ज़ख्मों की शादी - 13 Sonam Brijwasi द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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ज़ख्मों की शादी - 13

।Past Time – जब कबीर ने पहली बार जिम्मेदारी ओढ़ी

उस दिन कबीर देर तक चुप रहा था। उसकी आँखों में अब गुस्सा नहीं था, बल्कि एक अजीब-सी थकान…और कहीं गहराई में डर।
वो धीरे-धीरे सृष्टि के पास गया। आज उसकी चाल में रौब नहीं था,
आवाज़ में हुक्म नहीं था। बस भारीपन था।

कबीर ने रुकते-रुकते कहा—
जो हुआ… वो हो चुका है, सृष्टि।
मैं उसे बदल नहीं सकता।

सृष्टि ने उसकी तरफ देखा तक नहीं। वो खिड़की की तरफ मुँह किए बैठी थी। आँखें सूखी थीं…शायद रो-रोकर थक चुकी थीं।

कबीर ने आगे कहा—
पर अब… अब मैं अपने बच्चे का ख्याल रखूँगा।

ये शब्द सृष्टि के दिल में सीधे नहीं उतरे पहले टकराए, फिर धीरे-धीरे पिघले। 

उसने बहुत देर बाद हल्की-सी आवाज़ में पूछा—
सिर्फ बच्चे का…या मेरा भी?

कबीर कुछ पल चुप रहा। 

फिर बोला—
दोनों का।

ये कोई माफी नहीं थी। कोई इज़हार नहीं था। पर पहली बार
उसकी बात में झूठ नहीं था। सृष्टि की पलकों में नमी आ गई।
वो अब भी टूटी हुई थी, पर उसके अंदर का डर थोड़ा-सा कम हुआ। उसने बहुत मुश्किल से सिर हिलाकर हाँ कह दी। और वहीं से सब कुछ धीरे-धीरे बदलने लगा। कबीर अब 

सुबह उठते ही सबसे पहले सृष्टि से पूछता—
दर्द तो नहीं है?

वो दवाइयों का टाइम खुद याद रखता। डॉक्टर के पास खुद ले जाता। रात में उसके लिए गर्म दूध रखता। अगर सृष्टि को चक्कर आते तो वो बिना कुछ कहे उसे थाम लेता। अब वो छूता नहीं था सिर्फ संभालता था। सृष्टि अब भी डरती थी, पर वो देख रही थी
कि ये वही आदमी है जो कभी ज़ख्म देता था…और आज उन्हीं ज़ख्मों पर मरहम रखने की कोशिश कर रहा है।
पर कुछ ज़ख्म इतनी आसानी से नहीं भरते। क्योंकि देखभाल से शरीर सँभल सकता है…रूह नहीं।

उस शाम कबीर सृष्टि के लिए सूप बना रहा था कि अचानक उसका फोन बज उठा।

Unknown Number.

कबीर ने कॉल उठाई और बोला—
हैलो?

उधर से ठंडी, जहरीली हँसी सुनाई दी —
कबीर… पहचाना मुझे?

कबीर की भौंहें तन गईं।

Kabir बोला - 
कौन हो तुम?

आवाज़ और धीमी हो गई—
मैं कौन हूँ, ये जानना ज़रूरी नहीं।
बस इतना समझ ले, अगर अपनी बीवी को सही-सलामत देखना है तो… अपने बच्चे को ख़त्म कर दे।

कबीर का खून खौल उठा। उसकी उँगलियाँ फोन को कसकर भींच गईं।

उधर से वही आवाज़—
वैसे तेरी बीवी…
दिखने में बड़ी कमाल चीज… है।

कबीर दहाड़ उठा —
कमीन—!

पर तभी—
आहह—!

अंदर से सृष्टि की चीख़ गूँजी। कबीर का दिल जैसे रुक गया।
उसने फोन वहीं फेंका और दौड़ता हुआ कमरे की तरफ भागा।

वो चीखा - 
सृष्टि!

कमरे में घुसते ही उसने देखा , खिड़की का शीशा टूटा हुआ था।
ज़मीन पर पत्थर पड़ा था। सृष्टि दीवार से सटी हुई थी। चेहरा सफ़ेद पड़ चुका था। दोनों हाथ पेट पर रखे हुए वो बुरी तरह काँप रही थी।

कबीर ने उसे थामते हुए पूछा —
कुछ हुआ?!


सृष्टि ने काँपती आवाज़ में कहा—
खि… खिड़की से…किसी ने पत्थर मारा…।

अगर वो आधा सेकंड भी इधर-उधर होती तो पत्थर सीधा उसके पेट पर लगता। कबीर ने खिड़की से बाहर झाँका, अंधेरा… सन्नाटा…कोई नहीं। पर उस सन्नाटे में एक साफ़ संदेश था—
ये चेतावनी थी। कबीर ने सृष्टि को सीधे अपनी बाहों में ले लिया।
पहली बार उसकी पकड़ में हक़ नहीं डर था।

Kabir बोला - 
कुछ नहीं होगा…मैं हूँ ना…।

वो खुद से ज़्यादा उसे यक़ीन दिला रहा था। सृष्टि उसकी छाती से लगी हुई धीरे-धीरे सिसकने लगी। उसका पूरा शरीर काँप रहा था।
और उसी पल कबीर समझ गया ये सिर्फ धमकी नहीं थी। ये खेल शुरू हो चुका था। एक ऐसा खेल जिसमें दाँव पर सिर्फ उसका अतीत नहीं…उसका बच्चा और सृष्टि की ज़िंदगी थी।

कबीर अकेला सोफ़े पर बैठा था। कमरा शांत था… पर उसका दिल बुरी तरह धड़क रहा था। तभी फोन फिर से बजा।
Unknown Number.
कबीर ने कॉल उठाई। इस बार उसकी आवाज़ में डर नहीं खून खौलता गुस्सा था।

Kabir बोला - 
क्या चाहते हो तुम?

उधर से वही बेरहम आवाज़ आई—
कबीर… come down।
चल, तुझे दो option देता हूँ।

कबीर की उँगलियाँ फोन को जकड़ चुकी थीं।

वो आदमी बोला - 
या तो अपने बच्चे को ख़त्म कर दे…”

एक पल का ठहराव।

फिर बोला - 
या फिर अपनी बीवी को एक रात के लिए मेरे हवाले कर दे।

कबीर की आँखों के सामने अंधेरा छा गया।

वो दहाड़ उठा —
साले…!
अगर मेरी बीवी को हाथ भी लगाया ना—
तेरा हाथ काट दूँगा!

उधर से ठहाका गूँजा —
तो फिर अपनी बीवी को मरते हुए देख।

कॉल कट गई। उसी पल कबीर की नाक में एक अजीब-सी तेज़ बदबू गई—गैस।
उसका दिल बैठ गया। वो दौड़ता हुआ किचन की तरफ बढ़ा—
और तभी, उसने देखा सृष्टि वहाँ खड़ी थी। नाक बंद थी। जुकाम की वजह से उसे कुछ भी महसूस नहीं हो रहा था। वो स्विच बोर्ड की तरफ बढ़ी। लाइट जलाने के लिए प्लग पर हाथ रखने ही वाली थी—

वो चिल्लाया -
सृष्टि…!

कबीर ने बिजली की तरह झपट्टा मारा। एक झटके में उसका हाथ पकड़कर उसे अपनी छाती से ज़ोर से भींच लिया।
क्लिक!
उसी पल उसने गैस बंद कर दी। सृष्टि हक्की-बक्की रह गई।

श्रृष्टि बोली - 
क्या… क्या हुआ?

कबीर ने कुछ नहीं कहा। तेज़ी से सारी खिड़कियाँ खोल दीं। दरवाज़े खोल दिए। ठंडी हवा अंदर आई। मौत बाहर गई।

तभी कबीर ने धीमी लेकिन सख़्त आवाज़ में कहा—
गैस लीक हो रही थी।

सृष्टि की आँखें फैल गईं। उसने अपने पेट पर हाथ रखा। पूरा शरीर काँप उठा। अगर बस एक सेकंड भी देर हो जाती—वो कुछ नहीं बोल पाई। बस धीरे से कबीर की शर्ट को मुट्ठी में कस लिया। कबीर ने उसे और कसकर पकड़ लिया। आज पहली बार वो जान चुका था, ये कोई धमकी नहीं थी। ये जंग थी। और इस बार अगर वो हारा, तो सिर्फ सृष्टि नहीं… उसका बच्चा भी इस दुनिया में आने से पहले खो जाएगा। उसकी आँखों में आग जल उठी।

वो मन ही मन बोला - 
अब नहीं…अब मैं पीछे नहीं हटूँगा।

Aapko kya lagta hai -
Kon hoga vo dhamki vala aadmi?
Kya kabir pata lagayega ya nahin?

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