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वजूद - 29

भाग 29

जब उसकी नींद खुली तो शाम हो चुकी थी। हालांकि शंकर उठकर मंदिर तक जाने की स्थिति में नहीं था। फिर उसने बड़ी हिम्मत की और खुद को लगभग घसीटते हुए मंदिर के अंदर लेकर गया। वहां उसने देखा कि शायद कुछ खाने को मिल जाए पर मंदिर में और भगवान की प्रतिमा के सामने कुछ नहीं था। कुछ फूल थे वो सूख चुके थे। वो निराश होकर फिर खुद घसीटते हुए उसी जगह आ गया था। उसके पास एक पानी की बोतल थी उसमें कुछ पानी था वो एक सांस में उसे गटक गया था। पर उस पानी से ना तो उसकी प्यास ही बुझी थी और ना ही भूख की अग्नि शांत हुई थी। वो फिर से वहीं लेट गया था। कुछ ही देर में उसकी फिर से आंख लग गई। पर भूख और प्यास ने उसे फिर से जगा दिया था। उसने इधर-उधर देखा पर वहां ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे वो अपनी भूख या प्यास को मिटा सके।

ऐसे ही तीन दिन बीत चुके थे। शंकर का शरीर लगभग उसका साथ छोड़ चुका था। वो अब उठ भी नहीं पा रहा था कि गांव में या आसपास कहीं चला जाए और अपने लिए पानी या भोजन की कोई व्यवस्था बना सके। उसने अपनी जगह से उठकर देखा तो उसे भगवान की प्रतिमा भी नहीं दिखाई दे रही थी, क्योंकि वो मंदिर के पिछले हिस्से में था। उसने फिर एक बार पुरजोर कोशिश की और बहुत ही मुश्किलों से मंदिर में पहुंचा। आज भी उसे मंदिर में कुछ खाने को नहीं मिला था। ऐसा लग रहा था जैसे इंसान भगवान से नाराज हो गया है। तीन दिनों से मंदिर में कोई नहीं आया था।

म्ंदिर में बने शिवलिंग पर टंगे एक पीतल के बर्तन को शंकर ने उतारने की कोशिश की, उसमें भी बहुत कम पानी उसे मिला उसने वही पिया और वहीं लुढ़क गया। अब शंकर मंदिर में ही पड़ा था। दो दिन और बीत गए इन दो दिनों में भी एक भी इंसान मंदिर में नहीं आया था। अब शंकर सिर्फ मंदिर में बनी भगवान शंकर की प्रतिमा को निहार रहा था और उस प्रतिमा देखते हुए ही उसने अपने प्राण त्याग दिए थे। शंकर अब इस दुनिया में नहीं रहा था। उसके चेहरे पर एक अधुरी सी मुस्कान थी। शायद इसलिए कि वो मंदिर में दो शंकर थे और दोनों को ही लगभग भूला दिया गया था। मरने से कुछ देर पहले तक शंकर मंदिर में विराजित शंकर की प्रतिमा को देख रहा था, जिसे पिछले पांच दिनों में कोई देखने नहीं आया था और एक वो शंकर था जिसे उसके लोग ही भूला चुके थे। उसकी मुस्कान के पीछे शायद एक कारण यह भी रहा हो कि अब वो इस दुनिया को छोड़कर जा रहा है और अब दूसरी दुनिया में वो अपने भैया हरी और भाभी कुसुम से मिलेगा।

शंकर के चेहरे पर टिकी वो अधुरी मुस्कान ना जाने कितने ही सवाल कर रही थी। कभी वो सवाल भगवान के लिए भी था और कभी इंसान के लिए और खासकर उसके गांव के लोगों के लिए भी था। उसकी मुस्कान शायद बहुत ही जल्द किसी की आंखों को चुभने वाली थी। उसके दिल को झंझोड़ देने वाली थी। शंकर की मौत के साथ उसकी सभी परेशानियों का आंत तो हो चुका था पर अब भी उसके मृत पड़े शरीर को बहुत कुछ झेलना था। शंकर की मौत को दो दिन हो चुके थे और उसका मृत शरीर वहीं मंदिर में ही पड़ा था। आखिरकार सात दिनों के बाद शायद इंसान को भगवान पर तरस आ ही गया था।

मंदिर का पुजारी सात दिनों के बाद मंदिर में आया था। सुबह का समय होने के कारण वो कुछ भजन गाते हुए मंदिर में पहुंचा और मंदिर पहुंचते ही उसकी सबसे पहले नजर शंकर के मृत पड़े शरीर पर पड़ी उसके मुंह से अचानक ही निकल गया राम... राम... मंदिर में यह कौन है ? उसने पास जाकर देखा तो उसे पता चला कि यह जो भी है वो अब इस दुनिया में नहीं है। वो उल्टे पैर ही अपने गांव में पहुंचा और अपने गांव के लोगों को मंदिर में शव पड़े होने की सूचना दी। जल्द ही पूरा गांव मंदिर पर आ चुका था।

काफी सोच विचार के बाद पुलिस को सूचना दी गई। पहले मंदिर के पास बनी चौकी पर फिर चौकी से सूचना थाने पर दी गई। थाने पर यह सूचना अब अविनाश के पास तक जा पहुंची थी। दूसरी ओर मंदिर में शव मिलने की सूचना अब शंकर के गांव में भी पहुंच गई थी तो उसे गांव के लोग भी मंदिर पर आ चुके थे। जल्द ही अविनाश भी चार सिपाहियों के साथ मंदिर में पहुंच गया था। अविनाश ने जैसे ही शंकर के शव को देखा उसे धक्का लगा। अविनाश ने शंकर को पहचान लिया था। हालांकि एक पुलिस अधिकारी होने के नाते उसे कानूनी कार्रवाई करना ही थी। उसने एक सिपाही से कहा- शंभू सिंह पंचनामा बनाओ और लाश को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भिजवा दो। शंभू ने भी सिर्फ जी, सर कहकर अपनी कार्रवाई में लग गया। जल्द ही उसने पंचनामा बनवाया और पांच लोगों के हस्ताक्षर ले लिए। अब अविनाश उस लाश की ओर बढ़ा। लाश की ओर बढ़ते हुए उसका हर कदम उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी ने उसे पैरों में हजारों टन का पत्थर बांध दिया है और फिर उसे चलने के लिए कहा जा रहा है। चलते हुए उसने प्रधान, सुखराम, शंकर के कुछ पुराने दोस्त, गांव के कुछ लोगों को देख रहा था।

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