आढा़ वक्त -राज बोहरे Ram Bharose Mishra द्वारा पुस्तक समीक्षाएं में हिंदी पीडीएफ

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आढा़ वक्त -राज बोहरे

आड़ा वक़्त : अथ किसान कथा
उपन्यास राजनारायण बोहरे

भारत एक कृषि प्रधान देश है। प्रेमचंद से लेकर आज तक किसानों की दयनीय हालत पर बहुत कुछ लिखा गया है, लेकिन मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की । छोटी जोत, असंगठित किसान, राजनीति का दोमुंहापन किसानों की तरक्की नहीं होने देता । खेतिहर किसान धीरे-धीरे मजदूर होता चला गया जो कि आज भूखों मरने की कगार पर है । किसान का शोषण साहूकार, सरकार और विदेशी कंपनियों तक सभी ने किया है । सरकारी प्रचार-प्रसार से किसान विदेशी कंपनियों के कुचक्र में फंस गया है। अंधाधुंध रासायनिक खाद का प्रयोग, विदेशी बीजों पर निर्भरता व बैंक के ब्याज के चक्रव्यूह में फंसा किसान आत्महत्या तक करने पर मजबूर होता है। यह खबर दूरदर्शन के चैनलों पर प्रमुखता से नहीं आती है, उन्हें तो राजनीतिज्ञों की चापलूसी , क्रिकेट , फिल्मी हस्तियों से फुर्सत नहीं मिलती है । कभी अकाल, सूखा ,कभी बाढ़ की आपदाओं का प्रहार झेलते रहना किसान की नियति बन गया है। उसके पास इन आपदाओं से बचने का कोई उपाय नहीं है। कृषि प्रधान देश के कृषि विशेषज्ञ श्री घाघ व भड्डरी की कहावतें में कहा गया है- उत्तम खेती मध्यम बान
अधम चाकरी भीख निदान
यानी खेती करना सर्वोत्तम काम माना गया था, दूसरे क्रम पर व्यापार करना और तीसरे क्रम पर नौकरी चाकरी करना निकृष्ट का माना जाता था और भीख को तो सबसे नीचे आना गया है।
राजनारायण बोहरे के नए उपन्यास "आड़ा वक्त" में किसानों और किसानों की जिंदगी पर बड़े विस्तार से प्रसंग सृजित हुए हैं । पूर्वजों की बातों को गांठ बांध कर रखने वाले दादा जुगल किशोर इस उपन्यास आड़ा वक़्त के केंद्रीय पात्र हैं, लेखक ने उनकी कर्मठता और सनकीपन के आरोह-अवरोह में जो ताना-बाना बुना है, वह बहुत सारे सवाल हमारे सामने छोड़ जाता है।
आड़ा वक़्त उपन्यास व्यक्ति के आपातकालीन समस्या के समाधान के एक पक्षीय अजीत जज्बा और जुनून की मिसाल है। हर आदमी अपने मन में एक काल्पनिक संसार की रचना करता है और उसे वहीं सर्वश्रेष्ठ लगता है । यह बात और है कि उसका समर्थन दूसरा कोई नहीं करता है । स्वरूप के जीवन का महत्वपूर्ण लक्ष्य नौकरी लगने वाली है, नौकरी ज्वाइन करने के लिए घर से सैकड़ों मील दूर छत्तीसगढ़ में अपने अग्रज दादा के साथ आया है,जहाँ रेस्ट हाउस में विश्राम करता है , सुबह जगने पर दादा को ना पाकर वह चिंतित होता है। उपन्यास के समापन में दादा अस्पताल में मूर्छित पड़े हैं लगभग चेतना शून्य हैं , पास खड़ी बहन सुभद्रा के एकल अभिनय के संवादों और तर्कों से दादा में जागृति का बोध होता दिखता है, खेतों की चिंता से अस्वस्थ होते जाने की यात्रा में यह कथा बड़ी रोचक हो गई है।
उपन्यास की कथा यात्रा में इस किसान परिवार पर बहुत से संकट आते हैं, लेकिन इन संकटों से जूझते हुए कभी भी खेत बेचने की बात कथा नायक जुगल किशोर स्वीकार नहीं करता है । जुगल किशोर उर्फ दादा अपने बचपन में बार-बार पड़ते रहे अकाल व सूखे में भी अपनी जमीन को बेचने को मना कर दिया करते थे। एक साल दादा अकाल में भी मजदूरी करने जाना चाहते हैं, लेकिन उनके पिता डांटते हैं- सारे नाक कटा दे हमारी। चौंतीस बीघा धरती को मालिक जात से ठाकुर और दूसरे की तगारी डारेगो, मजदूरी करेगो। सारे गांव से आदमी जाएं तो जाएं ,जरूरी है कि हमारे घर से कोई मजदूरी करें। अरे तेरे ऊपर चार हाथ चोरों, पांच हाथ लम्बो तेरो बाप मौजूद है।(पृष्ठ )
कुछ दिनों के बाद पिताजी की मृत्यु हो जाती है तो सुभद्रा और छोटे भाई स्वरूप के पालन पोषण की जिम्मेदारी अब जुगल किशोर के हिस्से में आती है। खेती सँभालते हुए वे खेत की देखभाल करते हैं फिर दादा कुँआ खुदाते हैं। कुआं गुनने से लेकर, खुदाई , बंधवाई और आखरी में कुँआ का उद्घाटन (यानी डोरा करने तक) की डीटेल्स लेखक ने विस्तार से दी है। सुभद्रा के विवाह के समय पैसे की कमी आने पर सरपंच के सुझाव के बावजूद उसने खेतों को बेचने से मना कर दिया कहा - खेती की जमीन तो आड़ा वक़्त के लिए है। उधार लेकर दादा ने सुभद्रा का विवाह किया , इसे धीरे-धीरे चुकाया पृष्ठ चालीस पर पहली बार इस उपन्यास में आड़ा वक्त शब्द का प्रयोग किया है।
दादा सोलह वर्ष के थे , तब पिताजी की मृत्यु हो गई थी, उस समय दादा वीं में पढ़ते थे, सुभद्रा पाँचवे में पढ़ती थी और स्वरूप का तो किसी स्कूल में एडमिशन भी नहीं हुआ था।
एक किसान का बेटा एहलकार बन जाए इस उद्देश्य से दादा ने सरूप का पॉलिटेक्निक में एडमिशन कराया। पॉलिटेक्निक का कोर्स करने के उपरांत स्वरूप सरकारी महकमे में नियुक्ति के आवेदन देता है तो उसका सब इंजीनियर पद के लिए नियुक्ति आदेश छत्तीसगढ़ कर आदिवासी इलाके जसपुर क्षेत्र के लिए आता है । तमाम प्रयत्नो के बाद जब स्थान नहीं बदलता तो दादा खुद उसे ज्वाइन कराने जाते हैं । स्वरूप लंबे समय तक (सोलह साल तक) छत्तीसगढ़ में रहकर हर तरह के निर्माण कार्य कराता है , उसे बड़े अच्छे अनुभव होते हैं । लेकिन छत्तीसगढ़ की आदिवासी इलाके से मैदानी इलाके में ट्रांसफर पर जाने के बाद वह अनेक तरह की दिक्कतों में फंस जाता है । नई जगह के लोग उसकी ईमानदारी को पचा नहीं पाते, भ्रष्ट तंत्र और भ्रष्ट ब्यूरोक्रेसी एक ईमानदार और समर्पित कर्मचारी को इस तरह ईमानदार रहने नहीं देती है और साजिश के फलस्वरूप वह
गहरे आर्थिक संकट से जूझने लगता है । ऐसे में उसकी पत्नी कुछ कह नहीं पाती , बस पड़ोसियों को यह पता लगता है कि उनके घर में सब्जी रोज नहीं ली जाती, ज्यादा दूध भी नहीं आता । उसके घर में विलासिता का सामान नहीं है, सोफा की कौन कहे, बच्चों को देखने को एक टेलीविजन भी नहीं है। स्वरूप द्वारा अपनी नौकरी के समय से ही कमा कमा कर दादा को दे देने का सिलसिला लेखक ने विस्तार से बताया है लेकिन दादा पैसा घर में नहीं रखते बल्कि कभी मकान कभी खेत कभी बच्चों की फीस में खर्च करते चले जाते हैं जरूरत पड़ने पर भी अपनी बहन सुभद्रा की मदद भी करते हैं। लगातार तनाव के चलते स्वरूप को हाई ब्लड प्रेशर होता है जिसके कारण उसकी किडनी फेल हो जाती है। दादा से कहा जाता है कि स्वरूप का इलाज कराओ।
दादा के पास स्वरूप की बीमारी के समय पैसा नहीं है, तो स्वरूप की पत्नी कौशल्या जमीन बेचने की बात उठाती है और दादा एक बार फिर गुस्सा हो जाते हैं- जमीन को आड़े वक्त के लिए होती है ।
कहानी के अंत में सुभद्रा को यह खबर मिलती है कि दादा अस्पताल में भर्ती हैं तो वह अपने गांव से बड़े सुबह बस पकड़कर अस्पताल पहुंचती है । सुभद्रा दादा को बेड पर बेहोश देखती है , भाभी अस्पताल में हैं और उनका बड़ा बेटा पप्पू भी वही है। सुभद्रा चौकती है जब भाभी और पप्पू से पता लगता है कि दादा को जमीन का गम है , हां सरकार द्वारा दादा की जमीन सहित पूरा गांव किसी इंडस्ट्रियल एस्टेट औद्योगिक क्षेत्र के लिए अधिग्रहण कर लिया गया है। जमीन चले जाने की खबर सुनके दादा को गहरी आत्मिक चोट लगती है । वह जमीन जो उन्होंने सुभद्रा के ब्याह में नहीं बेची , स्वरूप की ऊंची शिक्षा में नहीं बेची, स्वरूप के ब्याह में नहीं बेची वह जमीन एक झटके में सरकार ने छीन डाली। दादा जमीन कैसे बेच सकते थे । उन्हें वह ऊबड़-खाबड़ बंजर सी जमीन मिली थी। जिसके बीता बीता हिस्से पर स्वयं घूम कर उंन्होने ठीक किया , उस जमीन में भीतर बैठे हुए छेवले हटाए, ऊपर उगे हुए कटीले बबूल हटाए और बड़े जतन से कुआं खुदवाया। खेत में राजस्थान से आए बेलारूस के ट्रैक्टरों से पार बनवाई। जान बस्ते थे उनके उस जमीन में। कभी कोई हारी बीमारी नही हुई दादा को, वे ठहरे ग्रामीण व्यक्ति, उन्हें पता न था कि किडनी फेल्योर कौन सी बीमारी है । उन्हें यह भी जानकारी न थी कि किडनी फेल हो जाने से क्या होता है । सुभद्रा को यह भी पता लगा कि स्वरूप के बेटे टिंकू ने अपने हिस्से की जमीन इलाके के एम.एल.ए.को औने पौने दाम में चुपचाप बेच दी है । छोटे भाई के बेटे द्वारा जमीन बेच देना और औद्योगीकरण के लिए शासन द्वारा सारी जमीन अधिग्रहण कर देना ; यह ऐसे बड़े तूफान हैं, जिन्होंने दादा की जिंदगी और दादा के अवचेतन मन को हिला डाला है। पहले वे बुखार में रहते हैं फिर एक दिन मूर्छित होकर गिर जाते हैं , अंततः उन्हें भोपाल के गैस वाले अस्पताल में भर्ती कराया गया है। जहां उन्हें देखने सुभद्रा आई है । इसके पहले अपने पति को दिमागी बीमारी में इलाज कराने आई सुभद्रा, बाद में स्वरूप को किडनी के इलाज के दिनों में देखने आई थी और अब की बार आयी है दादा को देखने। अचानक स्वरूप का बेटा वहां आ जाता है तो सुभद्रा घबरा जाती है- पप्पू देखेगा तो झगड़ा होगा , भाभी देखेगी भी तो झगड़ा होगा ।
जमीन बेचने के लिए सुभद्रा टिंकू मो डांटती है तो वह कहता है - जिस जमीन को दादा आड़े वक़्त के लिए सीने से लगाए रहे, बचाए रखे रहे, अब उसी जमीन पर आडा वक़्त आ गया है अब क्या करेंगे! सुभद्रा को स्पष्टीकरण देता हुआ टिंकू कहता है कि मैंने तो समय देखकर इलाके के एम.एल.ए.को जमीन बेच दी है ।
सुभद्रा पूछती है कि तुम्हारा एमएलए क्या जमीन बचा लेगा? टिंकू का जवाब है या तो बचा ही लेगा और नहीं तो मुआवजा में इतने अनाप-शनाप दाम वसूलेगा कि उसकी सात पीढ़ी बैठकर खाएगीं। टिंकू किसानों की असंगठित जिंदगी, किसानों के नेतृत्व हीन आंदोलन, असफल हड़ताल का जिक्र करता है और वहां से चला जाता है । भतीजे दादा टिंकू चला जाता है तो पप्पू लौटकर आता है पप्पूना समझो की तरह अपनी बुआ को देख रहा है जो किसी नुक्कड़ नाटक या मिमिक्री कलाकार की तरह खेतों किसानों से जुड़े जुड़े हुए कानून सरकारी नीति और भू अभिलेख की बातों को एक एक कल शाम के कलाकार की तरह अड़गड़ वाणी में बोलते हुए उसे जागृत करती है कि इसी बीच दादा में जागृति का बोध होता है और दादा जग जाते हैं । जिसे देख कर बुआ भतीजे यानी पप्पू और सुभद्रा दादा को संभालने लगते हैं। उन्हें आशा है कि दादा एक बार उठ जाएं तो सब कुछ संभाल लेंगे ।
एक किसान यानी दादा के विस्तृत जीवन की मूल कथा में बहन सुभद्रा की उप कथा भी शामिल है। विवाह के बाद वह जिस गांव में ब्याही जाती है, उस गांव में बांध प्रस्तावित होने के कारण उसकी हँसती-खेलती खाती जिंदगी बर्बाद हो जाती है और विस्थापन का दंश सारा गांव भोगता है । विस्थापन की गहरी चोट के कारण जमी जमाई दुकान ,खेती , मकान उजड़ जाने की वजह से सुभद्रा का पति बालकिशन डिस्टर्ब हो जाता है। उसे अब मेहनत से कमाए गए धन की जगह जमीन में गड़े खजाने और दफीनों को पाने की चाहत जाग जाती है, वह दुनिया भर के सयानो तांत्रिकों, ओझाओं, गुनियों के साथ पुरानी बस्तियों , जंगलों और खंडहरों में भटकने की आदत पड़ गई है । इसी चक्कर में एक ओझा की मौत भी हो जाती है, लेकिन बालकिशन भटकना नहीं छोड़ता और एक दिन विक्षिप्त हो जाता है। इलाज कराने के बाद भी बालकिशन बच नहीँ पाता। दूसरी उपकथा जो मूल कथा की तरह विस्तृत है वह स्वरूप की है, जो उपन्यास के आरम्भ में नौकरी ज्वाइन करने के लिए छत्तीसगढ़ गया है । वहां अपनी ईमानदारी के कारण ठेकेदार का मैटीरियल खराब होने से काम बंद करा देता है । एक शाम स्वरूप टहलने नदी किनारे गया है तो देखता है कि वहां एक महिला नदी में से रेत निकाल के उसे कठौती में झकोरते हुए सोना निकाल रही है। बाद में पता लगता है वो बंशो है, जिसके पिता और पति नहीं है , भाई भी नहीं है, वह मजदूरी करके अपने भाई के बच्चों को पाल रही है। बंशो की संवेदना के तार स्वरूप से जुड़ते हैं तो वह स्वरूप के सारे काम संभालने लगती है । स्वरूप ठेकेदार को अपना दुश्मन बना लेता है और एक दिन जब कोई स्वरूप पर सांप फेंक देता है जिसके डसने से स्वरूप बेहोश हो जाता है तो बंशो अपनी जान दांव पर लगाकर खून चूसना शुरू कर स्वरूप को बचा लेती है।
स्वरूप की साइट पर काम बंद हो जाता है तो बंशो को मजदूरी न मिलने के कारण वह बाद में मिशनरी में चली जाती है और वहां पढ़ते लिखते हुए नर्सिंग का प्रशिक्षण लेती है। बाद में सरकारी नौकरी पा जाती है। लम्बे अरसे बाद वह भोपाल में बीमार स्वरूप से मिलती है तब भी उसकी निष्ठा स्वरूप से ज्यों की त्यों रहती है जिसे देख कौशल्या उसके पाँव छू लेती है।स्वरूप, दादा और सुभद्रा के त्रिभुजों यानी तीन पात्रों के अंतर्द्वंद उजागर करता लेखक का मंतव्य है जिसमें वह सफल है।

पात्रों की दृष्टि से देखें तो इस उपन्यास में प्रमुख पात्र तीन ही हैं, दादा जुगल किशोर, स्वरूप यानी रामस्वरूप और बहन सुभद्रा। धारू यानी चौकीदार, दादा का बेटा पप्पू, बंशो, स्वरूप की पत्नी कौशल्या,अम्मा सहायक पात्र के रूप में आए हैं। कम महत्वपूर्ण पात्रों में टाइमकीपर तपेले, बनर्जी साहब के अलावा शिव शर्मा है, (जिन्होंने स्वरूप के सताए जाने की घटना को कहानी के रूप में दिखाया था ।) दादा इस उपन्यास के महत्वपूर्ण पात्र हैं । वे केवल भारतीय किसान के ही प्रतिनिधि नहीं है , बल्कि भारतीय समाज के आम परिवार के मुखिया वाले उस वर्ग के प्रतिनिधि हैं, जो बहुत गंभीर है , जिम्मेदार है, ईमानदार है । वह खेती के सारे गुर जानता है , विदेशी बीजो और दवाओं का प्रयोग नहीं करता, खेत मे यूकेलिप्टस नहीं लगाता। ऐसा व्यक्ति जो पूरे तीन सौ पैंसठ दिन खेत पर जाता है , जबकि आम भारतीय किसान फसल बोने और काट लेने के अलावा कभी भी खेतों पर नहीं जाता है। दादा को पढ़ाई का महत्व पता है, तो उन्हें रिश्तेदारी और नातेदारी निभाने का भी ज्ञान है , बच्चों को पालने का हुनर भी जानते हैं , लेकिन कोई भी मनुष्य देवता होजाता, अगर उसमें कोई गलती ना होती, गलत आदत ना होती। दादा में जो सबसे बड़ा गुण था कि वे अपनी जमीन को पुरखों की तरह चाहते है, उसकी पूजा करते है , किसी भी हालत में जमीन को बेचना नहीं चाहते और जमीन को अपनी मां समझते थे, वे जमीन को बेचने के लिए कभी तैयार न थे, दादा का यह गुण एक बड़ी बुराई बन जाती है, ऐसी बुराई जिसके कारण उन्हें अपना छोटा भाई को खो देना पड़ता है, लेकिन दादा को अपनी गलती का पता ही नहीं , वे तो कभी जमीन हाथ से जाने की कल्पना नही कर पाते हैं। दूसरा पात्र स्वरूप भी दादा का लक्ष्मण सरीका भाई है, जो अपनी नौकरी पूरी ईमानदारी से करता है, न रिश्वत मांगता है और ना किसी का काम रिश्वत के लिए रोकता है। एक मानवीय ऐब उसमें भी है कि अगर कोई नजराने के तौर पर रिश्वत देता है तो वह उसे सहज रूप से स्वीकार कर लेता है । इस उपन्यास की महिला चरित्र बंशो एक बहुत महत्वपूर्ण पात्र है, जो सशक्त, संवेदनशील, मार्मिक और दिल को छू लेने वाला पात्र है जो अपने इलाके में सब इंजीनियर के रूप में ज्वाइन करते समय स्वरूप से अनायास मिलती है , केवल कुछ दिनों उसके संपर्क में रहती है फिर भी विप्पति में मदद करने के कारण उसकी निष्ठा स्वरूप से जुड़ जाती है। निश्चल बंशो न प्रेम जानती , न मोहब्बत, न इश्क । वह केवल मित्रता के तौर पर स्वरूप की मदद करती है , उन दोनों के बीच कभी गलत संबंध विकसित नहीं होते, लेकिन बंशो अपनी जान की बाजी लगाकर स्वरूप का जहर चूस लेती है और उसे मृत्यु के मुंह से बाहर खींच लाती है। चौथे अध्याय से गायब हुई बंशो आखिर में किडनी का डायलिसिस करा कर लौट रहे स्वरूप और उसकी पत्नी को रेलवे स्टेशन भोपाल पर मिलती है, जहां से वह छत्तीसगढ़ जा रही है, अपने गांव छुट्टी मनाने । लेकिन स्वरूप को देखते ही वह पहचान जाती है और पास आकर प्रणाम करती है। स्वरूप की बीमारी का पता लगते ही वह छुट्टी कैंसिल कराने को तैयार होती है और अपने अस्पताल ले चलने की बात करती है। जब पता लगता है कि इसका मुकम्मल इलाज मद्रास में हैं , जहां किडनी देना पड़ेगा, तो वो अपनी किडनी देने को तैयार हो जाती है। बंशो जैसा चरित्र हिंदी साहित्य में अद्वितीय है, ऐसे चरित्र सदा याद किए जाते हैं। निश्छल मन की एक कर्मठ और समर्पित मित्र जैसी अव्यक्त रिश्तों वाली इस स्त्री चरित्र के सामने इस उपन्यास के सारे स्थित फीके पड़ जाते हैं। देखा जाए तो स्वरूप भी इसके सामने बहुत कमजोर साबित होता है , जो मिशनरी जाती हुई बशो को न तो रोकता है, न उसकी कोई मदद करता है, न बाद में उसकी कोई खोज खबर लेता है । ऐसे चरित्र अलग से ध्यान दिए जाने योग्य हैं सुभद्रा एक सामान्य पढ़ी-लिखी महिला है और वह अपने भाइयों से अगाध प्रेन करती है, जब ससुराल जाती है ति पूरी निष्ठा से ससुराल का काम संभालती है। अन्त में वही दादा को जगाने का काम करती है।

इस उपन्यास में देश , काल और वातावरण का बड़ा ध्यान रखा गया है। उपन्यास का वृतांत जिस क्षेत्र में चलता है, वहां की सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों का लेखक ने बड़ा गहरा अध्ययन करके सृजन किया है । उपन्यास की शुरुआत छत्तीसगढ़ के जशपुर इलाके से होती है, जशपुर में ग्राम लवाकेरा के पास ईब नदी बहती है, जिसमें सोने के कण रेत के साथ बहते हैं, यह तथ्य बड़े अनुसंधान के बाद सत्य पाया गया है। उपन्यास में रेत से सोना निकालते मजदूरों का दृश्य लेखक ने बड़े विश्वसनीय तरीके से प्रस्तुत किया है। इस ऊपन्यास की कथा सन 1961 से आरंभ हुई है औऱ सन 2021 तक चलती है। इस तरह उपन्यास की कथा का काल लगभग 60 वर्ष तक फैला हुआ है, जिसमें की सन 71 का युद्ध काल भी आता है और 2010 का भोपाल का किसान आंदोलन भी, जिनके क्षेत्र और समय व वातावरण को चित्रित करने में लेखक बड़े दक्ष साबित होते हैं। अनेक शब्द और प्रसंग ऐसे हैं , उपन्यास में कई दृश्य है जिनमें वातावरण साकार हो कर सामने आ जाता है ।
जंगल से आरंभ हो कर आड़ा वक़्त उपशीर्षक पर समाप्त हुई इस कथा में की शुरुआत उस दिन से होती है जब स्वरूप पहली बार रेस्ट हाउस में सोया है। स्वरूप की नींद खुली तो उसने घड़ी में देखा सुबह के आठ बज गए थे। स्वरूप और उनके बड़े भाई यानी दादा जुगल किशोर आदिवासी इलाके के जिस गेस्ट हाउस में रात को सोए थे वहां का चौकीदार भी नही मिलता है तो स्वरूप चिंतित है कि दादा कहां गए होंगे ? अनजान इलाका है ,अनजान भाषा है , यह खतरनाक नक्सलियों का इलाका है । जबकि दादा वहां के वातावरण को पूरा इंजॉय करते हैं- देखो यहां कितनी शांति है स्वरूप।
भोले दादा को नदी किनारे बैठा पाकर क्या कहते स्वरूप!
तकनीकी रूप से लेखक बहुत सजग है, तथ्यों औऱ इतिहास के नजरिये से वे कहीं चूके नही है। अगर अन्य स्रोतों से इनका मिलान किया जाय तो सहज रूप से हो जाता है। इसके कुछ नमूने इस प्रकार हैं- कथा के काल यानी सन 1972 में इलाके के मज़दूरों को नदी से स्वर्ण कण निकालने की मजदूरी साढ़े चार रुपए मिल पाती है , जबकि उन्हें अगर सरकारी स्थान पर मजदूरी मिले तो साढ़े सात रुपये मिलती थी।
दादा और स्वरूप घंटे का रेल का सफर करके और छह घंटे की यात्रा करके यह लोग अपनी मंजिल पर पहुंचे हैं । मध्य प्रदेश का आखिरी गांव था जहां से पांच किलोमीटर दूर से उड़ीसा तेरह किलोमीटर दूर थी और दो सौ किलोमीटर है रांची। इलाके में रहने वाले आदिवासी मजदूरी नहीं पाते हैं तो ही सोना निकालते है और इस काम को सरकार गैरकानूनी करार देती है, भले ही सरकार खुद यह सोना निकालने के लिए एक संस्थान की स्थापना कर चुकी है और अंत में इस काम को छोड़ दिया गया है।
इस उपन्यास के संवाद महत्वपूर्ण हैं। मजेदार बात यह है कि दादा न अंग्रेजी जानते हैं , न छत्तीसगढ़ी, लेकिन संवाद हीनता की स्थिति नहीं है , वे चौकीदार धारु और मजदूरों से सहजता से मेलजोल कर लेते हैं ।
इस उपन्यास के कथानक की तकनीक बड़े विचार विमर्श के बाद बुनी गई है। मध्यप्रदेश की आखिरी सीमा पर बसे हुए गांव लवा केरा के रेस्ट हाउस से प्रारंभ इस कथानक का समापन राजधानी भोपाल के गैस पीड़ितों के अस्पताल में होता है। उपन्यास में आये अध्यायो के नजरिये से कहा जाए तो जंगल से प्रारंभ और आड़ा वक्त में समापन होता है। आरंभ जागरण से होता है जब स्वरूप की नींद खुली और पास में दादा को ना पाकर चिंता शुरू हो गई है जबकि समापन में बेहोश पड़े दादा में जागृति का लक्षण दिखाई देता है । लगता है कि चिंता आगे जाकर एक सुखद आश्वासन में बदल जाती है । सुभद्रा और दादा का बड़ा बेटा पप्पू चौक उठे- बेहोश पड़े दादा में एक जागृति का बोध दिखाई दे रहा था, अब चिंता नहीं सब संभाल लेंगे। दादा सुभद्रा के चेहरे पर आंसू छलक उठे थे। यह प्रभाव है सुभद्रा के दिल से निकले दिल पर चोट करते संवाद का ।
इस उपन्यास में भाषा की दृष्टि से बड़े अद्भुत प्रयोग हुए हैं। कहानी मालवा और बुंदेलखंड के इलाके की है । विभिन्न बोलियों के बहुत सारे शब्द इसमें सहज रूप से आए हैं ,जैसे बंद कमरे में लैट्रिन में निपटना, देवतन में बालाजी आदमी ने लालाजी, पाली में आपका अफसर, हल्का बारहों महीने तीसों दिन , उल्टावनी ,उसी की जमीन में क्या हरा रंग लगा है ,पत्थर की लकीर ,कसाई कैसे बोल, जानवर की तरह जोते जाने वाले दादा, खामखा परेशान होना पड़ा ,खेत पूरमपार पार हो गए थे, देहरी खून रहे थे, अच्छी बुरी बहू आ जाए, मोटा पहनना मोटा खाना , मार्फत, मस्जिद , गाहे-बगाहे , गांव का आदमी पूछता सड़कें बनाने का काम सीख रहे हैं राजमिस्त्री बन रहे हैं क्या ? सिर्री तो नहीं हो गए तुम, दादा जवाब देते थे , क्यों अपना मगज खराब करें , 1971 का ब्लैकआउट , नक्सलवाद बंगाल में 1967 से चल रहा है , लोहे के बक्से में कपड़े ,कनस्तर में भरे शकरपारे -नमकीन -मठरी की पोटली रखी थी ,अथाने से पूरी का खाना बड़ा स्वादिष्ट लग रहा है,
दूध में आटा माड़कर बीस पराठे बनवा दिए थे , मंसूबा बन कर आए थे दादा, इल्लत कैसे संभाल लेगा, कीक मार कर रो पढ़ना चाहते थे , जिया उछलकर बार-बार हलक में आ रहा था, थप्पड़ से चले गए, इमदाद, बीता भर छांव ,करकेंटा दाज्जु पानी बरसेगा? कि नहीं! पई पाहुने , डूंगर को मुंह मारने को डूबा डठुआ हो गए होंगे, टूटे बिरझ की तरह खटिया पर गिर पड़े थे, कारू का खजाना, किसान तो फसल का मीर है ,बस कैसे ही पिताजी बक्कर दें ,अरे तेरे ऊपर चार हाथ छोड़ो पाँच हाथ लंबो तेरा बाप मौजूद है, अभी तनिक सी बात से उचक रहे हो, तेल ना ताई लगुन दे लिखाई, किसान कितना भी छोटा क्यों ना हो मजदूर से बड़ा होता है, लू बदस्तूर जारी थी , चोरों की तरह का काम लेते हैं, चूँ चपड़ ना करना, रेजा महिला मजदूर को भेजना, राग दरबारी उंपन्यास में ऐसे ही प्रसङ्ग में कहते हैं फला की बहू है तो नहीं किसको भेजोगे? गौरी भक कबूतरी सी है, खन्ना दादा एक एक बित्ता जमीन की पड़ताल करते थे, खनबरिया के मुखिया मुल्लू ने अपने साथियों से कहा ध्यान से सुनो आसपास पानी खलबला रहा है , कुआं में दो-दो गंगा जी साक्षात होगई, ढेंकुली से पानी निकालना, फसल अल्लईपल्ले होना, फर्द बनाना, पचबन्नी मिठाई, सुभद्रा के विवाह में खेत बेचने की बात करने पर कहना जमीन आड़े वक्त के लिए होती है, सरपंच पूछता है खेत बेचोगे मैं ट्रैक्टर के लिए कर्ज उठा रहा हूं मेरे पास केवल 65 बीघा जमीन है तुम्हारी 34 बीघा मिल जाएगी तो एक सौ बीघा जमीन पर लोन मिल जाएगा , मुखा मुखी परीक्षा यानी मौखिक परीक्षा , एक महीना साथ रहने की सोच कर गए थे बहुत जल्दी वापस भेज दिया, चलती गाड़ी में पराठा और अचार खाना बहुत स्वादिष्ट लगता है, पजामे का नाडा निकालकर उसे भोजन का कनस्तर बांध दिया, कुल्हड़ की चाय में सर ना सवाद , कैसा आड़ा वक्त आ गया है धर्मपुर के किसानों पर ,खूब निस्तार वाले मकान आदि जिनमें कहावत,मुहाविरे और आंचलिक शब्द भी आते हैं।

लेखक की यह खूबी है कि उन्होंने समस्या पूरी बताई हैँ पर उंन्होने उपन्यास में किसी समस्या का कोई समाधान थोप के नहीं दिया है ।
इस ऊपन्यास के सभी चरित्र अपने अपने चक्रव्यूह में घिरे हुए हैं ,कोई किसी की बात मानने को तैयार नहीं है।
आड़ा वक़्त यानी कि आपातकाल, गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं धीरज धर्म मित्र अरु नारी, आपद काल परखिए चारी!
लेकिन यहां अपने आड़ा वक़्त को सही मानते हुए कोई किसी की सलाह मानने को तैयार नहीं है। उपन्यास में 9 अध्याय हैं पहला जंगल है, दूसरा बैल, तीसरा विस्थापन, चौथा पत्र, पांचवा जिम्मेदारी, छठवां आदत, सातवा किसान आंदोलन, आठवां किडनी और नवा आड़ा वक्त।
उंपन्यास में लेखक ने अनेक शैलियों का उपयोग किया है। पत्र शैली से लेकर अखबार की समाचारों की कटिंग को उद्धृत करते हुए लेखक ने शैलीगत व शिल्पगत शानदार प्रयोग किए हैं।

जहां स्वरूप नौकरी जॉइन करता है उसका शीर्षक जंगल है दादा बैल की तरह जुते रहकर गृहस्थी की गाड़ी और जमीन संभालते हैं तो दूसरा अध्याय बैल है, सुभद्रा का गांव विस्थापन के दायरे में आता है तीसरा विस्थापन है, बंशो की कहानी स्वरूप एक पत्र में लिखकर मित्रों को भेजता है इस अध्याय का शीर्षक पत्र है ,अपनी नौकरी को पूरी जिम्मेदारी से करने वाले स्वरूप की कथा है जिम्मेदारी , मैदानी क्षेत्र में आकर ब्यूरोक्रेशी की भ्रष्ट फौज का शिकार हो चुका स्वरूप हर महीने तनख्वाह कटा रहा है और बार-बार छत्तीसगढ़ वापस जाने की तैयारी कर रहा है उस अध्याय का नाम है आदत, ईमानदारी की आदत में रहने वाले स्वरूप को आदिवासी पसंद है और आदिवासी यानी ईमानदार मेहनती भले लोग। इस तरह लेखक ने समाज के अदिवासी समाज भोला,ईमानदार व नियम पालक साबित किया है,इसका अर्थ यह भी है कि जो सभ्यता विकसित होती गई ,चतुर सयानी होती गयी। किसान आंदोलन तो आंखों देखी घटना महसूस होती है जब सन 2010 में हजारों किसानों ने अपनी बैल गाड़ियों के साथ आकर भोपाल की चकाचक सड़कों और चार इमली, प्रोफेसर कॉलोनी जैसे पॉश और सरकारी नुमाइंदों के इलाके में खुलेआम सड़क पर अपने बसेरे डाल दिए थे । कंडो से उठता धुआं , बड़े-बड़े क्वार्टर्स के सामने लोटा लेकर निवृत्त होते किसान , दुहा जाता दूध और रंभाते गाय- बैल- भैंस और बछड़े भोपाल को एक बड़े गांव में तब्दील कर चुके थे। किडनी अध्याय स्वरूप की बीमारी की कहानी है, कोई व्यक्ति अधिक ईमानदारी से काम करता है और दूसरों से भी बैसे ही काम कराना चाहता है, लेकिन उसकी मर्जी के अनुकूल काम नहीं होता, तो वह अनजाने में अपना ब्लड प्रेशर बढ़ाने लगता है । धीरे धीरे इस तरह हाइपर होने का असर उसकी किडनी पर होता है और वह गंभीर बीमार हो जाता है । यह अध्याय ऐसे ईमानदार और संवेदनशील कर्मचारियों को खतरे की घंटी बजाता दिखता है । क्लाइमेक्स का अध्याय आड़ा वक़्त है जो उपन्यास अंश के रूप में कई पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुका है और लेखक द्वारा इसका ऑनलाइन पाठ भी किया गया है । संपूर्ण कहानी इस अध्याय में संक्षिप्त रूप में आती भी है और हर समस्या का समाधान भी इस कहानी में होता है। इसलिए कई घटनाएं इसमें दोहराई जाती है जो क्लाइमैक्स के अध्याय में संभव भी है। लेकिन खुशी की बात यह है कि मुख्य पात्र की मृत्यु या हार जाना न बताते हुए लेखक ने अंत में मुख्य पात्र को बेहोशी से बाहर आना बताया है जो उनकी सकारात्मक सोच का परिचायक है।

इस उपन्यास को अगर हम यथार्थवादी कसौटी पर कसें तो पाते हैं इसमें समाज की कई प्रचलित कथाएं मौजूद है। चाय पोहे का नाश्ता आम घरों में हैं जो इस उपन्यास में भी आया है । टाइम कीपर तपेले लोक निर्माण विभाग के हर दफ्तर में पाए जाएंगे , यानी ऐसे व्यक्ति जो रोजाना अपना टिफिन लेकर आते हैं और अपनी मोटरसाइकिल या साइकिल पर सड़क पर काम कर रहे मजदूरों का अवलोकन करते हैं , उनके टाइम को कीप करते हैं । पहले जसपुर रोड पर स्टेट हाईवे की तीस किलोमीटर लंबी सड़क पर काम कर रहे मजदूरों के टाइम की है उल्लेखनीय है कि सड़क के ओवरसियर को 35000 पेड़ भी चार्ज में मिले थे । लोक निर्माण विभाग की परमानेंट गैंग का मजदूर कारिंदा तो है सड़क विभाग का, लेकिन वन महकमे के वन रक्षक की तरह पेड़ों की रखवाली करता है यानी वे मजदूर भी दक्ष सैनिक की तरह उन पेड़ों की रखवाली करते हैं।

इस उपन्यास में कुनकुरी के चर्च का विस्तृत वर्णन किया गया है, जहां दादा जो धोती कुर्ता पहनते हैं दंडवत प्रणाम करते हैं और इस कारण फादर से कुछ पुस्तकें, फोटो और प्रसाद में चाय बिस्कुट प्राप्त करते हैं । हाट का वर्णन शानदार है इस उपन्यास में जहां वस्तु विनिमय की प्रणाली को बताया गया है। क्षेत्रीय जानकारी में लेखक का कोई जवाब नहीं है उन्होंने झाड़सुगुड़ा रेलवे स्टेशन, जसपुर की सड़क, ईब नदी का पाट, छत्तीसगढ़ की जलवायु का प्राकृतिक वातावरण ही नहीं वहां के लोगों की मनोवैज्ञानिकता , वहां काम कर रहे व्यक्तियों की मानसिकता तथा महानगरों और विकसित स्थानों पर काम करने पर लोगों की मानसिकता को बड़ा खुला खुला चित्रित किया है।
सन 1971-72 के छत्तीसगढ़ और सन 1984 का भोपाल व उसके आसपास का चित्रण लेखक ने यादगार ढंग से किया है।
पात्रों के अंतर्द्वंद्व इस उपन्यास में बड़ी गहराई से आए हैं , दादा यानी जुगल किशोर जिन जिन प्रतिकूल परिस्थितियों में हैं उनको उपन्यास में बड़ा स्थान दिया गया है । दूसरे अध्याय की कथा दादा के लवाकेरा से लौटने की ट्रेन यात्रा की कथा है, इसमें दादा फ्लैशबैक में अपने जीवन को याद करते हैं । उनका अंतर्द्वंद व मनोविश्लेषण लगातार चलता रहता है । हालांकि पहले अध्याय में स्वरूप का भी मनोविश्लेषण है । स्वरूप के पत्र में भी द्वंद्व है , वह नहीं समझ पाता कि रिश्वत ले या ना ले ।
सारांशतः पूरी चतुराई होश्यारी और दक्षता से एक किसान,नौकरी पेशा आदमी की तकलीफ सुख-दुःख प्रकट करते लेखक का यह उपन्यास एक यादगार उपन्यास के रूप में हिंदी साहित्य में याद किया जायेगा।

रामभरोसे मिश्र
राधा विहार दतिया