अर्धांगिनी-अपरिभाषित प्रेम... - एपिसोड 1 रितेश एम. भटनागर... शब्दकार द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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अर्धांगिनी-अपरिभाषित प्रेम... - एपिसोड 1

हर तरफ बस एंबुलेंस के सायरन का शोर सुनायी दे रहा था,लोग बदहवास से होकर इधर उधर अपने अपनों को बचाने के लिये भाग रहे थे, पूरी पूरी रात लाइनों मे लगने के बाद भी बहुत से ऐसे लोग रह जाते थे जिन्हे ऑक्सीजन का सिलेंडर नही मिल पाता था!! जहां एक तरफ अपने प्रियजनों की उखड़ती हुयी सांसो की चिंता वहीं दूसरी तरफ ऑक्सीजन सिलेंडर ना मिल पाने की खिसियाहट, जहां देखो वहीं बस लोग आंखो मे आंसू लिये फड़फड़ाते, खिसियाये होंठो के साथ जगह जगह हाथ जोड़कर मिन्नते करते खड़े दिख रहे थे कि "भगवान के नाम पर प्लीज प्लीज बस एक सिर्फ एक ऑक्सीजन सिलेंडर दे दो लेकिन ऐसा लग रहा था मानो पूरा का पूरा मेडिकल सिस्टम, सरकारी तंत्र और सरकार फेल हो चुके थे..!!

कोरोना की दूसरी लहर अपने पूरे शबाब पर थी..!!

दिन मे पचास फोन आते थे जतिन के पास, कोई मिन्नतें करता था कि भइया हॉस्पिटल मे बेड नही मिल रहा प्लीज कुछ करवा दीजिये, कोई ऑक्सीजन सिलेंडर के लिये हाथ जोड़ता था और कोई.... अपने प्रियजन की मौत होने पर उसका दाह संस्कार ठीक से करवाने के लिये उसके सामने रोता था और जतिन भी बिना सोचे समझे बस निकल पड़ता था घर से सबकी मदद करने के लिये!! वो इस बात की भी परवाह नही करता था कि कोरोना की इस जानलेवा लहर मे अगर उसे कुछ हो गया तो उसके परिवार मे उसके मम्मी पापा को कौन संभालेगा!! उसे जैसे जुनून सा हो गया था कि मेरे साथ जो होना हो.. हो जाये पर मै रुकुंगा नही!! एक जिद थी उसे कि मुझे मेरे हैरान परेशान दुखी शहरवासियो की हर संभव मदद करनी है बस...!! दिन हो रात हो सुबह हो शाम हो... जब उसे पता चल जाता था कि उसकी किसी को जरूरत है... वो बस निकल पड़ता था अकेले ही.. सबके लिये!!

पर जतिन भी लाचार था... सरकारी तंत्र फेल हो चुका था, ऑक्सीजन की भारी कमी थी, हस्पताल मरीजो से पटे पड़े थे, हस्पतालो मे पैर रखने तक की जगह नही थी, ऑक्सीजन सिलेंडर भरने वाली फैक्ट्रियो के बाहर दो दो किलोमीटर लंबी लाइने लगी हुयी थी,लोग जादा थे और सिलेंडर कम... बहुत जादा कम!! और जो थे वो इतने महंगे कि बहुत से लोग तो उन सिलेंडरो का खर्च उठाने मे भी सक्षम नही थे इसी कारण से एक दिन लोगो की मदद कर पाने मे असमर्थ जतिन खिसियाते हुये दांत भींच कर आंखो मे आंसू लिये.. जमीन पर जोर जोर से अपने पैर पटक कर झुंझुलाते हुये बोला- हे मेरे भगवान ये क्या हो रहा है!! क्यो हम इंसानो को इतना लाचार बनाया है आपने कि हम चाहते हुये भी अपने अपनो की जिंदगी नही बचा पा रहे, बेवजह जवान जवान लोग काल के मुंह मे समा रहे हैं, हे मेरे भगवान मै क्या करूं... मै क्या करूं जो इन लोगों के आंसू पोंछ पाऊं...!!
जतिन लोगो की मजबूरी देखकर बौखलाया सा बस भगवान से सवाल पर सवाल पूछे जा रहा था, लेकिन... उसके किसी सवाल का जवाब उसे नही मिल रहा था, जवाब मिलता भी तो कैसे? गलती तो कहीं ना कहीं हम इंसानो की ही थी इस बीमारी को लाने मे.. भगवान ने हमे स्वस्थ रखने के लिये पेड़ दिये, जंगल दिये... हम इंसानो ने आधुनिकता की अंधी दौड़ मे सब काट दिये, नतीजा गर्मी बढ़ती गयी और फिर उस भीषण गर्मी से बचने के लिये हमने अपने घरों मे, ऑफिसो मे एसी लगाने शुरू कर दिये... ये भी नही सोचा कि एसी के दूसरी तरफ से निकलने वाली गर्म गैसें पर्यावरण को कितना नुक्सान पंहुचा रही हैं!! वर्चस्व की अंधी लड़ाई मे हर देश नये नये परमाणु हथियारो या जंग के गोला बारूदो का आविष्कार करके पूरी दुनिया को आग के हवाले करने को तैयार रहता है, ऐसे मे भगवान भी क्या करे.... वो भी लाचार हो गया हम इंसानो की मतलब परस्ती के चलते..!!

वहीं अगर जतिन के बारे मे बात की जाये तो करीब सैंतीस साल की उम्र का बेहद सकारात्मक सोच का एक ऐसा इंसान जो बचपन से ही समाज के लिये कुछ अच्छा करने की नीयत, हिम्मत और माद्दा रखता था, वैसे तो वो एक बिज़नेसमैन था लेकिन अपने बिजनेस के साथ साथ कई सामाजिक संस्थाओं से भी जुड़ा हुआ था, इन संस्थाओं मे ब्लड डोनेशन से जुड़ी संस्थाये, बच्चो के इलाज और शिक्षा से जुड़ी संस्थाये और घर से बेघर हुये बुजुर्गो की संस्थाओं जैसी संस्थायें थी चूंकि सामाजिक कामो से जुड़ा हुआ था तो उसे काफी लोग जानते थे इसी वजह से कोरोना के कारण कानपुर शहर मे मचे हाहाकार के बीच लोग उससे मदद मांगते थे और वो अपनी इंसानी क्षमताओ के हिसाब से सबके लिये खड़ा भी हो जाता था!! परिवार मे मम्मी पापा और छोटी बहन थी जिसमे से छोटी बहन की शादी हो चुकी थी और वो अपनी ससुराल मे काफी खुश थी..!!

नीयत, संस्कार और अपने खुद के लिये बनाये गये नियमो से बंधा "जतिन" एक बहुत ही प्यारा और चंचल स्वभाव का, जिंदगी से भरा एक ऊर्जावान इंसान था....

जहां एक तरफ कोरोना के प्रकोप से ना सिर्फ कानपुर पीड़ित था बल्कि पूरा उत्तर प्रदेश, पूरा भारत और पूरी दुनिया अपने अपनो को असमय खोने के गम मे दुखी थी... वहीं दूसरी तरफ कानपुर से करीब नब्बे किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ भी इस कोरोना नाम की बीमारी से अछूती नही थी,लखनऊ मे तो और बुरा हाल था.. !!
ऐसे ही एक शाम लखनऊ के रहने वाले 75 साल के रिटायर्ड बैंक कर्मी बाबू जगदीश प्रसाद श्रीवास्तव डरे हुये से, घबराये हुये से, हद से जादा व्याकुल से हुये, आंखो मे आंसू लिये अपनी पत्नी सरोज के साथ ड्राइंग रूम मे बैठे कोरोना से जुड़ी खबरें देख रहे थे और मन ही मन प्रार्थना कर रहे थे कि "हे भगवान सब कुछ ठीक हो जाये, हमे इस आपदा से बचाइये" उनके ऐसे डरे हुये और घबराने का कारण था कि उनके दामाद रवि की तबियत पिछले तीन चार दिनो से बहुत खराब थी, शुरू मे तो लगा था कि मौसम बदल रहा है इसलिये शायद नॉर्मल वायरल या जुखाम होगा पर तमाम दवाइयां देने के बाद भी जब उनकी तबियत ठीक नही हुयी तो आज दिन मे रवि का कोरोना टेस्ट करवाया गया था जिसकी रिपोर्ट रात तक आने वाली थी, बाबू जगदीश प्रसाद और उनकी पत्नी सरोज दोनो ने सुबह से कुछ नही खाया था बस हर थोड़ी देर मे अपनी बेटी मैत्री श्रीवास्तव को फोन करके रवि का हालचाल जान रहे थेे, मैत्री भी बहुत घबराई हुयी थी, रात मे दस बजे रवि की रिपोर्ट मिलनी थी शाम हो चुकी थी और ऐसा लग रहा था कि आज घड़ी की सुइयों ने भी जैसे ठान लिया था कि किसी भी कीमत पर दस नही बजने देंगे, ऐसा लग रहा था मानो समय जैसे रुक सा गया हो... उधर मैत्री को कुछ समझ नही आ रहा था इधर अपने घर में उसके मम्मी पापा लगातार भगवान से बस यही प्रार्थना करने मे लगे थे कि "हे भगवान हमारी बच्ची के साथ कोई अन्याय मत होने दीजियेगा!!" कि तभी बाबू जगदीश प्रसाद के मोबाइल की रिंग बजने लगी...उन्होंने जब अपने मोबाइल की स्क्रीन देखी तो उनका मन बहुत घबराने लगा, फोन उनकी बेटी मैत्री का था..!!

क्रमश:

क्या होगा जब जगदीश प्रसाद मैत्री का फोन रिसीव करेंगे? क्या रवि के लिये उनकी चिंता खत्म हो जायेगी या फिर....!!