खुली खिड़की... Saroj Verma द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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खुली खिड़की...

मैं अभी पिछले हफ्ते ही इस फ्लैट में रहने आया हूँ,रोड के किनारे ही पहली मंजिल पर मुझे फ्लैट मिला है,चूँकि मैं अकेला हूँ इसलिए वन बी.एच.के. पर्याप्त था मेरे रहने के लिए,बड़ी मुश्किलों से तो मुझे ये फ्लैट मिला और तो सब ठीक है उसमें सभी सुविधाएंँ हैं,दिक्कत बस इतनी है कि ये फ्लैट रोड के किनारे है,रात भर वाहनों की आवाजाही लगी रहती है,शुरू में तो दो चार दिन मुझे बड़ी परेशानी हुई लेकिन फिर आदत सी हो गई,लेकिन एक बात तो अच्छी है उस फ्लैट में जब भी मुझे बोरियत महसूस होती है तो मैं खिड़की खोल लेता हूँ,क्योंकि मेरे पास टीवी नहीं है और मुझे उसकी जरूरत भी नहीं है,इसलिए कि दिनभर तो आँफिस में ही निकल जाता है ,आँफिस से थके आने पर भला टीवी देखने का मन किसका करता है और खिड़की के पास ही मैनें अपना स्टडी टेबल रखा है,कहा जाए तो वो स्टडी टेबल से लेकर डाइनिंग टेबल,प्रेस करने की टेबल ,उस पर ही मेरे ज्यादातर काम होते हैं,आज रविवार है और मेरे आँफिस से मेरी छुट्टी है इसलिए सुबह की चाय लेकर मैं टेबल पर आ बैठा और खिड़की खोल दी,
मेरे फ्लैट की खिड़की से सामने वाली रोड के उस पार वाला बस-स्टाँप दिखता है,जब मुझे अपना मनोरंजन करना होता है तो मैं वो खिड़की खोलकर उस बस-स्टाँप पर आने जाने वाले लोगों के क्रियाकलापों को देखकर लुफ्त उठाता रहता हूँ,मैंने अपनी चाय के अभी दो घूँट ही खतम किए थे कि वहाँ पर एक बुजुर्ग दम्पति आए,दोनों के हाथ में एक एक थैला था,शायद सुबह सुबह सब्जी लेने निकल पड़े होगें,दोनों के बाल सफेद थे,महिला ने साड़ी पहनी थी ,सफेद बालों का जूड़ा बना रखा था और वो जरा झुक झुककर चल रही थीं,ऐसा लग रहा था कि जैसे उनकी कमर या घुटनों में तकलीफ़ है और वें बुजुर्ग जो शायद उनके पति थे,उन्हें बार बार सहारा दे रहे थे,वें उन आण्टी को सहारा तो जरूर दे रहे थें लेकिन उनकी खुद की हालत भी कुछ बहुत अच्छी नहीं थी लेकिन वो आण्टी का ख्याल रख रहे थें,उन दोनों को देखकर लग रहा था कि उनके बीच अभी बहुत प्रेम है, दोनों की उम्र के बढ़ने के साथ साथ उनका प्रेम भी बढ़ा था,कम ना हुआ था......
तभी एक फूल वाली फूल बेंचने बस-स्टाँप पर रूकी,उस ने अंकल से फूल लेने की जिद की,अंकल ने उस फूलवाली से एक गुलाब का फूल खरीदकर वो गुलाब का फूल आण्टी की तरफ बढ़ा दिया,आण्टी ने बस-स्टाँप में आस-पास देखा,उन्होंने महसूस किया कि उन्हें ही सब देख रहे थे और आण्टी अंकल की इस प्यार भरी शरारत को देखकर शरमा गईं और शरमाते हुए उन्होंने वो गुलाब का फूल उनसे ले लिया,तब तक उनकी बस आ गई और वें उस बस में बैठकर चले गए,इसी के साथ मेरी चाय भी खतम हो चुकी थी, लेकिन मुझे उन दोनों का कभी ना खत्म होने वाला प्यार देखकर अच्छा लगा....
अब मैनें सोचा कि नहाने धोने का सोचते हैं,इसके बाद नाश्ता बनाऊँगा और फिर खाकर सोऊँगा क्योंकि आज मैं सिर्फ़ आराम करना चाहता था,कहीं घूमने जाने का मन भी नहीं था मेरा और वैसें भी नोएडा में मैं किसी को ज्यादा जानता नहीं था सिवाय आँफिस के लोगों को छोड़कर और उनसे भी मेरा व्यवहार सीमित था,इसलिए मैनें खिड़की बंद की और मैं बाथरूम की ओर बढ़ गया,नहाकर लौटा तो मैनें नाश्ता बनाया,चार ब्रेड और दो अण्डो का आँमलेट प्लेट में लेकर मैं फिर उस टेबल पर आ बैठा और मैनें फिर से खिड़की खोल ली,देखा तो बस स्टाँप पर एक लड़की खड़ी थी जो मुश्किल से सोलह-सत्रह साल की रही होगी,वो लड़की शायद बहुत देर से अकेली खड़ी थी और अभी तक उसकी बस नहीं आई थी,तभी दो लड़के आकर उसके अगल बगल खड़े हो गए और शायद उसे फालतू के कमेंट्स पास करने लगें,उन लोगों की बात सुनकर लड़की ने अपनी जगह बदल ली ,वो उन दोनों से थोड़ा दूर जाकर खड़ी हो गई,मुझे उन सबकी बातें सुनाई नहीं दे रहीं थीं लेकिन समझ जरूर आ रहीं थीं,लड़की अब दूर खड़ी थी लेकिन वें लड़के शायद बहुत ही आवारा किस्म के थे,वें फिर से उस लड़की के पास आकर खड़े हो गए,अब लड़की को बड़ी परेशानी होने लगी और उसने फिर से जगह बदल ली,वें लड़के फिर से उसके पास जाकर खड़े हो गए,तभी वहाँ लगभग पचास पचपन साल की एक आण्टी आईं और उन्होंने उन लड़को का तमाशा देखा जो उन्हें अच्छा ना लगा.....
वें लड़की के पास गईं और शायद उसकी परेशानी पूछी होगी क्योंकि इतनी दूर से मुझे कुछ सुनाई तो दे नहीं रहा था और उस लड़की ने अपनी परेशानी उनसे बताई तो आण्टी ने अपनी चप्पल उतारी और लड़कों के पास जाकर कहा होगा....
लड़की को क्यों तंग कर रहें थें?माँफी माँगो नहीं तो अभी भीड़ इकट्ठा कर लूँगी...
तब वो दोनों लड़के उस लड़की के पास गए और अपने कान पकड़कर माँफी माँगकर वहाँ से चले गए,वो लड़की उन आण्टी के गले लग गई और शायद उन्हें थैंक्यू कहा होगा,इस बीच मेरा नाश्ता भी खतम हो चुका था और पेट भरने के बाद मुझे तो बस बिस्तर दिखाई दे रहा था,मैनें खिड़की बंद की और बिस्तर पर लेटकर मंजूर एहतेशाम का सूखा बरगद पढ़ने लगा और पढ़ते पढ़ते मुझे कब नींद आ गई पता ही नहीं चला....
मैं सीधा शाम को जागा और हाथ मुँह धोकर शाम की चाय बनाकर मैं फिर से खिड़की खोलकर बैठ गया,रोड पर सबकुछ सामान्य रूप से चल रहा था,बस-स्टाँप पर बस आती ,वहाँ खड़े लोंग उसमें बैठते और बस सवारी लेकर चली जाती,सड़क पर कारें भी अपनी रफ्तार से दौड़ रहीं थीं,ये सब नजारें देखते देखते अब मेरी चाय भी खतम हो चुकी थी,तभी एकाएक उस सड़क से एक महिला लगभग अपने दस साल के बच्चे के संग स्कूटी पर गुजरी और उसे एक ट्रक वाले ने टक्कर मार दी,माँ और बच्चा दोनों घायल होकर सड़क पर पड़े थे,मैं दो मिनट तक देखता रहा कि कोई तो उनकी मदद के लिए आएगा लेकिन दो मिनट तक कोई भी उनकी मदद करने के लिए आगें नहीं बढ़ा,मैनें बिना देर किए अपना वोलेट और कार की चाबी उठाई और ऐसे ही टी शर्ट और लोवर में बाहर भागा,जल्दबाजी में फ्लैट लाँक करना भूल गया,नीचे पार्किंग से कार निकाली और वाँचमैन से कहा कि मैं जल्दी में हूँ,मेरा फ्लैट नंबर तीन सौ एक खुला है जरा देख लेना....
कार लेकर रोड पर आया तो वो माँ बेटा अब भी सड़क पर ऐसे ही पड़े थे,मैनें अपनी कार रोकी और एक रिक्शेवाले की मदद से दोनों को कार की पिछली सीट पर लिटाकर हाँस्पिटल की ओर चल पड़ा,इमरजेंसी वार्ड में जाकर मैनें दोनों का इलाज शुरू करवाया,भगवान का शुकर था कि दोनों माँ बेटे को ज्यादा चोट नहीं आई थी और कुछ देर में दोनों को होश भी आ गया,जब वें महिला होश में आईं तो मैनें उनके घर का फोन नंबर पूछा,तब उन्होंने अपने पति का नंबर बताया,मैनें हाँस्पिटल से उनके पति को फोन किया क्योंकि जल्दबाज़ी में मैं अपना फोन फ्लैट में ही भूल आया था,कुछ देर में उनके पति आएं और उन्होंने मेरा शुक्रिया अदा किया,वें महिला बोलीं.....
भइया!ईश्वर आपका भला करें,आपने आज हम दोनों माँ बेटे की मदद करके बहुत बड़ा एहसान किया है हम पर,आप हमेशा खुश रहें.....
तब मैनें उनसे कहा.....
दीदी!ये तो खुली खिड़की के कारण हुआ,जो आज मैं आप दोनों की मदद कर पाया और फिर वो परिवार अपने घर चला गया और मैं अपने फ्लैट में वापस आ गया और सोचने लगा कि डिनर में क्या बनाऊँ?फिर सोचा आज बाहर से ही खाना आँर्डर कर लेता हूँ,फिर मैनें खाना आँर्डर किया,कुछ देर में खाना आ पहुँचा और फिर मैं अपनी खुली खिड़की के पास बैठकर खाना खाने लगा.....

समाप्त....
सरोज वर्मा.....