राधा का संगम - प्रकरण 1 Ramesh Desai द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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राधा का संगम - प्रकरण 1

                   

                  राधा का संगम  -   प्रकरण 1

          इन हवाओ मे इन फिजाओ मे तुझ को मेरा प्यार पुकारे.. आजा आजा तुझ को मेंरा प्यार पुक

          रुक ना पाऊं मैं सजती आऊं मे दिल को ज़ब दिलदार पुकारे

          इस गीत की पंक्तियों ने मुझे अतीत की याद मे धकेल दिया था.

          दिल्ली की सुमसाम गली मे कुछ गुंडों ने एक लड़की को घेर लिया था. वह डर के मारे चिल्ला रही थी. किसी को मदद के लिये पोकार रही थी.

           ऊस वक़्त मैं अपनी स्कूटी पर जा रहा था. तब मेरी आँखों ने जो कुछ देखा था, और चकित सा रह गया था.

           कुछ गुंडे वह निसहाय, अकेली लड़की के साथ जबरदस्ती कर रहे थे. यह देखकर मेरा खून घोल गया था. मैंने तुरंत स्कूटी रोक लिया और ऊस लड़की को बचा लिया. मैंने एक हिरो बनकर लडकी की इज्जत बचा ली थी.

         वह लड़का मैं था. मेरी नेक और निडर हरकत देखकर राधा  पहली ही नजर मे मेरी दिवानी हो गई थी और बड़े प्यार से मेंरे गले लिपट गई थी.

        राधा बहुत खूबसूरत थी. वह आसमान की परी जैसी दिखती थी. ऊस के दूध के कटोरे बहुत बड़े तड़बुचे, फुट बोल जैसे थे. उसे देखकर मैं भी लट्टू हो गया था.

        और मैं राधा के साथ मस्ती करने पर उतर आया था. मैंने पहली ही मुलाक़ात मे राधा को अपनी मनसा बता दी थी.

        " चलो! मेंरे साथ होटल के फॅमिली रूम की केबिन में. मुझे तुम्हारे तन मन का मुआयना करता हैं. तुम्हारे शरीर की जियोग्राफी पढ़नी हैं. "

          और राधा फट से तैयार हो गई थी.

          दोनों आगे बढ़कर होटल के फैमिली रूम में दाखिल हुए थे . राधा की आँखों में आंखे पिरोकर मैंने सवाल किया था . " क्या तुम्हे डर लगता हैं.? "

        मैं उसे फैमिली रूम में ले गया था और बिना झिझक राधा को पकडकर अपनी गोद में बिठा दिया था और ऊस की चोली में हाथ डालकर शरारत पे उतर आया था.

         राधा को यह शोट बहुत सुहाना लगा था.ऊस ने मेरी आँखों में देखा था. उसे एहसास हो गया था. मैं ही असली रक्षक था.

        ऊस केबिन में ख़ामोशी छाई थी. राधा ने पहली बार मेरी आँखों में झांका था. मेरी साँसो की तपिश ने ऊस के मन का सारा डर दूर कर दिया था, जो मीठे नशे में पलट गया था.

         वह मंजर सचमुच अदभुत था. मैंने राधा की साड़ी का पल्लू पकडकर उसे केबिन की भीतर धकेल दिया था.

         ऊस वक़्त राधा की धड़कने मेंरे सीने पर साफ सुनाई दे रही थी. 

         मैंने अपनी कल्पना और भी रसीली और वजनदार बना दी थी.

         मेरी उंगलियों का जादुई स्पर्श ने ऊस के दूध के कटोरो को तडबुचा बना दिया था.

         सन्नाटा का माहौल था जिस ने मेरी पकड और मजबूत हो गई थी. ऊस की साँसे मेरी छाती से टकरा रही थी.

        ऊस ने मेंरे कानो में कहां था: " मैं हमेशा के लिये आप की हो चुकी हूं.  ऊस वक़्त मेंरे दिल की धड़कन तेज हो गई थी.

        ऊस वक़्त केबिन में रोशनी धुंधली हो गई थी, शायद हम दोनों की हरकते देखकर शर्मा सी गई थी.

         मेरी नजरो की गर्मी ने उसे बिना छुए ही ऊसे पूरी तरह पिघला दिया था. वह मदहोशी शब्दों में बयां करना नामुमकिन प्रतीत हो रहा था.

          ऊस ने मुझे कहां था : " ज़ब आप के चेहरों की तपिश मेंरे चेहरे पर महसूस होती हैं और मैं पूरी दुनिया भूल जाती हूं. "

          ऊस वक़्त दोनों की रुहे एक दूसरे से इस तरह उलझ गई थी., की होश की कोई गुंजाईश नहीं बची थी..

          मैंने राधा की ठुड्डी पकडकर ऊस का चेहरा ऊपर उठाया था, ऊस की नजरो में जूनून था, जिस से वह पूरी तरह कांप रही थी.

          ऊस पल ऊस ने अपनी आँखे मुंद ली थी और मेरे प्यार के लाड़ में डूब गई थी.

          ऊस की नजर  में वो पल ऎसा लग रहा था जिस से ऊस की रूह मेरी आँखों में समा गई हो.

          मेरी उंगलियों की छुअन और गहरा जूनून मानो उसे अंदर ही अंदर पिघला रहा था.

          ऊस केबिन में मैंने राधा की गर्दन पर अपने होठों का जादू चलाया था. मेरी आँखों की तपिश उसे मदहोश कर रही थी.

         राधा की चुडिया भी मेरी धड़कन को दिवानी हो गई थी.

         होटल से निकलते समय उन गुंडों का लीडर वापस आया था., जिस ने राधा पर बुरी नजर डाली थी, कुछ टिप्पणी भी की थी, राधा का रास्ता रोकने का प्रयास किया था.. ऊस वक़्त मैंने ऊस की कलाई मरोड़ दी थी और वह दुम दबाकर भाग गया था.

         राधा फिर एक बार डर के मारे मेरी बाहों में समा गई थी. मैंने ऊस के बालो को सहलाया था और बड़े हक से ऊस के होठों को कसकर दीर्घ चुम्बन ले लिया था.

         हम लोग काफ़ी समय एक साथ थे. मैंने ऊस के साथ कोई कमी नहीं छोड़ी थी. वह भी मुझे सामने से ललचाती थी. " मेंरे साथ यह करो वो करो " कर के आदेश देती रहती थी. मुझ से ज्यादा ऊसे सेक्स की तङप थी. ऊस ने मुझे सामने से कुछ भी करने का लाइसेंस दिया था. और मैं भी सारी मर्यादा, सीमा को भूलकर ऊस के साथ ओतप्रोत हो गया था.

         उसे मेरा उसे गोद में बिठाना बहुत अच्छा लगा था.. इतना ही अपने हाथों से ऊस के हर अंग को जी भर के छुआ था, सहलाया था, जगह जगह उसे चूमा था.

         अन अधिकृत हरकतों से भी मैं बाज नहीं आया था. सही मानो को मैंने कुछ बाकी नहीं छोड़ा था.. राधा ने खुद कहां था. " जो कुछ करना हैं कर लो. कोई कसर बाकी मत छोड़ना. "

                       0000000000   ( क्रमशः )