भगवान गणेश की पौराणिक कथा piku द्वारा पौराणिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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भगवान गणेश की पौराणिक कथा

एक समय जब माता पार्वती मानसरोवर में स्नान कर रही थी तब उन्होंने स्नान स्थल पर कोई आ न सके इस हेतु अपनी माया से गणेश को जन्म देकर 'बाल गणेश' को पहरा देने के लिए नियुक्त कर दिया।

इसी दौरान भगवान शिव उधर आ जाते हैं। गणेशजी उन्हें रोक कर कहते हैं कि आप उधर नहीं जा सकते हैं। यह सुनकर भगवान शिव क्रोधित हो जाते हैं और गणेश जी को रास्ते से हटने का कहते हैं किंतु गणेश जी अड़े रहते हैं तब दोनों में युद्ध हो जाता है। युद्ध के दौरान क्रोधित होकर शिवजी बाल गणेश का सिर धड़ से अलग कर देते हैं।

शिव के इस कृत्य का जब पार्वती को पता चलता है तो वे विलाप और क्रोध से प्रलय का सृजन करते हुए कहती है कि तुमने मेरे पुत्र को मार डाला। माता का रौद्र रूप देख शिव एक हाथी का सिर गणेश के धड़ से जोड़कर गणेश जी को पुनःजीवित कर देते हैं। तभी से भगवान गणेश को गजानन गणेश कहा जाने लगा।

पूर्वकाल में पार्वती देवी को देवताओं ने अमृत से तैयार किया हुआ एक दिव्य मोदक दिया। मोदक देखकर दोनों बालक (कार्तिकेय तथा गणेश) माता से माँगने लगे।

तब माता ने मोदक के महत्व का वर्णन कर कहा कि तुममें से जो धर्माचरण के द्वारा श्रेष्ठता प्राप्त करके सर्वप्रथम सभी तीर्थों का भ्रमण कर आएगा, उसी को मैं यह मोदक दूँगी।

माता की ऐसी बात सुनकर कार्तिकेय ने मयूर पर आरूढ़ होकर मुहूर्तभर में ही सब तीर्थों का स्नान कर लिया। इधर गणेश जी का वाहन मूषक होने के काराण वे तीर्थ भ्रमण में असमर्थ थे। तब गणेशजी श्रद्धापूर्वक माता-पिता की परिक्रमा

करके पिताजी के सम्मुख खड़े हो गए। यह देख माता पार्वतीजी ने कहा कि समस्त तीर्थों में किया हुआ स्नान, सम्पूर्ण देवताओं को किया हुआ नमस्कार, सब यज्ञों का अनुष्ठान तथा सब प्रकार के व्रत, मन्त्र, योग और संयम का पालन- ये सभी साधन माता-पिता के पूजन के सोलहवें अंश के बराबर भी नहीं हो सकते।
इसलिए यह गणेश सैकड़ों पुत्रों और सैकड़ों

गणों से भी बढ़कर है। अतः यह मोदक मैं गणेश

को ही अर्पण करती हूँ। माता-पिता की भक्ति

के कारण ही इसकी प्रत्येक यज्ञ में सबसे पहले

पूजा होगी।

आशा करती हूँ आपको भगवान गणेश की कहानी पसंद आई होंगी....
ऐसे ही और कहानियाँ पढ़ते रहने के लिए मुझे फॉलो करे और अपनी समीक्षा दर्ज करवाए... ताकि मैं ऐसे ही आप लोगो के लिए और ऐसी ही पौराणिक और आध्यात्मिक कथाएँ लेकर आऊं ❤️.....


संत वाणी 🙏👉
४६-संसारमें ईश्वर ही केवल सत्य है और सभी असत्य है।

४७- दुर्लभ मनुष्य जन्म पाकर जो व्यक्ति ईश्वरकी प्राप्तिके लिये यत्न नहीं करता उसका जन्म वृथा ही है।

४८-ईश्वरमें भक्ति और अटूट निष्ठा करके संसारका सब काम करनेमें जीव संसार- बन्धनमें नहीं पड़ता।

४९-जो ईश्वरका चरण-कमल पकड़ लेता है, वह संसारसे नहीं डरता।

५०-ईश्वरके चरण-कमल पकड़कर संसारका काम करो, बन्धनका डर नहीं रहेगा।

५१-पहले ईश्वर-प्राप्तिका यत्न करो, पीछे जो इच्छा हो कर सकते हो।
५२-जो ईश्वरपर निर्भर करते हैं, उन्हें ईश्वर जैसे चलाते हैं, वैसे ही चलते हैं, उनकी अपनी कोई चेष्टा नहीं होती।

५३-गुरु लाखों मिलते हैं, पर चेला एक भी नहीं मिलता। उपदेश करनेवाले अनेकों मिलते हैं, पर उपदेश पालन करनेवाले विरले ही।

५४-ईश्वरका प्रकाश सबके हृदयमें समान होनेपर भी वह साधुओंके हृदयमें अधिक प्रकाशित होता है।

५५-समाधि अवस्थामें मनको उतना ही आनन्द मिलता है, जितना जीती मछलीको तालाबमें छोड़ देनेसे।