चरित्रहीन - (भाग-11) सीमा बी. द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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चरित्रहीन - (भाग-11)

चरित्रहीन.....(भाग-11)

विकास भैया और सोफिया का आना और उनकी शादी सब कुछ बहुत जल्दी जल्दी हो गया। जो चले गए उनकी जगह तो किसी भी तरीके से नहीं भर सकते।शादी में आए रिश्तेदार अगले दिन ही सुबह चले गए। विकास और सोफिया एक हफ्ते तक हमारे साथ रहे। फिर वो लोग भी वापिस चले गए, जाते जाते वो दोनो ही बोल कर गए कि बच्चों के स्कूल के बाद आगे की पढाई के लिए उन्हें उनके पास भेज दूँ और मुझे जिंदगी में आगे बढने के लिए भी समझा गए। "रिश्तेदार भी तो यही कहते थे कि 30-31 साल की उम्र में विधवा हो जाना बड़े दुख की बात तो है ही, साथ में एक आदमी का होना बहुत जरूरी है....जो मुझे और मेरे बच्चों को संभाल सके"? सोफिया ने मुझे कहा, "आप अपने बच्चों को अकेले भी संभाल सकती हूँ, उसमें कोई शक नहीं पर मुझे अपनी जरूरतों का भी सोचना चाहिए"! हमारे समाज में औरत को अबला समझा जाता है और अकेली औरत को मौका....शायद विदेशों में रहन सहन का प्रभाव है और वहाँ के सामाजिक नियमों का तभी तो सोफिया समझती है कि, "अकेली माँ भी अपने बच्चों की परवरिश अच्छी तरह कर सकती है, पर अगर औरत की नजर से देखें या एक इंसान के तौर पर सब की अपनी जरूरते होती हैं, जिन्हें पूरा करने के बारे में सोचना बुरा नहीं होता ना ही पाप"! हम सब की जिंदगी फिर पटरी पर आ रही थी। वरूण के साथ काम और बच्चों को संभालना सब ठीक से मैनेज होने लगा था। बच्चों को शाम को पूरा टाइम देने की मेरी कोशिश रहती थी।स्कूल भी घर से ज्यादा दूर नहीं था। बस अकेले रहने पर दिल घबराता था।अपने आप को बिजी रखना ही मुझे अच्छा लगने लगा था......जब तब फुरसत के पलों में आकाश की याद घेर लेती, वरूण और नीला के पास जाती तो वहाँ मम्मी पापा की बहुत याद आती....अपने अपने भाई भाभी को एक साथ देख दिल से हजारों दुआएँ तो हमेशा निकलती थी, पर आकाश की याद टीस दे जाती। अनुभा जैसे जैसे बड़ी हो रही थी, वरूण का लगाव बढ़ता जा रहा था.....उसे उसमें माँ दिखती थी। वो कई बार तो "पापा नहीं जाओ", अपनी तोतली जबान में कहती तो वरूण साइट पर ना जाता बस हर वक्त उसके साथ खेलने के लिए तैयार रहता.....हमारे फैक्टरी के मैनेजर साहब की मुझे याद आयी और मैंने उन्हें पूछा कि वो आजकल क्या कर रहे हैं तो वो बोले, " आपने जिन्हें फैक्टरी बेची थी, उन्होंने मुझे काम से हटा दिया तो अब वो किसी शोरूम में सेल्समेन का काम करने को मजबूर हैं"! मुझे दुख हुआ, मैंने उन्हे वरूण के पास मैनेजर के तौर पर लगवा दिया, वरूण को भी आराम मिल गया और मैनेजर साहब की ईमानदारी ने हम सब का मन जीत लिया। बहुत इज्जत से बात करता था वरूण उनसे क्योंकि उम्र में बड़े थे.....वैसे भी वो पापा की तरह था, अच्छे लोगो का मोल समझता था। पापा की तरह उसे भी पैसे का दिखावा करना कतई पसंद नहीं था। बिजनेस में उतार चढाव आते ही रहते हैं। बस ऐसे ही उठा पटक में जिंदगी बीत रही थी, मैं भी प्रोफेशन लेवल में पीछे नहीं रहना चाहती थी, इसीलिए अपने आप को अपडेट करती जा रही थी......उधर अनुभा और वैभव भी बड़े हो रहे थे। नीला के भाई ने वरूण को ऑफर किया हिल स्टेशन्स पर होटल बनाने के लिए। उसमें इन्वेस्टमेंट तो थी, पर बिजनेस इस इंडस्ट्री में बढ़ रहा था। मिडिल क्लॉस फैमिलिज भी अब अपना बजट ऐसा बनाने लगे थे कि उसमें कम से कम साल में एक बार बाहर घूमने जाया जाए......फिर विदेशी तो आते ही रहते हैं और भी काफी चीजों को ध्यान में रख वरूण ने होटल में भी पार्टनरशिप करने का सोच लिया। इस बार वरूण और नीला दोनो ही सचेत थे और सब कुछ कागजों पर लिखा भी गया और साइन भी किया गया। मैं खुश थी कि वरूण आगे बढ़ रहा है, और उसने जब मेरी सलाह ली तो मैंने उसे नहीं रोका, पर इतना जरूर समझाया कि तुम जो भी करना उसमें ट्रांसपेरेसी रखना जिससे रिश्ते ना बिगड़े और सारा पैसा इसमें लगाने से मना भी किया। पहला होटल शिमला में बना था। न ज्यादा मंहगा और न बिल्कुल ही सस्ता। होटल बना और धीरे धीरे काम भी शुरू होने लगा.....पापा कहते थे कि जब भी अपना काम शुरू करो तो 2-3 साल लगते है उससे कुछ प्रॉफिट मिलने में उससे पहले तो घर से पैसा लगता है और फिर खर्चे ही पूरे होने लगें तो समझो तुम सही जा रहे हो। वरूण हर 15 दिन में वहाँ जा कर सब देख आता था। नीला का भाई तो वहीं रहता ही था। सब भगवान की दया से सही हो रहा था। मेरा अकेलापन बढता जा रहा था। बच्चे स्कूल से आते, खाना खाते फिर शाम को स्पोर्टस के लिए ड्राइवर ले जाता, वहाँ खेल कर आते तो आ कर खा पी कर पढने बैठ जाते। आकाश को गए 6 साल हो गए, पर मुझे अब खुद को संभालना बहुत मुश्किल हो रहा था........क्योंकि मेरी शारीरिक जरूरत मेरे दुख पर हावी हो रही थी। इतनी उम्र नहीं थी कि मैं भगवान के पूजा पाठ में मन लगा पाती। फिर अब तक बच्चों के साथ बिजी रहती थी तो अपनी इच्छा को दबाती रही, पर आकाश की कमी बहुत खलती थी। मैंने दोबारा शादी न करने का फैसला बहुत सोच समझ कर लिया था.....एक सौतेली माँ तो फिर भी अपने सौतेले बच्चों को प्यार से पाल सकती है, पर एक सौतेला पिता नहीं....!
मुझे अपने फैसले पर कोई अफसोस भी नहीं था.....कई रिश्तेदारों ने अपना हाथ आगे बड़ी बेशरमी से बढ़ाया था मेरी शारिरीक जरूरतों का हवाला दे कर, पर मैेंने ना समझ पाने का नाटक कर सबसे किनारा किया, पर मुझे ये कहने में कोई शर्म या झिझक नहीं कि है कि मेरी सेक्स करने की इच्छा कई बार बहुत तेज होती थी.....पर खुद को मुझे ही संभालना था।
खुद को सेल्फ सैटिस्फाई करने के सिवा कोई विकल्प मैंने ढूँढने की कोशिश भी नहीं की......खैर वरूण के साथ काम करते रहने से मुझे जो पैसे मिलते थे वो हम तीनों को काफी होते थे....वरूण और नीला तो वैसे भी हम तीनों का बहुत ध्यान रखते थे.....पर धीरे धीरे वरूण अपना काम समेट रहा था और हिल स्टेशंस पर प्रॉपर्टी खरीद रहा था। गोवा में कॉटेज और विला खरीद लिया था, जिन्हें टूरिस्ट को किराए पर दिया जा सकता था। स्टॉफ में एक एक लड़का रख दिया जो केयर टेकर के साथ साफ सफाई करवा लिया करते थे.....काफी सोच विचार कर वरूण ने वैभव, आरव और अवनी को शिमला के बोर्डिंग स्कूल में डलवा दिया और कुछ टाइम बाद खुद भी वहीं सैटल हो गए.....नीला और वरूण ने मुझे भी बहुत कहा था वहीं चलने को पर मैं नहीं जाना चाहती थी....सो नहीं गयी। वरूण ने घर नहीं बेचा था....वहाँ किराएदार आ गए थे और मैं भी ध्यान रखती थी.....! वरूण और नीला कभी छुट्टियों में दिल्ली आ जाते बचिचों को ले कर तो कभी मैं चली जाती। पर बाकी के दिनों में मैं बोर होती रहती। बड़ा सा घर दो मंजिला खाने को दौड़ता तो मैंने विकास भैया से काफी सोचने के बाद उसे किराए पर देने के लिए पूछा तो उसने कहा," जैसे आपको ठीक लगे, आप का घर हैं, वैसे ही कर लीजिए भाभी"! कहने को विकास भैया रिश्ते में छोटे थे, पर मैंने बच्चों को शिमला भेजने से पहले भी उनकी राय जरूर ली थी। मैंने अपने आप को बिजी रखने के लिए काफी मशक्कत करने के बाद नौकरी ढूँढ ली थी.....! घर के लिए किराएदार भी मिल गए....पति पत्नी और तीन बच्चे , एक बेटी 2 बेटे थे। बच्चों के माता पिता सरकारी स्कूल में टीचर थे। माँ सुबह जाती और बच्चों के पापा दोपहर को...बच्चे बड़े ही थे। एक बेटा और बेटी कॉलेज में पढते थे और एक बेटा स्कूल में था। अच्छे लोग थे। घर आने के बाद किसी के होने का अहसास होता था.....! छुट्टी के दिन सबसे मुलाकात हो जाती थी....नौकरी करना शुरू किया तो नई मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा। या यूँ कहा जाए कि मुश्किले तो पुरानी थी बस लोग नए थे। फिर वही घटिया मानसिकता वाले लोग, जिन्हें पता चला कि मैं विधवा हूँ, बस हर कोई बहाना ढूँढ रहा था पास आने का...लड़कियाँ कम थी ऑफिस में और आदमियों को तो अकेली औरत हमेशा ही आकर्षित करती है या उन्हें ये गलतफहमी होती है कि अकेली औरत उसमें Interest ले रही है और स्वंयसिद्ध शुभचिंतक घोषित कर देते हैं.....चाहती तो नौकरी छोड़ सकती थी, पर मुझे ये भी पता था कि जहाँ जाउँगी लोग तो ऐसे ही मिलेंगे......फिर ऐसे लोगो से डर कर जिंदगी अपने तरीके से जीना नहीं छोड़ सकती थी। काम से काम रखने की वजह से और ऑफिस में सिर्फ काम करते रहने से एक फायदा जरूर हुआ था और वो था, बॉस को मेरा काम पसंद आ रहा था।जिसकी वजह से लोगो को मौका मिल गया मेरे कैरेक्टर पर कीचड़ उछालने के लिए , जिसमें उन्होंने पापा की उम्र के बॉस की इज्जत का भी ध्यान नहीं रखा और न ही उनके ओहदे का....बेशक कोई मेरे या बॉस के सामने कुछ नहीं कहते थे पर फिर भी कान मैं कुछ न कुछ शब्द सुनायी दे ही जाते थे...... पर फिर एक दिन मेरी मुलाकात मेरी कॉलेज की सहेली विद्या से हो गयी। मैं राजौरी मार्किट से कुछ सामान खरीद रही थी, वहीं मिली थी वो......
क्रमश: