पुस्तक समीक्षा - कोख का सौदा Prafulla Kumar Tripathi द्वारा पुस्तक समीक्षाएं में हिंदी पीडीएफ

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पुस्तक समीक्षा - कोख का सौदा

       आस पास के पात्रों की कहानियाँ  लेकर रची बुनी हुई पुस्तक है कोख का सौदा ।

          अपरिमित स्नेह और संकोच के साथ इंदुभूषण  जी ने अपनी लघु कथाओं  के इस संग्रह को मुझे पढ़ने के लिए सितंबर , 2025 में भेजा था |मैंने उसे सरसरी निगाह में 27 सितंबर को पढ़ भी लिया था लेकिन उस दृष्टि से नहीं कि उस पर समीक्षा लिखी जाए |इधर अपने गृह जनपद गोरखपुर की एक पैतृक संपत्ति को बेंचने के जाल में मैं ऐसा उलझा कि सारा लिखना पढ़ना बाधित हो गया |बीच में इंदु  जी का इस बारे में स्मरण दिलाना भी मुझे याद है |

          पहले ही बताना चाहूँगा कि मैं कोई प्रोफेशनल समीक्षक होने का दावा नहीं करता हूँ |इसलिए मेरी समीक्षा एक पाठकीय समीक्षा की  तरह ली जानी चाहिए |इसे कहना इसलिए आवश्यक हो चला है क्योंकि इन दिनों हिन्दी साहित्य में समीक्षकों में भी वर्ग भेद और वाद की गंदी घुसपैठ हो गई है |पिछले दिनों जैसा कि मेरे एक साहित्यिक मित्र श्री शशिबिन्दु नारायण मिश्र  ने संकेत दिया कि अब तो आचार्य रामचन्द्र शुक्ल,डा. राम बिलास शर्मा , नामवर सिंह आदि  की समीक्षा दृष्टि पर भी कुछ “नए” लोग प्रश्न उठाने लगे हैं |आप समझ सकते हैं कि कौन हैं ये लोग !प्रतीक और परंपराओं को तोड़ कर अपनी अलग पहचान बनाने में जुटे हुए लोग |                                                                                                                         आकाशवाणी में अपनी सेवाकाल के स्वर्णिम दौर में मुझे भी इंदुभूषण जी का साथ मिला है|उनके स्वर और व्यवहार की मधुरता, उद्घोषणा की लयात्मकयता से कौन नहीं प्रभावित होगा ? उन्होंने उस दौर में अपनी अलग पहचान बनाने में सफलता अर्जित की जब आकाशवाणी गोरखपुर में अनेक दिग्गज उद्घोषक कार्यरत थे | उन दिनों रेडियो में अक्सर प्रोड्यूसर कमजोर स्क्रिप्ट होने पर उसकी  प्रभावी प्रस्तुति के लिए मिर्च मसाले के तड़के के समान अच्छी आवाज और अच्छे ध्वनि प्रभाव आदि का उपयोग किया करते थे |इंदु भूषण के हाथ में वह हुनर था कि स्क्रिप्ट पकड़ा देने से वे सारी कमियाँ दूर हो जाया  करती  थीं |धीरे धीरे इंदु भी मेरी प्रस्तुतियों के बिन्दु बनते चले गए और सिंधुपूर्ण कार्यक्रमों का सिलसिला चल पड़ा था |उन्हीं मे से एक एड्स पर आधारित रेडियो रूपक था “ताकि कंधा मिल सके !” वे सभी स्मृतियाँ अभी भी मेरे मन में जीवन्त हैं |

​​अब इनकी पुस्तक के बारे में |पुस्तक का आवरण सम्मोहक है और पुस्तक के नाम के अनुकूल भी |इस पुस्तक को इंदु जी अपने कवि हृदय पिताजी को समर्पित करते हुए भावुक हो उठते  हैं और उसी के अनुकूल उन्होंने अभिव्यक्ति की  है |सभी कहानियों को पढ़ने के बाद कहानीकार का लिखा आमुख (दो शब्द) एकदम सटीक लगने लगता है क्योंकि इन सभी लघु कथाओं के पात्र और परिस्थितियाँ हमारे इर्द  गिर्द दिखाई देने लगते हैं |                                 

                                 हिन्दी साहित्य के “लोहिया” कहे जाने वाले प्रोफेसर चितरंजन मिश्र की  शुभाशंसा में लिखी बातों से मैं अपनी पूर्ण सहमति व्यक्त करते हुए कहना चाहता  हूँ कि इंदु की इन सभी कहानियों में भाषा की सरलता,आंचलिकता,सटीकता और प्रवाह मयता बहुत मायने रखती है |भाषा और अभिव्यक्ति ऐसी मानो कागज़  पर शब्द नहीं, चित्र उभरते चले जा रहे हैं |मानो वे सभी पात्र और परिस्थितियाँ जीवन्त होकर पाठक के संग साथ चल रहे हैं !

​​इंदु की पहली कहानी के शीर्षक ने चौंका दिया – दिव्या He/She .लेकिन जब कहानी पढ़ी तो मन प्रसन्न हो उठा |उभयलिंगी बच्चे को कितनी सरलता से उसके व्यक्तित्व को खंडित होने से उसके अभिभावक बचा ले गए यह अचरज भरी लघु कथा बहुत बड़ा संदर्श दे गई | दूसरी कहानी शशि धरन  नामक छोटे पद  पर कार्यरत पात्र की है जो अपनी सादगी से सभी का चहेता बना हुआ है |विनम्रता,निष्ठा,सहयोग उसके आभूषण हैं और इसी विशेष गुण के कारण वह एक दिन उसी कार्यालय में एक बड़ी जिम्मेदारी संभाले जाने योग्य पाया जाता है |यह कहानी पढ़ने में सीधी सादी लगती  है लेकिन महत्वपूर्ण संदेश इसलिए देती नजर आती है क्योंकि शशि धरन  जैसे लोग अब रह कहाँ  गए हैं ?परिवार,कार्यालय या समाज सभी जगह व्यक्ति अब इतना आत्म केंद्रित होता  जा रहा है कि सद्भाव और सद्भाव की भावना मानो लुप्त सी होती जा रही है |  ​​​​इसी तरह गाँव की खिलंदड़ लड़की मंजरी पर केंद्रित लघु कहानी पाठक के मन को बांधती चलती है |इस अच्छी और प्रेरक लघु कथा की खास बात यह है कि कहानीकार ने ग्रामीण पृष्ठभूमि के आंचलिक और बोलचाल के शब्दों का उपयोग किया है जैसे – जवार ,भिनसारे आदि |

​​​​कोख का सौदा कहानी की मुख्य किरदार है देवकली |उसके भोले पति  दीनानाथ को उसकी मालकिन लालच देती है कि वह अपनी पत्नी को किराए की कोख (सरोगेसी) के लिए किसी तरह राजी कर ले तो वह उसे ढेर सारा रूपया देंगी |पहले पत्नी इनकार करति है लेकिन लालच में आकर वह किसी तरह अपनी पत्नी को राजी कर लेता है |अब देवकली के पेट में किसी अंग्रेज का बच्चा पलने बढ़ने लगा था |नौ माह के बाद बच्चे ने जन्म लिया तब तक उसकी कोख का सौदा हो चुका था और उसे विवश होकर अपने पेट से जन्मे बच्चे को देना पड़ा |देवकली मातृत्व की गूढ भावनाओं में जकड़ चुकी थी लेकिन सौदा और सौदागर उस पर भारी पड़ते हैं |बच्चा पैदा करने के दौरान उसकी जान को भी खतरा उत्पन्न  हो गया था |गूढ संदेश दे रही इस कहानी में देवकली और दीनानाथ प्रतीक बन कर सामने आए हैं कि किस तरह आज का इंसान पैसों की लालच में अपनी  कोमल भावनाओं और मातृत्व सुख जैसे दैवीय उपहारों की  भी तिलांजलि देने को विवश होता जा रहा है |

​​​​इस गागर में सागर सरीखे लघु कथा संग्रह में अन्य कहानियाँ हैं-रधिका,रजिंदर भैय्या,डा गौरव,उड़न परी,कविवर परवीन प्रभाकर,बदल रही है फिजा ,मनवन्ती ,परसोतिम  बाबा ,हवा में जहर है,डाक्टर चंद्रा,ने क्षितिज की ओर,इमरान और चंदेसर |

​​​इसमें कोई दो राय नहीं कि इंदु भूषण  की कलम में वह जादू है जो पाठकों को मंत्रमुग्ध कर देने में कामयाब हो गई है | पाठक जब किसी भी कहानी को पढ़ना शुरू करता है तो उसे पूरा पढ़ कर ही रुक पाता है |इंदु भूषण जैसे कथाकारों को हिन्दी साहित्याकाश में उचित प्रोत्साहन मिलना चाहिए |उनके लिए , उनके भविष्य के लेखन के लिए शुभकामनाएँ ।