चरित्रहीन - (भाग-12) सीमा बी. द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

चरित्रहीन - (भाग-12)

चरित्रहीन.....(भाग-12)

विद्या को मैं नहीं पहचान पायी थी, थोड़ा शरीर पहले से ज्यादा भर गया था, पहले से ज्यादा सुंदर भी हो गयी थी। उसनै मुझे पहचान लिया, अपने पुराने अँदाज में गले मिलते हुए बोली, "हाय वसुधा तू बिल्कुल नहीं बदली, वैसी की वैसी ही है, क्या है तेरी खूबसूरती का राज"! मैं मुस्करा कर रह गयी। मुझे तो ज्यादा काम था नहीं तो मैंने पूछा, "अगर बिजी नहीं हो तो चलो कॉफी पीते हैं"! वो झट से साथ हो ली और बोली, " नहीं यार कोई बिजी नहीं हूँ, चल बहुत दिनों बाद मिले हैं, कॉफी पीते हैं"! एक दूसरे के बारे में जानने से ज्यादा उत्सुकता हमारे कॉलेज के ग्रुप के बाकी दोस्त कहाँ और क्या क्या कर रहे हैं, जानने की थी। विद्या से बात करने पर पता चला कि उसकी शादी कॉलेज खत्म करने के एक साल बाद ही हो गयी थी.....शादी के 8 साल बाद तक बच्चे नहीं हुए तो उसके पति ने
उसे तलाक दे दिया, और उसने दूसरी शादी कर ली.... वो अपने मायके वापिस आ गयी और अब अपने पिताजी की मदद उनके डिपार्टमेंटल स्टोर को चलाने में कर रही है। बाकी भाई बहन की शादी हो गयी है और भाई भी अलग रहता है। सुन कर बहुत दुख हुआ....उसके हँसते चेहरे के पीछे गम छिपा था। मैंने पूछा कि आज यहाँ कैसे? तो पता चला की उसके पापा संडे को देख लेते हैं और वो थोड़ा घूम लेती है, उस दिन वो अपने लिए दुपट्टा लेने आयी थी......कॉफी खत्म कर हम ने एक दूसरे का नं लिया और जल्दी ही मिलने का वादा भी किया। उस दिन से हम एक दूसरे से हर दूसरे दिन फोन पर बात कर ही लिया करते थे.....विद्या भी उसी ग्रुप का हिस्सा थी जिसमें नीरज और कुछ दोस्त भी थे।कमाल की बात ये थे कि मैंने तो नीरज से रिश्ता तोड़ने के बाद अपना नं भी बदल लिया था, पर विद्या के पास सब दोस्तों की जानकारी थी.....उनके कांटेक्ट में थी। कौन क्या कर रहा है सब पता था उसको....। उससे मिल कर कॉलेज के पुराने दिन याद आ गए थे। मैंने उसे अगले संडे को अपने घर खाने पर बुलाया तो वो खुशी खुशी आ गयी। बहुत दिनों बाद मैं खुल कर हँसी थी, "यार वसुधा तुम और नीरज शादी करने वाले थे न तो फिर अचानक ऐसा क्या हुआ? मुझे तो बाद में रश्मि से पता चला था कि नीरज और तेरी शादी नहीम हो पायी थी, रश्मि को प्रीति ने बताया था, क्योंकि नीरज ने प्रीति से ही शादी की है"! मैं सुन कर हैरान हो गयी, "क्या नीरज ने प्रीति से शादी की है"? "हाँ यार, रश्मि तो उसके घर के पास ही तो रहती थी, वो तो शादी में भी गयी थी, कह रही थी कि नीरज के मम्मी पापा को प्रीति बहुत पसंद आयी थी, इसलिए झटपट शादी हो गयी थी, दोनो ही जॉब करते हैं शायद"! "अच्छा है ये तो बहुत.....उसके पैरेंटस को जैसी लड़की अपने बेटे के लिए चाहिए थी, वैसे उनको मिल गयी"! मैंने कहा तो वो बोली, "पर हुआ क्या था? प्रीति से ज्यादा अच्छी तुम हो और फिर फैमिली बैकग्राउँड भी तुम्हारा स्ट्राँग था"!
उसकी बातें सुन कर मुझे हंसी आ गयी। "हाँ यार सब ठीक था पर नीरज के पैरेंटस और दीदी जीजू को मैं पसंद नहीं आयी और न हमारा स्टेटस तो इसलिए मैंने भी नीरज का घर से भाग कर शादी करने के आइडिया को मना कर दिया। मेरे पैरेंटस को भी उसकी फैमिली हमारे स्टेटस से कम लगी पर फिर भी वो मेरी खुशी के लिए चुपचाप मान गए थे, तो फिर मैं कैसे बिना उन्हें बताए यूँ भाग कर शादी करती? और फिर बहुत अच्छा ही हुआ जो नीरज से शादी नहीं की.....क्योंकि फिर मुझे आकाश जैसा पति कैसे मिलता"? वो मेरी बात सुन कर सीरियस हो गयी,"तुमने बिल्कुल ठीक किया, भगवान जो करते हैं, वो अच्छा ही करते हैं"! उस दिन उसने सब दोस्तों के नं दिए , हम ने अगले संडे को सबसे मिलने का प्लान बना लिया। विद्या ने सब से बात करने की जिम्मेदारी ले ली। उसने नीरज और प्रीति को भी बुलाने का पूछा तो मैंने मना कर दिया......पर विद्या तो विद्या ही थी, उसकी बेस्ट फ्रैंड थी रश्मि उसे तो उसने मेरे बारे में सब बता दिया। कितने कमाल की बात थी कि हम तीनों चारों सहेलियों की शादी दिल्ली में ही हुई थी। जो लड़के दोस्त थे वो भी दिल्ली में ही थे....कोई अशोक विहार, कोई पितमपुरा कोई गाँधी नगर तो कोई कालका जी......सब की शादियाँ हो गयी थी और सबके बच्चे भी थे....कोई अलग रह रहा था तो कोई जाइँट फैमिली में। सब काफी एक्साइटेड थे एक दूसरे से मिलने के लिए। हम ने लंच पर मिलने का प्रोग्राम बनाया था और वहाँ मैं नीरज और प्रीति को आया देख कर हैरान थी, पता चला कि रश्मि ने उन्हें बुलाया था। रश्मि का कहना था कि अब जब ग्रुप मिल ही रहा है तो सब मिलेंगे तो अच्छा लगेगा। हम सब एक दूसरे से मिल रहे थे काफी सालों के बाद तो बहुत अच्छा लग रहा था। सब बता रहे थे अपने अपने बारे में। किस का बच्चा कितना बड़ा है? कौनसी क्लॉस में हैं बच्चे? वाइफ हस्बैंड जॉब सब की बातें हो रही थीं.......मैं सब को सुन रही थी। नीरज और प्रीति के दो बेटे हैं, उसने बताया ....नीरज और प्रीति दोनो ही जॉब करते हैं। रश्मि हाउस वाइफ है और उसका पति बिजनेस मैन.....राजीव अपने पापा के साथ उनकी आर्किटेक्ट की फर्म संभालता है और उसकी वाइफ टीचर है। पहली बार ग्रुप के दोस्त अकेले आए थे, पर अगली बार पति और पत्नियों के साथ आने का प्रोग्राम बनाने का सोचा। गेट टु गेदर अच्छा रहा, सबसे मिल कर अच्छा लगा.....रोहित जो नीरज का बहुत ही खास दोस्त था, वो भी राजेन्द्र नगर जॉब करता है, उसने बताया तो पता चला कि हम दोनो का ऑफिस पास पास ही है। उसकी वाइफ हिंदुराव हॉस्पिटल में नर्स है। नीरज का ऑफिस मायापुरी और प्रीति का ऑफिस चित्तरंजन पार्क है। उनके दोनो बच्चे पितमपुरा के सचदेवा पब्लिक स्कूल में पढते हैं....दोनो में अच्छी अंडर स्टैंडिग नजर आ रही थी। हमारे बाकी दोस्तों के हिसाब से वो परफेक्ट कपल लग रहे थे.....मैंने उन दोनो से भी वैसे ही हाय हैलो की जैसे सब के साथ की थी, पर प्रीति की नजरें मुझ पर रह रह कर आ टिकती, मैं उसके भावों को समझ नहीं पा रही थी, शायद वो बीते दिनों के निशान ढूँढने की कोशिश कर रही थी, जो उसे दिख ही नहीं रहे थे....सच भी यही था।आकाश को मैंने दिल से एक्सेप्ट किया था, नीरज को भूला कर.....वो अभी भी वहीं रानीबाग में ही रहते हैं.....ये बातों ही बातों में पता चल गया था। सब को विद्या से बहुत हमदर्दी थी, पर मैं तो उससे इंप्रेस थी, कैसे उसने अपनी तकलीफ को हँसी से दबा दिया है और अपने माँ पापा की देखभाल कर रही है, तब ये बात हमारे लिए बहुत अलग थी, सबकी बातें सुन कर मेरी बारी भी आयी बताने की अपने बारे में.....मैंने भी बताया अपने बच्चों के बारे में और अपने काम के बारे में.....!
आकाश और मम्मी पापा नहीं रहे ये नहीं बताना चाहती थी, पर विद्या ने सब को बता दिया, जब राजीव ने मेरे हस्बैंड के बारे में पूछा। सब चुप हो गए, जो मुझे अच्छा नहीं लगा। सब अपनी संवेदनाएँ एक्सप्रेस करने लगे....मैंने माहौल को हल्का करने के लिए मुस्कुरा कर कहा, "अब जो हुआ सो हुआ, आप लोग दुखी क्योि हो गए"! उसके बाद मैं ज्यादा रूकना नहीं चाहती थी, सो फिर जल्दी ही मिलेंगे कह कर होटल का बिल हमसबने कॉलेज के दिनों की तरह आपस में डिवाइड करके "पे" कर दिया! ये वो दिन थे जब मोबाइल पर मैसेज पैक भी अलग से डलवाना पड़ता था। हम सब ने एक ग्रुप बना लिया और मैसेज करके हालचाल पूछ लिया करते थे। हर महीने के पहले संडे को सब मिला करेंगे, अगर कोई बिजी होगा तो फिर अगले संडे का बना लेंगे प्रोग्राम पर मिला जरूर करेंगे और कोशिश होगी कि एक रविवार कुछ घंटे दोस्तों के लिए निकाल लिए जाएँ। यही सोच कर हमने एक दूसरे से विदा ली...... सब अपने अपने घर चले गए। घर आ कर भी बहुत दिनों के बाद कॉलेज का टाइम याद आ गया। नीरज और प्रीति को साथ देख कर फिर से आकाश का न होना खल रहा था....
क्रमश: