वजूद - 3 prashant sharma ashk द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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वजूद - 3

भाग 3

वहीं तो भैया आज घर पर हो तो थोड़ा आराम कर लो रोज तो खेत में काम ही करते हो। ये काम तो हम यूं ही चुटकियों में कर देंगे। लाइए हमें दीजिए हम चारा डाल देते हैं। शंकर ने हरी की बात को काटते हुए कहा।

अब तू मानने वाला तो हैं नहीं चल तू ही कर ले। हरी फिर से खाट पर बैठते हुए बोला।

शंकर ने फिर से गमछा अपनी कमर में बांधा और गाय को चारा डाल दिया। गाय को चारा डालने के बाद उसी गमछे से अपना पसीना पोंछते हुए बोला- अरे बाप रे मैं तो भूल ही गया। भाभी ओ भाभी यह लो छह सौ रूपए। सुखराम काका ने काम के बदले दिए हैं।

कुसुम ने कहा- तो मैं क्या करूं इन रूपए का। तेरी मेहनत का पैसा है तू अपने पास रख।

शंकर ने कहा- भाभी हम क्या करेंगें इन रूपए का। दो वक्त की रोटी चाहिए और तन ढंकने का कपड़ा। आप और भैया मिलकर वो दोनों हमें दे देते हो तो इन रूपए का हमें क्या करना है। गांव के मेले में कभी जाते हैं तो आप और भैया दोनों रूपए दे ही देते हो। इसलिए ये रूपया तो आप ही रखो। वैसे भी इस घर की मालकिन आप हो। अब आप जानो इन रूपए का क्या करना है ?

रख लो, रख लो यह मानने वाला नहीं है, हरी ने शंकर की बात का समर्थन करते हुए कुसुम से कहा।

कुसुस ने रूपए लिए और रसोई में जाकर एक डिब्बे में रख दिए। रसोई से बाहर आते हुए कहा कि तेरी सारी कमाई इस इस डिब्बे में ही है। जब तेरी दुल्हन आएगी तो उसके लिए जेवर इसी से बनवाउंगी।

अरे भाभी आप फिर शुरू हो गई दुल्हन के लिए- शंकर ने फिर कुसुम से कहा।

हां, जब तक तेरी दुल्हन नहीं आ जाती मैं तो यही कहूंगी कुसुम ने शंकर को प्यार से डांटते हुए कहा।

हम शादी नहीं करने वाले हैं भाभी। शंकर ने अपने हाथ हिलाते हुए कहा।

अच्छा चल। अब हाथ पैर धो ले हम चाय बना देते हैं। कुसुम ने कहा।

हां भाभी चाय मिल जाए तो मजा ही आ जाए।

हां, बेटा आ गया है तो अब तो चाय बनेगी ही। चलो इस बहाने हमें भी चाय मिल जाएगी। हरी ने मजाक करते हुए कहा।

आप तो ऐसे कह रहे हैं जैसे मैं आपको चाय देती ही नहीं हूं। कुसुम ने कहा।

शंकर ने कहा भाभी आप तो चाय बनाओ, भैया के लिए भी बना लेना।

हां बना रही हूं। तू भी बैठ जा। काम करके आया है और फिर काम में लग गया। थक गया होगा। थोड़ा आराम कर ले।

ठीक है भाभी। शंकर ने कुसुम से कहा और फिर दूसरी खाट बिछाकर हरी के पास बैठ गया।

हरी ने शंकर से कहा- शंकर अगले सप्ताह फसल बेचने के लिए मैं शहर की मंडी जा रहा हूं। वहां से तेरे कुछ लाना है तो बता दें।

नहीं भैया हमें कुछ नहीं चाहिए। हां आप भाभी के लिए एक अच्छी सी साड़ी ले आना। हम देखे हैं भाभी के पास कोई अच्छी साड़ी नहीं है।

तेरी भाभी पहनती ही नहीं है।

आप लाइए तो सही, मैं कहूंगा भाभी से तो वो जरूर पहनेगी।

कोई जरूरत नहीं है फालतू पैसा खर्च करने की। हमारे पास अभी बहुत साड़ी पड़ी है। कुसुस ने रसोई से आवाज लगाई।

देख ले शंकर तेरी भाभी का चाय बनाते हुए भी सारा ध्यान हमारी ही बातों पर है।

क्यों ना हो आप दोनों साथ बैठते हो तो पैसा खर्च करने की ही बात करते हो। कुसुम ने फिर अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा। साथ ही दोनों को गिलास में चाय भी पकड़ा दी और अपनी चाय लेकर हरी के पास बैठ गई थी।

अरे भागवान मैं तो शंकर के लिए कुछ लाने की बात कर रहा था, इसने ही तुम्हारा नाम लिया है। हरी ने फिर कहा।

हां तो आप एक काम करना मेरे बेटे के लिए दो अच्छे से शर्ट और पेंट लेकर आना। पूरा दिन एक ही कपड़ा पहने घूमता है। अब इसकी दुल्हन लाना है तो इसे अच्छा लगना चाहिए ना।

वहीं तो पूछ रहा था भागवान। पर तुम्हारे बेटे को तो तुम्हारी चिंता है। हरी ने कहा।

आप तो मेरी बात मानों और इसके लिए अच्छे कपड़े लेकर आ जाना।

नहीं भैया हमें कुछ नहीं चाहिए आप भाभी के लिए साड़ी लेकर आ जाना।

अरे बहस मत करो मैं खुद देख लूंगा किसके लिए क्या लाना है।

शाम होती है और शंकर कुछ देर घूमने के लिए निकल जाता है। उससे पहले वह कुसुम से कहता है कि भाभी मैं अपने दोस्तों के पास जा रहा हूं वहीं से खेत जाउंगा और सारा काम निपटाकर ही घर आउंगा। कुसुम भी अपने रसोई में खाना बनाने की तैयारी करने लग जाती है, हरी घर के बाकि छोटे-मोटे काम निपटाता रहता है। करीब 8 बजे शंकर भी खेत से वापस आ जाता है और फिर तीनों साथ ही खाना खाते हैं और फिर कुछ देर बातें करने के बाद सोने के लिए चले जाते हैं।

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