पकडौवा - थोपी गयी दुल्हन - 5 Kishanlal Sharma द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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पकडौवा - थोपी गयी दुल्हन - 5

बस में चढ़कर युवती ने चारों तरफ देखा।और उसकी नजर अनुपम पर पड़ी थी ।वह अनुपम के पास चली आयी।उसके पास की सीट पर बैठते हुए उसने दीर्घ निश्वास ली और बोली,"जरा सी देर हो जाती तो यह बस निकल जाती"
अनुपम ने उस युवती की बात को अनसुना कर दिया।जब वह नही बोला तब वह फिर बोली,"मुझे जगाया क्यो नही?मुझे सोता हुआ छोड़कर अकेले क्यो चले आये?"वह युवती बोली,"मैं तुम्हारे दिल की बात को जानती हूँ।तुम मुझ से पीछा छुड़ाने की सोच रहे हो।तुम भूल कर रहे हो।मेरा नाम छाया है।छाया हमेशा शरीर के साथ रहती है।मेरा तुमसे बन्धन हो चुका है।अब छाया तुम्हारी है।जहाँ पर अनुपम रहेगा वही उसकी छाया रहेगी।सिर्फ मौत ही मुझे तुम से जुदा कर सकती है।इसलिए मुझे छोड़ने का विचार अपने दिल से निकाल दो।जब तक जिंदा हूँ,तुम्हारी हूँ और तुम्हारी ही रहूंगी"।
अनुपम छाया की बात का कोई जवाब दे पाता उससे पहले ही कंडक्टर उनके पास आकर बोला,"टिकट।"
"पटना के दो टिकट"अनुपम जवाब देता उससे पहले ही छाया बोली थी।
"दो सौ रुपये"कंडक्टर टिकट फाड़कर देते हुए बोला।छाया ने टिकट हाथ मे लेक्फ अनुपम की तरफ देखते हुए कहा,"पैसे दे दो"
अनुपम बस में कोई तमाशा नही करना चाहता था इसलिए उसने चुपचाप पैसे निकाल कर कंडक्टर को दे दिए थे।
अनुपम रात को बिल्कुल नही सोया था।इसलिए वह सीट पर बैठे बैठे ही सो गया।अनुपम को सोते देखकर छाया भी ऊँघने लगी थी।
और दो घण्टे बाद बस ने उन्हें पटना स्टेशन पर पहुंचा दिया था।अनुपम के साथ छाया छाया की तरह लगी थी।मानो उसे डर हो कि जरा अलग हुई तो वह हाथ से निकल जायेगा।टिकट खिड़की पर जाकर अनुपम ने दो फर्स्ट क्लास के टिकट खरीदे थे।टिकट लेकर वे वेटिंग रूम में आ गए।अनुपम ने नहा कर कपड़े बदले।छाया ने भी ऐसा ही किया था।
ट्रेन प्लेटफॉर्म पर लग चुकी थी।वे ट्रेन में आकर बैठ गए।"
"आज तुम्हारा व्रत है क्या?"छाया, अनुपम से बोली।
"नही,"अनुपम बोला,"क्यो?"
"दोपहर हो गयी लेकिन न तुमने चाय पी न कुछ खुद खाया न मुझे खिलाया इसलिए मैने सोचा शायद तुम्हारा व्रत है।"
"छाया बोली,"व्रत होता तो मुझे भी तुम्हारे साथ भूखा रहना पड़ता।"
"तुम्हे खिलाने पिलाने की जिम्मेदारी मेरी नही है।"
"कैसी बात कर रहे हो।पत्नी के भरण पोषण की जिम्मेदारी तो पति पर ही होती है।"
"मैं तुम्हारा कोई पति वतीनही हूँ।यह बात कितनी बार तुमसे कहानी पड़ेगी।"अनुपम गुस्से में बोला था।
"नाराज मत होओ।पत्नी न सही एक अबला नारी समझ कर ही कुछ खिला दो।बड़ी जोर की भूख लगी है।प्लीज खाने को कुछ ले आओ।"छाया ने हाथ जोड़ते हुए अनुनय की थी।
अनुपम उठकर चला गया।असल मे उसने भी कल से कुछ भी नही खाया था।कुछ देर बाद वह लौटा था।पूड़ी सब्जी,मिठाई,नमकीन,बिस्कुट,बिसलेरी और माजा लाया था।
अनुपम साथ ही मैगजीन और अखबार भी खरीद लाया था।खाना खाने के बाद अनुपम ने अखबार और मैगजीन उठाये और पढ़ने लगा।ट्रेन पटना स्टेशन से रवाना हो चुकी थी।रात होने पर वह ऊपर की सीट पर जाकर सो गया।छाया काफी देर तक खिड़की के पास बैठी बाहर का नजारा देखती रही और फिर वह भी सो गई थी।