मुद्दा कमल चोपड़ा द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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मुद्दा

​मुद्दा
कमल चोपड़ा

​इससे गिरी हुई हरकत और क्या होगी? बेटी की उम्र की बच्ची के साथ रँगे हाथों वह पकड़ा गया।

​घोर कलियुग है वर्ना सूरज टूटकर गिर जाता या धरती फट जाती लेकिन कुछ भी नहीं हुआ। आग की-सी तेज गति से फैल गयी थी वह खबर झुग्गी बस्ती में। पिनपिनाते बच्चों, आवारा लड़कों, कड़कड़ाती औरतों और वाही-तबाही बकते बूढ़े-बुढ़ियों की अच्छी-खासी भीड़ जुट आयी थी वहाँ।

​दूसरों के झमेलों में झाँककर मजा लेने का मौका चूकना नहीं चाहती थीं आसपास की झुग्गियों में रहनेवाली औरतें। कुछ औरतें अवाक् थीं। डरी, सहमी और कुछ तैश में आकर आपे से बाहर हुई जा रही थीं। बस्ती के लौंडे-लफंगों को भी हीरो बनने का जैसे मौका मिल गया था-ये साला प्रधान है या हैवान? इस साले को तो चौराहे पर नंगा करके गोली मार देनी चाहिए।

​कोई-न-कोई तमाशा होता है रोज बस्ती में। कौन क्या करता है? कहाँ जाता है? किसके पास आता है? किसके सम्बन्ध किसके साथ हैं। हमेशा शक की निगाह रहती हैं लोगों की एक-दूसरे पर। जहाँ भी दो औरतें मिलतीं, तीसरी के बारे में बातें करने लगतीं। उसे बदचलन सिद्ध करतीं और फिस्स-फिस्स करके हँसतीं। जाने क्यों अपनी तकलीफें भूलकर दूसरों में इतनी दिलचस्पी लेतीं।

​बिन्नी के पड़ोस में अभी कल ही तो ड्रामा हुआ था। उनके पड़ोस में रहनेवाली दमयन्ती के घर उसका कोई चचेरा भाई मिलने आया था। थोड़ी देर बैठकर चला गया। उसके जाने के बाद बस्ती के लफंगे लगे उसकी झुग्गी के चक्कर काटने, लगे दमयन्ती को छेड़ने-अब तो घर पर ही आने लगे? हमारे होते बाहर से लौंडे बुलाने की क्या जरूरत है? आसपास की औरतें भी उसे बुरा-भला कहने लगीं। दमयन्ती भी ठहरी मुँहफट, किसी से दबनेवाली नहीं थी। कुछ वह पहले से ही बदनाम है और कुछ वह औरों के मुकाबले साफ-सुथरी और बन-ठनकर रहती है। जवाब में उसने भी खरी-खरी सुनाई-जो किसी पर गलत और गन्दा इल्जाम लगाता है वही गन्दा होता है। वही गन्दा जिसकी जुबान गन्दी। अच्छा-खासा तमाशा खड़ा हो गया था।

​और आज ये बखेड़ा हो गया-कहाँ मासूम बच्ची और कहाँ झुग्गियों का प्रधान?

​बुरी तरह फँस जाने के बावजूद झुँझलाता हुआ ऐंठ रहा था किशन प्रधान। इतना घटिया इल्जाम? मैंने कुछ किया भी है? ऐसा सोचना भी पाप है मेरे लिए तो...? ऐसी नीच हरकत मैं करूँगा? मेरी उम्र तो देखो। चिन्नी से बड़ी तो घर में मेरे बेटियाँ हैं।

​लोग मुझे किशन प्रधान कहते हैं। एक-एक की मदद की है मैंने, और मैं ऐसा काम करूँगा? खबरदार अगर किसी ने मुझे गाली दी। हाथ लगाया तो...सब जानते हैं, मैं पांडेजी का खास बन्दा हूँ। मेरी पहुँच ऊपर तक है।

​पीछे से आवाजें आ रही थीं-चोरी ऊपर से सीनाजोरी...प्रधान हो या कोई और...अब चाहे पांडेजी का बाप। पाप तो पाप है। पांडे के नाम पर डर के बैठ जायें? बच्चियों की इज्जत लुटने दें।

​धूप चढ़ती जा रही थी। जानते हुए भी कोई उसकी बात नहीं सुनेगा। वह फँस चुका है। वह झुँझलाया-मुझ पर यह झूठा इल्जाम लगाया जा रहा है।

​पहले इन्हीं झुग्गियों में रहता था किशन। राजनीति में पड़कर कुछ ही दिनों में उसने ड्रीमलैण्ड सोसायटी में अपना फ्लैट ले लिया था और वह शान से रहने लगा था। अपनी झुग्गी जिसकी दीवारें और छत उसने पक्की करवा ली थीं और पार्टी का झण्डा लहराता रहता था, को उसने चुनाव कार्यालय में बदल लिया था। अब किशन इन झुग्गियों में चुनाव के दिनों में ही नजर आता था।

​भीड़ में खड़े काले मसूढ़ों और पीले दाँतोंवाले चन्दू पर किशन की नजर पड़ी तो समझ गया वह। इसी की कारस्तानी है यह। चन्दू खिलखिला रहा था। तड़पकर रह गया। किशन अपनी ही पार्टी के वर्कर चन्दू को अपने विरोध में खड़ा देखकर हैरान था। इतने साल मिलकर काम किया। आज एकाएक दुश्मन बनकर सामने आ डटा? पांडेजी ने खुद बसाई थीं ये झुग्गियाँ। उनकी पार्टी का गढ़ है ये बस्ती। घर में रखी वोटों की गड्डियों से भरी हुई तिजोरी की इस तरह उनके इस वोट बैंक में विपक्ष अभी तक सेंध नहीं लगा पाया था। लेकिन आज आपसी फूट का पांडेजी को पता चलेगा तो क्या कहेंगे? खून खौलकर रह गया किशन का।

​जाकर चन्दू की गर्दन पकड़ ले, उसका मन हुआ लेकिन मामला बहुत नाजुक है वह भी एक मासूम बच्ची के साथ बलात्कार का! जाने कैसे उसने अपने-आप पर काबू पाया।

​तबीयत खराब होने की वजह से अपनी झुग्गी में लेटी चिन्नी की माँ घटना की खबर पाते ही दौड़ती चली आयी थी। उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे और वह बेहद घबराई हुई थी। उसका साँस फूला हुआ था। भीड़ में घिरी रोती हुई अपनी बच्ची पर नजर पड़ते ही उसकी भी रुलाई फूट पड़ी थी। चिन्नी के पास पहुँचते ही वह उसके सिर, पेट, छाती और पीठ को अपने हाथों से छूकर उसकी सलामती की टोह लेने लगी थी।

​कलपते-कोसते और रोते-श्रापते हुए एकबारगी चिन्नी की माँ ने वहाँ जमा तमाशाइयों के कलेजों को थर्रा दिया था। किसी औरत पर हाथ डालता तो बात समझ में आती। पर नौ साल की बच्ची? थोड़ा-बहुत तो दरिन्दे भी देख सोच लेते हैं।

​एकाएक टूट पड़ी इस आफत को माँ झेल नहीं पा रही थी। हमदर्दी दिखाती भीड़ जैसे उन्हें लगातार नंगा किये दे रही हो। माँ की घबराहट, बेचैनी और रोना देखकर चिन्नी एकदम चुप लगा गयी थी। समझने की कोशिश कर रही हो जैसे कि हुआ क्या है? तरह-तरह के उलटे-सीधे प्रश्न पर प्रश्न पूछ रही थीं चिन्नी से वहाँ जमा औरतें।

​चिन्नी का हाथ पकड़कर माँ उसे अपनी झुग्गी की ओर लेकर चल दी अपने पंखों में दुबकाकर सुरक्षा देते हुए किसी पक्षी की तरह। झुग्गी नजदीक ही थी। झुग्गी पर पहुँचकर उसने दरवाजा अन्दर से बन्द कर लिया। बाहर से हँसी-मजाक, ताने-फिकरे और बातें बनाती औरतों की आवाजें आ रही थीं।

​इसी बात का डर था चिन्नी की माँ को। पहले कभी भी जब वह कहीं बच्चियों के साथ हुए कुकर्म की बात सुन लेती थी तो उसकी आत्मा दहलकर रह जाती। चिन्नी के बापू के गुजर जाने के बाद तो वह अपने-आपको और चिन्नी को और भी कमजोर और असुरक्षित-सा महसूस करने लगी थी।

​चिन्नी को पढ़ा-लिखाकर बड़ा बनाना चाहती थी वह। पर गन्दे जमाने, बिगड़े माहौल, बुरे वक्त और कुछ लोगों की बातों से डरकर उसने स्कूल से हटाकर अपने साथ काम पर ले जाना शुरू कर दिया। दो-तीन कोठियों का काम पकड़ रखा था चिन्नी की माँ ने। चिन्नी उसका हाथ बटा देती।

​खाँसी-जुकाम तो लगा ही रहता था चिन्नी की माँ को। उस दिन मालकिन ने उसे खाँसते देखा तो जोर दिया कि वह गुलाबी बाग चेस्ट क्लीनिक में जाकर अपना चैक-अप करवाये। कोई बीमारी निकली तो इलाज-विलाज वहाँ सब फ्री में हो जायेगा। एक्सरे और थूक-खून की जाँच हुई तो पता चला कि उसको तो टी.बी. है, इसीलिए उसे रोज-रोज बुखार-सा बना रहता था। दहलकर रह गयी वह। अपनी बजाय उसे चिन्नी की चिन्ता अधिक थी।

​इलाज तो शुरू हो गया पर मालकिन ने साफ जवाब दे दिया। हमारे घर भी बीमारी फैल सकती है। हिसाब लेकर चुपचाप लौट आयी वह। ऐसी स्थिति में मालकिन की जगह वह खुद होती तो शायद वह भी यही करती। उसकी बीमारी उससे चिन्नी को न लग जाये। वह खुद इस चिन्ता में है...तो मालिकों के घर भी तो छोटे-छोटे बच्चे हैं। उन्हें बीमारी लग गयी तो...? काम का क्या है, पचास मिल जायेंगे। बीमारी ठीक हो जाये, काम करने को उम्र पड़ी है। वैसे भी अभी दूसरे घर का काम उसके हाथ में था जहाँ उसने चिन्नी को अकेले ही भेजना शुरू कर दिया था। दो वक्त कोठी की साफ-सफाई, टोकराभर बर्तन। तड़पकर रह जाती चिन्नी की माँ। जबतक चिन्नी काम पर से लौट न आती तबतक उसके दिलो-दिमाग पर कोई साँप दाँत गड़ाये रहता। आज थोड़े ही देर के लिए बाहर निकली थी चिन्नी और यह काण्ड हो गया।

​बेहद डरी हुई थी चिन्नी। अभी तो माँ रो रही है। चुप होगी तो बुरी तरह पीटेगी उसे। उसने किया ही क्या है? उसका कसूर ही क्या है? झुग्गी में आकर माँ ने भी चिन्नी से वही प्रश्न पूछे थे जो बाहर लोग पूछ रहे थे-क्या-क्या किया था किशन प्रधान ने? कहाँ से पकड़ा था? कपड़े उतारे थे?

​उसके मना करने के बावजूद कि कुछ भी तो नहीं हुआ उसके साथ? लेकिन बार-बार पूछा जा रहा था नौ साल की है वह। सब समझती है वह। क्या होता है गन्दा काम? बल्कि उसे तो पिछले साल ही पता चल गया था जब वह आठ साल की थी।

​पीछे की झुग्गियों में रहनेवाली चिन्नी की सहेली नीतू ने खेलते-खेलते अचानक ही एक दिन चिन्नी से पूछ लिया, "तू जानती है? बड़े होकर आदमी लोग औरतों के साथ क्या करते हैं?" चिन्नी ने कंधे उचकाकर मुँह बिचका दिया, "क्या?" उसका हाथ पकड़कर खींचते हुए मीतू बोली, "चल मैं दिखाती हूँ।"

​झुग्गी बस्ती के पश्चिम में एक पावर सब-स्टेशन था जिसकी पिछली दीवार से हटकर कुछ झुग्गियाँ थीं। उनमें से एक झुग्गी मिस्त्री मोहनलाल की भी थी जोकि स्टील के बर्तन बनानेवाली फैक्टरी में काम करता था। उसकी झुग्गी बाँस और लकड़ी की छोटी-छोटी फट्टियों से बनी हुई थी। बरसात से बचने के लिए झुग्गी की छत पर काली-सी तिरपाल डाल रखी थी। पॉवर सब-स्टेशन और झुग्गी के पीछे थोड़ी-सी जगह खाली थी, लेकिन इधर से किसी का आना-जाना नहीं था।

​झुग्गी के पिछवाड़े से लकड़ी की फट्टी एक जगह से थोड़ी-सी टूटी हुई थी। जिसमें से झाँकने पर अन्दर का सबकुछ साफ-साफ दिखाई देता था।

​शाम का वक्त था। धूप ढल चुकी थी। झुग्गी के पिछवाड़े जाकर मीतू और चिन्नी बारी-बारी से अन्दर झाँकने लगी थीं। मिस्त्री मोहनलाल अभी काम से नहीं लौटा था। मिस्त्री की बीवी उनसे बेखबर अपने काम में जुटी हुई थी। शायद वह फटे हुए कपड़े में टाँके लगा रही थी। झुग्गी में अभी भी दिन की रोशनी बाकी थी। शाम पौने छह बजे अपनी ड्यूटी खत्म कर मिस्त्री मोहनलाल आया।

​आते ही उसने अपने कपड़े उतारे। बीवी को खींचकर नीचे लिटाया और दबोच लिया। मीतू ने चिन्नी से फुसफुसाते हुए कहा, "देख-देख!" चिन्नी की छोटी-छोटी आँखें फैलकर चौड़ी हो गयी थीं, साँस रोककर देख रही थी वह। हैरान थी वह, इस आदमी को हो क्या गया है? पागलपन का कोई भूत सवार हो गया है क्या इस पर? औरत भी चीख-चिल्ला नहीं रही जबकि वो आदमी उसे काट रहा है।

​ज्यादा देर तक अन्दर के दृश्य नहीं देख पाई चिन्नी। डर के मारे थरथर काँपने लगी वह। एकाएक वह पीछे हटी और गिरती-पड़ती भाग खड़ी हुई। पीछे-पीछे मीतू भी भागी आ रही थी। काफी दूर जाकर रुकी।

​सहमी शर्माई-सी उसने खुले हुए मुँह पर हाथ रखा हुआ था। चिन्नी थरथरा रही थी जैसे कोई जुर्म करते पकड़ी गयी हो!

​तभी तो बस्ती के लड़के रोज इधर-उधर ताक-झाँक करते रहते हैं। रोज लड़ाइयाँ होती हैं। लड़के तो शर्माते भी नहीं। हँसते, चिढ़ाते, सीटी बजाते भाग जाते हैं। सारे लड़के ही बिगड़े हुए हैं। बस्ती के तो...तभी तो माँ मना करती है-लड़कों के साथ मत खेला कर। कहीं अकेली मत जाया कर। ठीक ही तो कहती है माँ। पता नहीं कब किसके सिर पर भूत सवार हो जाये। चिन्नी को लग रहा था जैसे कोई बिफरा हुआ सांड उसे अपने पैरोंतले रौंदने के लिए उसकी ओर दौड़ता आ रहा है।

​अचानक मीतू ने पूछा, "क्या हुआ? अच्छा चल गुड़िया-गुड़िया खेलते हैं।" मुँह बिचकाकर कूदती-फाँदती हुई चिन्नी घर की ओर दौड़ गयी।

​चिन्नी का मन होता कि वह भी लड़कों की तरह निश्चिन्त होकर बैटबॉल खेले। साइकिल चलाये। जोर-जोर से सीटी बजाये। शोर मचाये, किसी के पीछे दबे पाँव जाकर अचानक 'हाउ' करके उसे डरा दे। यों ही घूम-घूमकर पूरा शहर देखे। जोर-जोर से गाना गाये। वह कुछ भी करती, माँ उसे डाँटने लगती। वह सिसकने लगती, "इससे अच्छा मुझे ट्रंक में बन्द कर दो...।"

​अभी कुछ ही दिन पहले वह झुग्गी के दरवाजे पर बैठी गाना गा रही थी-कुड़ी क्वारी तेरे पिच्छे-पिच्छे जाता कहाँ है सोणेया? ऊपर से माँ आ गयी। छड़ी उठाई और पीटने लगी। मार-मारकर खाल उधेड़ दी। पीट-पीटकर थक गयी तो हाँफते हुए माँ गालियाँ बकने लगी। बिगड़ रही है तू। चिन्नी पूछना चाह रही थी कि गाना इतना बुरी बात है तो शादी-ब्याह, भजन-कीर्तन, हर जगह क्यों गाते-बजाते हैं लोग? गाना भी नहीं गा सकती मैं?

​रोने को हो आई थी चिन्नी, आज बापू होते तो शायद माँ इतनी चिड़चिड़ी न होती।

​बस्ती के पास गुजर रहे तारों पर कुंडी डालकर लाइट खींच रखी थी झुग्गीवालों ने। उस दिन चिन्नी का बापू शिवराम लौटा तो झुग्गी में अँधेरा था। आज दिन में चली तेज आँधी से शायद हिल गया था उसका वह कुंडी कनेक्शन। आते ही उसमें तार फिर से फेंकी पर तार अटकी नहीं। खीझकर वह खम्भे पर चढ़ गया। स्पार्किंग हुई खम्भे पर और अगले ही क्षण करंट का झटका खाकर वह नीचे आ गिरा और वहीं दम तोड़ दिया उसने। हमेशा के लिए अँधेरा हो गया चिन्नी की माँ की जिन्दगी में। माँ की करुण चीख-पुकार से बस्ती थर्राकर रह गयी।

​शिवराम की सुध लेने की बजाय बस्तीवाले अपने चोरी के कनेक्शन हटाने के लिए तारें वापिस खींचने लगे। दुर्घटना हुई है। पुलिसवाले, बिजलीवाले और जाने कौन-कौन आयेंगे? बस्ती में अँधेरा छा गया। जान-पहचानवालों ने आकर रोती-कुरलाती चिन्नी की माँ को समझाया। जितनी जल्दी हो सके, शिवराम का दाह-संस्कार कर देना चाहिए। पुलिस आ गयी तो लाश अपने कब्जे में कर लेगी। पोस्टमॉर्टम होगा, कल छुट्टी है उधर लाश सड़ती रहेगी। जानेवाला तो चला गया। पीछेवालों के लिए कैसे-कैसे पेचीदा पचड़े पड़ जायेंगे। पिण्ड छुड़ाना मुश्किल हो जायेगा। रात के अभी दस भी नहीं बजे थे कि वे दाह-संस्कार करके लौट भी आये थे।

​जैसे-तैसे पाल रही थी वह चिन्नी को। आँखों में आँसू थे माँ के; अभी तो वह जिन्दा है तब यह हाल है। बीमार-बीमार रहती है वह। कल अगर उसे कुछ हो गया तो? चौराहे पर पड़े लावारिस माँस की बोटियों की तरह हो जायेगी उसकी बेटी की हालत। तड़फड़ा रही थी माँ।

    हैरान थी चिन्नी। आज रोये चली जा रही है माँ और दिन तो गलती किसी की भी हो, आकर उसे धुन देती थी। उस दिन पानी लेकर लौट रही थी वह, तभी चौदह-पन्द्रह साल के एक लड़के ने उसे छेड़ दिया, "आय हाय? उर्मिला मातोंडकर...।"

​"तू मतोंडकर...तेरी माँ मतोंडकर।" और चिन्नी ने उसके पत्थर उठा के दे मारा। माथे पर गूमड़ पड़ गया लड़के के। रोता-चिल्लाता भाग गया वह। थोड़ी देर बाद उस लड़के की माँ उनकी झुग्गी पर शिकायत करने आ पहुँची, "गजब...लड़की हो के सर फोड़ दिया छोरे का!"

​चिन्नी चीखी, "पहले उसने मुझे छेड़ा क्यों?"

​उनके जाने के बाद माँ ने चिन्नी को खूब पीटा-लड़की होके तू जरा-जरा सी बात पे बखेड़ा खड़ा करेगी? लड़की है तू! चुप करके चले आना चाहिए था तुम्हें।

​हैरान-सी आँखें चौड़ी करके देखा था माँ को, "क्यों?"

​हैरान थी चिन्नी आज, इतनी बड़ी बात हो गयी पर...माँ ने न तो उसे पीटा है न डाँटा-डपटा है। आज माँ उसे जान से ही मार देगी-या माँ सुधर गयी है? रह-रह के माँ के हौल उठ रहे थे।

​बाहर बाकायदा नारेबाजी शुरू हो गयी थी-किशन प्रधान हाय! हाय! बच्चियों की इज्जत करे खराब। काटो साले को, करो हिसाब। बलात्कारी बना प्रधान। जान ले, अब सारा जहान। आसपास की औरतें जलते हुए चूल्हे, भूख से रोते बच्चे, बिखरे हुए बर्तन और अपनी झुग्गियों के दरवाजे खुले छोड़कर उनकी झुग्गी के बाहर जमा होकर बातें बनाने लगी थीं-मर्द की तो खैर जात ही ऐसी है। मैं पूछूँ कि चिन्नी उसके दफ्तर में करने क्या गयी थी? कोई जोर-जबरदस्ती करेगा तो क्या बच्ची रोयेगी-चीखेगी नहीं? किसी ने चिन्नी की आवाज सुनी? आग लग गयी है दुनिया के! भड़ाक से दरवाजा खोला चिन्नी ने, किसके आग लगी है? मैंने किया ही क्या है? कुछ हुआ भी है? काली ठिगनी और चालाक औरतें अब कब्र में पाँव लटकाये बुढ़ियों ने अपने-अपने चेहरों की रंगत बदलने की कोशिश की लेकिन खिसियाकर रह गयीं। चिन्नी चीखी, "रंजू कह रही थी चुनाव होनेवाले हैं। स्टीकर और कमीज पर लगनेवाले बिल्ले मिल रहे हैं। वही लेने गयी थी मैं किशन चाचा की झुग्गी पर। वो बोले अगले हफ्ते आयेंगे। वापिस निकल रही थी झुग्गी से कि बस चन्दू ने शोर मचा दिया।" तमाशा देखने आयीं औरतों को पीछे हटाते हुए पड़ोस में रहनेवाली दमयन्ती ने झुग्गी के अन्दर आकर दरवाजा भिड़ा दिया। उसे आया देखकर चिन्नी की माँ का कलेजा धड़कने लगा। पतली-साँवली तेज-तर्रार और मुँहफट औरत थी दमयन्ती। उसका पति एक प्राइवेट दफ्तर में चपरासी था। उसकी हमदर्दी चिन्नी की माँ को अच्छी नहीं लग रही थी। पर वह उसे हौसला दे रही थी। कोई कब तक भेड़ियों के डर से बच्चियों को घर में दबाकर छिपाकर रखे? जमाना ही कुत्ते-भेड़ियों का है! थोड़ी देर पहले लोग कह रहे थे पुलिस को बुलाओ। लेकिन उससे पहले उस मुजरिम किशन ने खुद मोबाइल पे फोन करके पुलिस को बुला लिया। पुलिस आयी और उलटा किशन की हिफाजत में जुट गयी। लोगों को पीछे हटाया और दूसरी तरफ से उसे निकालकर बड़ी शान से उसे जीप में बैठाया और साथ ले गयी।

​मातम छा गया था झुग्गी में। बाहर से नारों का तेज शोर आ रहा था। हर वक्त मौत-मुसीबत मँडराती है माँ के सिर पर। एक तो बेटी ऊपर से सर पर बाप का साया नहीं। कब कौन हाँक' ले जाये या हलाल कर दे? खैर मनाने के सिवा करे क्या बच्ची की माँ?

​झुग्गी के बाहर जमा भीड़ को पीछे हटाता एक पुलिसिया दरवाजे पर आया। उसके हाथ में कुछ कागज और एक फाइल थी। झुग्गी के अन्दर दाखिल होने के लिए उसे काफी झुकना पड़ा। उसे आया देखकर चिन्नी और उसकी माँ का साँस सूख गया। चेहरा पीला जर्द हो गया!

​"थाणे चलो, बयान लेणा है थारा...।"

​चिन्नी की माँ की आवाज ही नहीं निकली पर दमयन्ती पुलिसिये को कड़ककर पड़ गयी, "क्यों चले थाने? हमने क्या किया? किस बात का बयान? किसी ने कुछ नहीं किया? लड़की बिल्ले लेने गयी थी। अभी झुग्गी के दरवाजे पर ही थी। शरारती लौगों ने खामखाह बात उड़ा दी।"

​"लेकिन-वेकिन कुछ नहीं।"

​"आप जबरदस्ती मत कीजिए।" ऐसी औरत शायद पहली बार देखी थी पुलिसिये ने। जो उसकी खाकी रौब से जरा भी नहीं डर रही थी। खा जानेवाली नजरों से देखा दमयन्ती को। फिर एकाएक पैंतरा बदला, "देखो भाई, आप लोगों को उस राक्षस के खिलाफ बयाण देणा चइये...ना तै वा साफ बच जावैगा। जनता भी भड़क रई सै...उसे भी शान्त करणा सै...यों ही छुट्टा घूमता फिरेगा साल्ला...थारी खातर ई तै हम लड़ रये सैं।"

​कुछ नहीं सूझ रहा था चिन्नी की माँ को। एकदम सुन्न पत्थर-सी बनी बैठी थी वह। जवाब दमयन्ती ने ही दिया, "बच्ची की जो बदनामी होगी वह? जब वह लड़की कह रही है कुछ हुआ ही नहीं तो हम झूठा बयान क्यों दें? अपने पाँव पर कुल्हाड़ी आप मार लें।"

​"पर वो बलात्कारी।"

​"कह दिया न हमें नहीं पता..."

​एकाएक फिर पैंतरा बदला पुलिसिये ने, "अरे! नाराज क्यों होवो सो? थारी खातर त लड़ रयै सै, हम अर आप? समझ ही नई रये? चलो न्यू करो-आप किशन प्रधान के खिलाफ बयाण दे दो। मैं तुमने पाँच हजार रुपये नगद अभी दे देता हूँ। चाये तुम इसे हरजाना समझ लो या जो थारी मर्जी। थारा कुछ नहीं बिगड़ेगा गारंटी मेरी। कहाणी हम लिख लेंगे। बल्कि कहाणी त पहले से तैयार सै। बस तुम उस पै दसतखत कर देना।"

​किसी साजिश के तहत हो रहा है यह सब, उनके लिए समझना कठिन नहीं था।

​बाहर नारों का शोर कुछ कम हो गया था।

​आसमान बादलों से घिरा हुआ था। शाम जल्दी घिर आयी थी। झुग्गी में कुछ अँधेरा-सा हो आया था। एकाएक फीका और फुसफुसा-सा ठहाका मारते हुए दमयन्ती ने रंग बदला-पाँच हजार? अभी दे देंगे? फिर तो मजे हो गये हमारे? कर देते हैं दसतखत पर पल्ले से पाँच हजार रुपया लगाकर आपको क्या फायदा? फटी आँखों से देखती रह गयी चिन्नी की माँ। यह क्या नाटक चल रहा है उसकी झुग्गी में? ये कौन हैं फैसला करनेवाले? बेहद डरी, सहमी और सिकुड़ी-सी बैठी थी चिन्नी। लगभग फुसफुसाते हुए पुलिसिया बोला, "म्हारी छोड़ो पाँच हजार लगाये, तो कमा बी लेंगे। मोटी मुर्गी फँसी सै। पिण्ड छुड़ाने के लिए कुछ तो पल्ला झाड़ेगा ही। पाछले चुनाव में भतेरा कमाया साल्ले ने। चुनाव के दौरान सर्ट, साड़ियाँ, बिल्ले और वोटरों की पर्चियाँ और चुनाव से एक दिन पहले शराब की बोतलें बाँटने के लिए इलाके के विधायक पाण्डेजी से साले को भतेरा पैसा मिला था। साले ने थोड़ा-बहुत बाँटा, बाकी खुद डकार गया। चन्दू अपने यार से भी पिछले चुनाव में बहुत काम लिया था पर इस किशन ने धेला भी उसके हाथ लगणे नई दिया। अपनी जेबें भर लीं। पिछले चुनाव से ही खार-खाये बैठा है चन्दू। ईब फिर चुनाव आणेवाले हैं। ईब फेर पैसा बरसेगा। दो-चार दिन में झुग्गियों के प्रधान का फैसला होनेवाला है। बच्ची के साथ बलात्कार करने के चक्कर में किशन तो बदनाम हो जायेगा। चन्दू भी प्रधानी का दावेदार है बल्कि वोई प्रधान बनेगा। चन्दू की तो चाँदी हो जायेगी। चुनावों में कपड़े और शराब बाँटने के लिए इसे भी माल मिलेगा। उसमें से चन्दू भी अपनी जेबें भर लेगा। यो सारा बखेड़ा किशन को बदनाम करके खुद माल डकारने के लिए खड़ा किया जा रहा है।" दमयन्ती की आँखों में खून उतर आया था। उसके सामने राजनीति, पुलिस, कानून, पैसे का क्रूर भयावह नंगा नाच चल रहा था।

​बादलों की तेज गड़गड़ाहट से उनका दिल दहल उठा था। बरसात होगी तो बाहर कीचड़-ही-कीचड़ भर जायेगा। बाहर निकलना मुश्किल हो जायेगा। पानी झुग्गी में घुस आया तो सामान तो खराब होगा ही जीना भी दूभर हो जायेगा।

​"दूसरी पार्टीवालों से भी तुम फायदा उठा सकते हो। उन्हें भी तो मुद्दा चाहिए। थोड़ी-सी बदनामी पर फायदा ही फायदा...तो ठीक सै न? मैं मन मुताबिक कहाणी लिख लेता हूँ आप दसतखत कर देना।" भड़ककर पड़ गयी दमयन्ती, "हमें नहीं लिखवानी रिपोर्ट, जो हुआ वही बयान देंगे। हमारी कोई इज्जत नहीं है क्या? बच्ची की जो बदनामी होगी उसका क्या होगा?"

​"बदनामी तो यों भी होगी! थोड़ी और हो लेगी...पाँच हजार कम नहीं होते?"

​"अपनी ही बहन-बेटी के नाम से लिख लो न रिपोर्ट? आपके घर में भी बहन-बेटी तो होगी?"

​पूँछ पर लात पड़ गयी जैसे उसके, "आ...तेरी तो मैं माँ की...मैं शरीफों की तरह पेश आण लग रहा हूँ और तुम? तुम दोनों-तीनों को पकड़कर अन्दर बन्द कर दूँगा। चार गवाह खड़े करके केस बना दूँगा। ये औरतें बच्ची से धंधा करवाती हैं। मेरा के पाड़ लोगे?" मशीनगन से कई गोलियाँ एकसाथ दाग दी हों उनके जैसे किसी ने। माँ एकदम लहूलुहान और क्षत-विक्षत हो आयी थी।

​एकाएक माँ चीख पड़ी, "निकल जाओ यहाँ से। ज्यादती करेगा तो तेरी शिकायत ऊपर कर देंगे?"

​"बाहर पब्लिक है। गुण्डागर्दी कैसे कर सकता है?"

​किलसकर रह गया पुलिसिया फिर फनफनाता हुआ पैर पटककर बाहर निकल गया।

​संयत होने में थोड़ा वक्त लगा था उन्हें। पुलिसिये को झाड़कर भगा दिया। ऐसी हिम्मत तो नहीं थी उसमें। ऐन वक्त पर दमयन्ती ने आकर उसे हिम्मत और सहारा दिया। दमयन्ती जिसे बस्तीवाले बदचलन औरत समझते हैं, कितनी साफ और सुलझी हुई औरत है वह? बदनामी का खंजर अब भी माँ के कलेजे में जैसे धँसा हुआ था। क्या होगा? कैसे जियेंगे? दमयन्ती ने धीरे-से कहा, "जाना कहाँ है? लोगों की क्या परवाह करना? जो दूसरे पर कीचड़ उछालेगा उसके अपने हाथ भी तो गन्दे होंगे। लोग तो मेरे बारे में क्या-क्या कहते हैं? लेकिन मुझे पता है कि मैं निर्दोष और स्वच्छ हूँ। दुनिया में कुत्ते बहुत हो गये हैं तो क्या जीना छोड़ दें? इस डर से कि कुत्ता काट लेगा उसे दुतकारना छोड़ दें?"

​चिन्नी झुग्गी के कोने में एकदम डरी-सहमी सिकुड़ी हुई-सी पड़ी थी। उसकी आँखें डर से पत्थर हो गयी थीं।

​बाहर का अँधेरा काला घना और शान्त था। दिन भर हो-हल्ला करनेवाले आसपास के लोग अपनी-अपनी झुग्गियों पर लौट चुके थे। इतमीनान था उन्हें मुजरिम को पुलिस पकड़ ले गयी है। उसे तो दण्ड मिलेगा ही। इक्का-दुक्का लोग थाने तक भी जाकर लौट आये थे। पता चला किशन थाने में ही है। हँसी-मजाक और चाय नाश्ते के साथ-साथ पूछताछ चल रही है। बस्ती का खदबदाता माहौल बदस्तूर चलने लगा था जैसे कुछ हुआ ही न हो!

​गलियों में एक-दूसरे से लड़-लड़कर लहूलुहान होते कुत्तों के भौंकने की आवाजें आ रही थीं। आज माँ ने चूल्हा भी नहीं जलाया था। उसकी आँखें एकदम लाल अंगारे जैसी थीं। अभी थोड़ी ही देर हुई थी कि झुग्गी के बाहर उन्हें कुछ शोर-सा सुनाई दिया। झुग्गी का दरवाजा खटका। न चाहते हुए माँ को खोलना पड़ा। दस-पन्द्रह हट्टे-कट्टे आदमी खड़े थे। झक्क सफेद कुर्ते पाजामेवाली एक भारी-भरकम काया हाथ जोड़कर आगे बढ़ी। पीछे से आवाज आयी, "ये तिवारीजी हैं विपक्ष के नेता?" अपने चेहरे पर गद्गद भाव छिपाकर मायूसी-सी लाकर कहा, "आपकी बच्ची के साथ जो हुआ हमें अफसोस है। आपके साथ हमदर्दी है हमें। आपकी बच्ची हमारी बच्ची। हम छोड़ेंगे नहीं मुजरिम को। तन-मन से आपके साथ हैं हम। आप पीछे मत हटना। हम मामले को बहुत आगे तक ले जायेंगे।"

​मारे गुस्से के माँ काँपने लगी थी। गला सूख गया था। बमुश्किल बोल पाई, "कुछ भी तो नहीं हुआ मेरी बच्ची के साथ फिर हम बात क्यों बढ़ायें? कुछ हुआ ही नहीं...मेरी बच्ची की जान छोड़िये।"

​भारी-भरकम कायावाले की भी जैसे पूँछ पर लात पड़ गयी, "ऐसे कैसे छोड़ दें? आपकी बेटी हमारे लिए एक मुद्दा है। आनेवाले चुनावों के लिए यों भी हमारे पास कोई मुद्दा नहीं है। हम इसी को मुद्दा बनायेंगे। बच्चियों के साथ बढ़ते बलात्कार और बिगड़ती कानून व्यवस्था यह मुद्दा! हमें पता है आप बदनामी के डर से मामले को छिपाना चाहते हैं। पर हम दूसरी पार्टीवालों के कारनामे जनता के सामने रखेंगे। हमने मीडियावालों को भी फोन कर दिया है। कैमरे लेकर आते ही होंगे।"

​   तड़फकर रह गयी थी माँ। दमयन्ती और आसपास के दो-चार लोगों ने भी कहा, "जब कुछ हुआ ही नहीं तो?"

​"नहीं हुआ तो भी मामले की जाँच तो होनी चाहिए? बच्ची की मेडिकल जाँच से सब पता चल जायेगा। कुछ हुआ है या नहीं? हमने ऊपर तक फोन कर दिये हैं। बड़े थाने से दल-बल के साथ आती होगी पुलिस..."

​मीडिया और पुलिसवाले आ पहुँचे थे।

​खतरे में बच्चियाँ हमारी हैं। पांडे की पार्टी बलात्कारी है। आसमान नारों से गूँजने लगा था।

​मारे डर, घबराहट, गुस्से और दहशत के चिन्नी थरथरा रही थी। उसे चक्कर आने लगे थे और वह गिर-पड़ने को हो रही थी। दो-एक पुलिसवाले उसकी ओर लपके-बच्ची की ये हालत है और आप कह रहे हैं कुछ हुआ ही नहीं। और वे बच्ची को जाँच के लिए लेकर चल पड़े। पीछे रोती-कुरलाती माँ चली आ रही थी। जैसे उसकी बच्ची को जिबह करने के लिए ले जाया जा रहा हो! पीछे-पीछे हो-हल्ला करती हुई भीड़ चली आ रही थी। गिरती-पड़ती बेहाल माँ चीखी-कुत्तो! कमीनो!! ये क्या जबरदस्ती है? जो नहीं हुआ, वो अब हो रहा है...सबके सामने...।