मझधार Rajeev kumar द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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मझधार

 


प्रेमी युगल अपने-अपने घरों में करवटें बदल रहे थे, नींद किसी को भी नहीं आ रही थी क्योंकि एक दुसरे का चेहरे और एक दुसरे से किया गया वादा दोनों दिलों को तड़पा रहा था।
रजनी अपने बिस्तर से उठी और बगल में सो रही मम्मी की तरफ देखा औरी चप्पल हाथ तें उठा कर चूपचाप दरवाजा खोलकर बहार आ गई। झबरू एक बार भोंकने के बाद चूप होकर बैठ गया। दुधिया चाँदनी ने रास्ता दिखाया।
सुरेश ने बाहर आकर कुत्ते को शांत रहने का इशारा किया।
रजनी ने कहा ’’ मैं तो बिल्कूल भी डर गई थी, थोड़ी देर अगर तुम न आते तो मैं तो घर भाग जाती। ’’
सुरेश का रजनी के मूंह पर हाथ रखने के कारण उसको चुप कराना और उसको अपने प्यार पर भरोषा दिलाना भी था। समय तो थोड़ी देर का ही था, कभी भी कोई जागकर ढुंढ सकता था। और एक दुसरे से कहने वाली दिल की बात बहुत बड़ी थी। रात के सन्नाटे में दोनों -टहलते बहुत दुर तक निकल आए, मतलब नदी किनारे तक। रजनी ठंडी रेत पर बैठने की जिद्द कर रही थी मगर जीत सुरेश की हुई। बनवारी काका की गद्दे लगी नाव पर थोड़ी देर बैठना तय हुआ। सुरेश, रजनी को बांहों में भरकर लेटा रहा और उसके नरम मखमली बाल पर अँगुली फिराता रहा। दोनों ही मौन रूप धारण कर एक दुसरे के प्रेम को महसूस करते रहे।
बनवारी काका भी कितने भुलक्कड़ निकले, नाव को किनारे से बांधना ही भूल गए थे। नतीजा नाव कब किनारा छोड़ चुकी थी, प्रेम में खोए प्रेमी युगल को इस बात का पता ही नहीं चला। लहरों का शोर धीरे-धीरे बढ़ने लगा और बढ़ने लगा रजनी के दिल का शोर। धारा की कलकल और रजनी के दिल की धक धक एक संगीत उत्पन्न करने लगी। सुरेश का मन शांत जल की तरह शांत था और चेहरे पर सौम्यता के साथ मंद मुस्कान भी दिख रही थी।
रजनी ने कहा ’’ क्या पागलों की तरह मुस्करा रहे हो, तुम्हारी ही जिद थी न, नाव पर बैठने की, आज तो हमलोग पकड़े जाएंगे, और अगर मझधार में फंसे तो जान जाएगी। हे भगवान, क्या करें, गुस्सा बहुत आ रा है उस बनवारी काका पे। नाव भी बांधना भुल गए। ’’
सुरेश अब भी मुस्करा रहा था, उसने कहा ’’ बनवारी काका की इस भुल की वजह से आज अपना प्रेम या तो साबित हो जाएगा या हमदोनों एक साथ अमर हो जाएंगे। अरे पगली, मझधार में भी साथ निभाउंगा और मझधार से खिंच लाउंगा। ’’
नाव पर एक जोरदार झटका पड़ा अब तो सुरेश की हेकड़ी निकलने लगी। सुरेश मल्लाह का बेटा था और उसको मझधार का पता पहले से ही था। सुरेश ने रजनी की नम आँखों को देखा। सजनी का यह हाल कोई साजन कैसे बर्दाश्त कर सकता है भला।
सुरेश ने जैसे तैसे करके अपना एक हाथ और उसके बाद फिर अपना दुसरे हाथ को पतवार की तरह इस्तमाल किया, धारा विरूद्ध पतवार काम नहीं करता है तो फिर हाथ क्या चीज है। रजनी भला कैसे रूआंसी बैठी रहती, उसने भी दोनों हाथ लगाए अब तो चार पतवार हो गए और उससे भी मजबूत प्यार, अब तो लहरों को हारना पड़ा।
रूआंसे तो दोनों ही थे, किनारे पर आकर दोनों का प्यार छलका।
अपने घर तक रजनी , सुरेश की गोद में ही गई।

समाप्त