साथ सुहानी की शादी हो गई हैं और वह अमरिका चली गई हैं ऐसी कल्पना कर के सर्टिफिकेट नाम की लघु कथा का सर्जन किया था
जिसे पढ़कर सुहानी की आंखे भर आई थी
दादू हकीकत में ऊस लडके को मिलने ऊस के घर गये थे, जरुरी सारी बातें भी की थी, होरोस्कोप से शुरू ऊस की पढ़ाई के प्रमाण पत्र भी पैश किये थे.
उन्होंने दादू को बताया था. " हम आप को फोन करेंगे. "
लेकिन बात आगे नहीं बढी थी.
फिर बहुत कोशिश की लेकिन कुछ नहीं हुआ. और ऊस की बडी मा ने दादू को घर बुलाकर झटका दिया था.
" सुहानी प्रेग्नेंट हैं. उसे अपने घर ले जाओ. और ऊस का गर्भपात कराओ.. पैसे की चिंता मत करना. और हा यह बात किसी को मालूम नहीं होनी चाहिए. "
पुलिस स्टेशन की घटना के बाद सुहानी कभी दादू के घर नहीं आई थी.. इस लिये दादू के माता पिता और बीवी को अचरज हुआ था.
दादू अपनी बीवी और सुहानी को बाहर ले जाकर सच्चाई बताई थी.. सुनकर एक पल उसे अपनी बहन पर गुस्सा आया था. पर दूसरे हीं पल उसे मदद करने को तैयार हो गई थी.
और दादू उसे अपनी बीवी बनाकर मेटरनिटी होम ले गये थे और डोक्टर को कहां था.
" यह मेरी बीवी आशा हैं हमारी कुछ महिने पहले शादी हुई हैं और वह सगर्भा हैं. वह काफ़ी कमजोर हैं वह बच्चे को जन्म देने के लिये मानसिक रूप से तैयार नहीं तो ऊस का क्या उपाय हैं? "
डोक्टर ने ठंडे कलेज़े उत्तर दिया था
" क्यूरिटीन! "
" कितना पैसा लगेगा और कितना रुकना होगा? "
" खर्चा तो 1000 रुपया होगा. "
" साब! कुछ कम नहीं. हम गरीब हैं अभी अभी जोब लगा हैं. "
"यह तुम्हे सोचना चाहिए था, तुम दोनों पढ़े लिखें हो. "
" सर! फिर भी कुछ कम करो. "
" ठीक हैं 200 रूपये कम देना. और उतना हीं एडवांस देना होगा. "
" ठीक हैं! " कहकर दादू ने 200 रूपये डोक्टर के सामने ऱख दिये थे
डोक्टर ने उन्हें काउंटर पर जमा करने को कहां था.
केबिन से बाहर निकलते हुए दादू ने उसे सवाल किया था .
" कितना समय यहाँ रुकना पड़ेगा. "
" सर्जरी को तो ज़्यादा समय नहीं लगेगा.. लेकिन कलोरोफोम की वजह से ऊस को होंश नहीं आयेगा. सर्जरी के बाद तीन चार घंटा रुकना पड़ेगा.. "
" ठीक है! " कहकर दादू केबिन से बाहर आये थे और दो नर्स सुहानी को ओपरेशन थियेटर में ले गई थी.
और दादू बाहर विजिटर रूम में बैठ गये थे .
हर पल उन्हें कुछ अनिष्ट होने का भय सता था था.
उन्होंने घर फोन कर के बीवी से बात की थी.
" भाभी! मामा के घर जाकर 600 रूपये लेकर अस्पताल में आ जाना. "
ऊस की सर्जरी हो गई थी. उसे जनरल वॉर्ड में लाया गया था सुहानी बेहोश थी. निश्चिंचेतन दशा में सो रही थी. यह देखकर वह डर से गये थे उन्होंने ने सुहानी को जगाने का प्रयास किया था लेकिन ऊस ने कुछ रियेक्ट नहीं किया था . यह देखकर वह काफ़ी परेशान थे. नर्स से उसे दिलासा दिया था.
" फ़िक्र मत कीजिये वह सो रही हैं.. "
ऊस वक़्त नर्स ने हमदर्दी जताकर दादू को सांत्वन दिया था.
. एक घंटे के बाद उन की बीवी पैसे लेकर प्रसूति होम में दाखिल हुई थी.. ऊस ने एक जेठानी के नाते सुहानी की खबर पूछी थी और पैसे देकर एक मेहमान की तरह चली गई थी.
ठीक चार बजे सुहानी को होंश आया था.. और डोक्टर ने उसे घर ले जाने की अनुमति दी थी और दादू बाकी का पैसे देकर रिक्शा में सुहानी को घर ले आये थे.
दोनों काफ़ी समय बाहर रहे थे. इस बात से दादू के माता पिता को ताजुब हो रहा था. लेकिन घर में कुछ मेहमान आये हुए थे. इस लिये उन्होंने चुपकीदी साध ली थी.
दादू के घर में उन की दो मौसरी बहने हाजिर थी. वह लोग क्या सोचेंगे ऊस बात का उन्हें डर था. दादू ने शंका को जगह ना देते हुए खुलासा किया था.
" यह मेरी साली हैं, मैं उसे लेने स्टेशन गया था. "
उन को कोई शक की गुंजाईश नहीं थी.. लेकिन दादू के माता पिता को इस झूठ पर संदेह हुआ था.
0000000000000 (क्रमशः )