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वजूद - 23

भाग 23

तकरीबन 1 महीने में वो पूरी तरह से ठीक हो सकता था ऐसा डॉक्टर का कहना था। इंस्पेक्टर ने उसे हॉस्पिटल में ही रहने दिया ताकि उसका पूरा और अच्छी तरह से इलाज हो सके।

एक दिन रास्ते में प्रधान गोविंद राम और इंस्पेक्टर अविनाश रास्ते मिले।

इंस्पेक्टर साहब नमस्ते। गोविंदराम ने कहा।

नमस्कार प्रधान जी। कैसे हैं ?

बस हम तो ठीक है। आप बताइए शंकर का कुछ पता चला ?

जी, हां मिल गया है करीब एक महीना हो गया है। गांव के बाहर जो मंदिर है वहीं था। बहुत बीमार था। फिलहाल हॉस्पिटल में उसका इलाज चल रहा है। आप सभी गांव वालों को याद करता है अगर आपके पास समय हो तो एक बार उससे मिल लीजिएगा। उसे भी अच्छा लगेगा। वैसे भी उसके भैया और भाभी के जाने के बाद आप ही लोग तो है उसके।

जी बिल्कुल। हम कल ही उससे मिलने के लिए जाएंगे। प्रधान गोविंदराम ने इंस्पेक्टर से कहा। इसके बाद दोनों अपने-अपने रास्तों पर चल दिए। प्रधान गोविंदराम को यह बात पता चलने के बाद यह खबर पूरे गांव में फैल गई थी कि शंकर मिल गया है और हॉस्पिटल में भर्ती है। अगले दिन प्रधान गोविंदराम, सुखराम काका, मेहर सिंह और गांव के 8 से 10 लोग शंकर से मिलने के लिए हॉस्पिटल पहुंच जाते हैं।

शंकर अपने बेड पर लेटा हुआ था। सबसे पहले प्रधान गोविंदराम, सुखराम काका और मेहर सिंह उसके कमरे में पहुंचे।

कैसे हो शंकर बेटा ? गोविंदराम ने पूछा।

शंकर ने सभी को देखकर बैठने का प्रयास किया, तो प्रधान और सुखराम काका ने उसे लेटे रहने का इशारा किया। वे दोनों वहीं बैठ गए और मेहर सिंह वहीं खड़ा रहा।

पहले से काफी ठीक हूं काका। शंकर ने प्रधान की बात का जवाद देते हुए कहा।

वैसे तू अचानक ही गायब हो गया। हम सारे गांवों ने तुझे कितना तलाश किया पर तेरा कुछ पता ही नहीं चला। कहां चला गया था ? प्रधान फिर कहा।

शंकर ने कहा मैं तो वहीं था काका। बस थोड़ी तबीयत....।

बेटा एक बार हमसे तो कहता हम तेरा इलाज करा देते। इस बार सुखराम काका ने शंकर से कहा।

बस काका कह ही तो नहीं पाया। शंकर ने जवाब दिया।

वो तो भला हो इंस्पेक्टर साहब का जिन्होंने तुझे तलाश कर लिया और तुझे यहां ले आए। वरना पता नहीं तू कहां होता, किस हाल में होता ? इस बार फिर प्रधान गोविंदराम ने कहा।

कल मिले थे तो उन्होंने ही प्रधान जी को तेरे बारे में बताया था। हमारे साथ गांव 8-10 लोग और आए हैं तुझसे मिलने के लिए। इस बार मेहर सिंह ने शंकर से अपनी बात कही।

अब तू जल्दी से ठीक हो जा और वापस गांव आ जाए। हम सब गांव वाले तेरा बहुत ध्यान रखेंगे। वैसे भी तू कोई पराया तो है नहीं। इसी गांव में पला बढ़ा है। हालांकि थोड़ा वक्त बुरा था पर अब सब ठीक हो जाएगा। प्रधान गोविंदराम ने शंकर से कहा।

शंकर ने सिर्फ जी कहकर अपनी बात खत्म कर दी।

अच्छा अब तू आराम कर अब हम तुझसे मिलने आते रहेंगे। किसी चीज की जरूरत हो तो बेहिचक बोल देना। प्रधान ने कहा।

फिर वे तीनों बाहर चले गए और एक-एक कर गांव के सभी लोग शंकर से मिलते और फिर बाहर चले जाते।

जब सभी लोग मिल चुके थे तो शंकर ने कुछ देर घूमने का सोचा और बाहर निकलने लगा। तभी उसे गांव के कुछ लोगों की बातें सुनाई पड़ी। इंस्पेक्टर साहब के पैसों पर यहां पड़ा है। रोज अच्छा खाने को मिल रहा है और काम भी नहीं करना पड़ रहा है। डॉक्टर का क्या है उसका भी तो पैसा बन रहा है। इतना हट्टा कट्टा है कुछ काम ही कर ले। गांव वालों के पास नहीं आया। हम तो हमेशा ही इसको काम दिया करते थे और पैसा भी देते थे। एक गांव वाले ने कहा।

अरे भाई बिना काम के इतना आराम और इतना अच्छा खाने को मिले तो फिर कौन काम करेगा। दूसरे ने पहले व्यक्ति की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा।

इंस्पेक्टर के भरोसे यहां पड़ा है, अपना गांव है फिर भी। हमारे पास आता तो हम मना कर देते क्या ? काम भी देते और पैसा भी। उन पैसो से अपना एक घर बना लेता। फिर तीसरे कहा। बिना काम के आराम मिल तो रहा है फिर कोई क्यों काम करेगा ? इस बार चौथे ने अपनी बात रखी। हालांकि गांव वालों को यह नहीं पता था कि शंकर उनकी बात सुन रहा है। गांव वालों की बातें सुनने के बाद शंकर दुखी हो गया था और फिर से अपने बेड पर जाकर बैठ गया। इधर गांव वाले भी वापस अपने गांव की ओर चल दिए। वहीं शंकर के कानों में अब गांव वालों की बातें गूंज रही थी। बिना काम के आराम। इंस्पेक्टर के रहमो करम पर पड़ा है और वो सभी बातें जो उसके कमरे के बाहर गांव के लोग कर रहे थे।

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