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चरित्रहीन - (भाग-6)

चरित्रहीन.......(भाग-6)

वो रात रोते हुए और सोचते हुए ही बीत
गयी.....कभी मन करता कि नीरज ठीक कह रहा है मंदिर में शादी कर लेते हैं, फिर सब मान जाँएगें तो कभी दिमाग कहता कि मेरे मम्मी पापा को कोई दिक्कत नहीं इस शादी से तो ऐसे उनसे छिप कर शादी करने का कोई मतलब नहीं बनता......नीरज के प्यार पर मम्मी पापा का प्यार हावी हो गया था। आखिर होता भी क्यों नहीं उन्होंने मेरी इच्छा का मान रखा था तो उनकी इज्जत को मैं यूँ छुप कर शादी करके उछाल नहीं सकती थी.....सुबह होते होते मैंने भी अपना मन बना लिया था नीरज से दूर होने का......! सुबह मैं अपने टाइम पर तैयार हो कर नाश्ते की टेबल पर बैठ गयी....मम्मी पापा का उतरा चेहरा देख कर मेरा भी दिल भर आया...."आप दोनो उदास क्यों हो? मैं बिल्कुल ठीक हूँ, पापा मैंने सोच लिया है कि नीरज से शादी नहीं करूँगी, मैं अपना फैसला उसे बता दूँगी"। मम्मी पापा मेरी तरफ अविश्वास से देख रहे थे। "वसु हम तो सोच रहे थे कि नीरज के मम्मी पापा से हम बात करते हैं, उन्हें कहते कि नीरज मेरे साथ काम कर लेगा और एक फ्लैट और कार भी दे देगें तो तुम्हें भी कोई परेशानी नहीं होगी और एडजस्ट तुम हो ही जाओगी ये हमें यकीन है"! पापा की बात पर मम्मी ने भी सहमति दी!"पापा नीरज के पैरेंटस को मैं पसंद नहीं हूँ तो फिर कोई मतलब नहीं बनता.....कार या फ्लैट दे कर उसको काम में पार्टनर बनाना ये सब की जरूरत नहीं है, आप जो मुझे खुशी खुशी देंगे वो ठीक है पर जिंदगी भर के लिए एक रास्ता दिख जाएगा सब को अपनी जरूरते पूरी करने का....क्या मैं इतनी बुरी दिखती हूँ पापा कि आपको शादी करवाने के लिए ऐसी रिश्वत देनी पड़े"?मेरी बात सुन कर पापा चुप हो गए, मम्मी बोली....."तू तो बहुत सुंदर है बेटा, ठीक है जैसी तेरी मर्जी पर याद रखना हमारी तरफ से कोई बंदिश नही है".....! मम्मी ने प्यार से सर पर हाथ फेरते हुए कहा....!
नाश्ता करके मैं ऑफिस चली गयी और पापा अपनी साइट्स पर.........नीरज को मैंने दोपहर को फोन करके मैंने जो सुबह मम्मी पापा को कहा था वही उसको दोहरा दिया। वो मुझे बार बार कहता रहा, "अकेले फैसला कैसे कर लिया"....ज्यादा देर बात करती तो दिल पिघल जाता! दिल उसकी बात मानने का करता इसलिए मैंने फोन रख दिया और उसे फोन करने से भी मना कर दिया। 3-4 साल का रिश्ता मैंने तोड़ लिया, न जाने कितने ही सपने देख लिए थे हम दोनो नें, कितने प्लान्स भी बनाए पर सब कुछ बिखर गया एक टूटे हुए शीशे की तरह और उसकी किरचें मुझे अंदर और बाहर दोनो तरीके से तकलीफ दे रही थी, दिल पर लगी चोट को भुलाना वैसे भी कहाँ आसान होता है फिर पहला प्यार कोई कैसे भूल सकता है........मेरे लिए अच्छा ये था कि घर मैं सब मेरी तकलीफ को समझ रहे थे.....गर्मियों के दिन थे तो पापा हमें घुमाने ले गए। जगह बदली तो थोड़ा मुझे भी अच्छा लग रहा था....बहुत सुंदर जगह थी वो नैनीताल में ऊपर पहाडियों पर बना एक बिट्रिश सरकार के टाइमका बना वो विला शानदार था। खाना बनाने वाला कुक बहुत टेस्टी खाना बना रहा था.....दिन में नीचे घूम आते कुछ देर और शाम को आराम करते....मुझे तो सुबह सुबह बाहर लॉन में बैठे रहना ही बहुत अच्छा लगता था।8-10 दिन बहुत अच्छे से बीत गए थे। वरूण और मैंने बहुत टाइम बाद साथ में टाइम बिताया था....अब मैं तुमसे बड़ी हूँ वाली बात खत्म हो गयी थी....वापिस आए तो अच्छे दोस्त बन कर....!! ऐसा नहीं था कि नीरज ने फोन या मैसेज नहीं किए थे, मैं अपना फोन भी घर छोड़ कर गयी थी.....वापिस आ कर फोन ऑन किया तब मैसेज देखे थे मैंने उसके....हर मैसेज में वही सब बातें। वो मुझसे मिलना चाहता है उसके आखिरी मैसेज में था। मैं अब कोई बात मम्मी से नहीं छुपाना चाहती थी, सो मम्मी से पूछा तो उन्होंने मिलने को जाने के लिए बोल दिया....वो चाहती थी कि आमने सामने बैठ कर एक बार बात करने में कोई हर्ज नहीं है....
नीरज का फोन करके ऑफिस के बाद राजौरी गार्डन के स्टॉप पर मिलने को कह दिया.....नीरज से वो मेरी आखिरी मुलाकात है, यही सोच कर मैं उसे मिलने गयी थी....बस स्टॉप से मैं उसके साथ बाइक पर एक रेस्ट्रोरेंट में चले गए...वहाँ पर नीरज ने अपने लिए स्नैक्स का और मेरे लिए कोल्ड कॉफी का आर्डर किया। उस टाइम लोग बहुत कम थे, पर उस टाइम कपल्स को स्टॉफ भी बहुत अच्छे से देखते भी थे और मुस्कुराते भी थे...!
" क्या बात है वसु? तुम मेरी बात मान क्यों नही रही हो? मैं सच कह रहा हूँ वसु एक बार शादी हो जाएगी तो सब ठीक हो जाएगा? हम तो एक दूसरे से प्यार करते है न तो तुम इतना सोच क्यों रही हो"? "नीरज एक बार शादी कर लेने से क्या बदलेगा? तुम ही तो कह रहे थे कि तुम्हारी दीदी और जीजा जी हमारी शादी हुई तो तुम लोगो से कोई रिश्ता नही रखेंगे!! फिर मैं शादी करके इतने लोगो के दिल कैसे दुखी कर सकती हूँ!! इन सब में मेरी फैमिली की तो कोई गलती नहीं है फिर मैं क्यों छिप कर शादी करूँ? मैं उन्हें हर्ट नही कर सकती.....हमें इस रिश्ते को यहीं छोड़ देना चाहिए! ऐसे रिश्ते का कोई मतलब नहीं जिसमें हमारी फैमिली दुखी हो और ऐसे में हमारा खुश रहना मुश्किल है"। नीरज को अपनी बात का जवाब मिल गया था....कॉफी ज्यों की त्यों रखी थी और नीरज का आधा सैंडविच भी रखा रह गया और "वो ठीक है फिर जैसी तुम्हारी मर्जी कह कर उठ खड़ा हुआ"! मैं भी उठ गयी तब तक नीरज ने बिल दे दिया था..और नीरज ने मुझे वापिसी में मेरे घर तक छोड़ दिया और इस दौरान हमारी कोई बात नही हुई.....वो मुझे छोड़ चुपचाप चला गया। बहुत दुखी हो गया था मन नीरज से सख्ती से बात कर के...
इसके सिवा हम दोनो के पास चारा ही नहीं था। उस दिन हमारे रास्ते अलग हो गए.... मैंने अपना नं बदल लिया और उसका नं. कांटेक्ट लिस्ट से डिलीट कर दिया.....वरूणको मुझसे से उम्मीद नहीं थी, उसे लग रहा था कि मां अपनी बात मनवा ही लूँगी, पर ऐसा कुछ हुआ नहीं और मैं समझ गयी थी कि शादी सिर्फ लड़का लड़की की पसंद से ही नहीं बहुत कुछ और भी होता है जो दोनो परिवार देखते हैं......धीरे धीरे मैंने अपने आप को ऑफिस के काम और फिर घर के कामों में मम्मी की हेल्प में इतना बिजी कर लिया कि कुछ और सोचना ही छोड़ दिया.....नीरज की याद फिर भी चुपके से आ ही जाती थी जब भी मुझे कुछ टाइम अकेले बिताने को मिलता....।पापा को उनके दोस्त और हमारे रिश्तेदार मेरे लिए कोई न कोई रिश्ता बताते रहते क्योंकि हमारे टाइम में 21-22 साल की उम्र में शादी होना आम बात थी....मम्मी भी किसी न किसी लड़के का जिक्र ले कर अक्सर ले कर बैठ जातीं, वो सोच रही थी कि मेरी शादी हो जाएगी तो मैं खुश रहूँगी और सब नार्मल हो जाएगा .......पापा मुझे टाइम देना चाहते थे, वो मेरे मन को समझ रहे थे। हमेशा लगता था कि हमारे पापा गुस्से वाले हैं और वो मम्मी और हमारे मन को नहीं समझते, कितना गलत सोचते थे हम....पापा मेरे दिल का हाल ज्यादा बेहतर समझ रहे थे, इसलिए उन्होंने कहा कि अभी थोड़ा काम सीख जाए तब करूँगा शादी......इसमें ही 2 साल बीत गए। मैं पापा के काम को बेहतर ढँग से समझने लगी थी और अपने काम को और अच्छा करने लगी....वरूण ने भी अपनी पढाई खत्म कर बिजनेस जॉइन कर लिया.......आखिर एक दिन पापा ने घर आ कर बताया कि उनके एक दोस्त परिवार सहित रात को डिनर पर आ रहे हैं और वसु को भी देख लेंगे।लड़के का नाम आकाश है, वो अपने पापा का बिजनेस संभाल रहा है। रात को पापा के दोस्त परिवार के साथ खाने पर आए....अँकल आँटी और उनके दोनो बेटे
एक आकाश और दूसरा विकास.......
विकास अभी पढाई कर रहा है। आकाश
साँवले रंग पर बहुत अच्छी पर्सनलेटी थी लंबा कद और तीखे नैन नक्श शायद दोनो भाई अपनी मम्मी पर गए थे....पूरा परिवार पढा लिखा था। पापा की दोस्ती भी उनका काम करते हुए ही हुई थी काफी साल पहले जब उन्होंने अपनी फैक्टरी में काम करवाया था.....काफी हँसमुख फैमिली थी और हमारा वरूण पहली बार आकाश के छोटे भाई से खुल कर बातें कर रहा था...बीच बीच में आकाश भी बात कर रहा था.....! मैं चुपचाप सबकी बातें सुन रही थी तो आँटी मम्मी से बोली, "अनुभा जी लगता है वसुधा बिटिया कम बोलती है"! "नहीं, नहीं भाभी जी बहुत बोलती है, ऑफिस से आने के बाद मेरे साथ काम में लग गयी थी तो शायद थक गयी है"......! मम्मी की बात सुन कर मुझे भी मुस्कुराना पड़ा। "ऐसी बात है तो बेटा तुम आराम करो", अँकल जी ने तुरंत कहा!! "नहीं अंकल जी ऐसी कोई बात नही है, मैं आप सबकी बातें सुन रही थी, मैं बिल्कुल ठीक हूँ"। मेहमानों के सामने से यूँ उठ कर चले जाना भी अच्छे मैनर्स में नहीं आता, सोच कर बैठी रही......आकाश ने मुझसे बातें करना शुरू कर दिया...उधर हमारे पैरेंटस आपस में बातें कर रहे थे तो वरूण बोला चलिए मेरे रूम में चल कर बैठते हैं..चलो दीदी, आप भी आ जाओ। मुझे भी उन तीनों के साथ जाना पड़ा।आकाश बार बार मुझे देख रहा था, मैं उसकी तरफ जब भी देखती वो मुझे ही देखता दिख रहा था, थोड़ा अजीब लग रहा था मुझे, फिर उसने इधर उधर देखना शुरू कर दिया...... डिनर के बाद आइसक्रीम खा कर पापा ने उन्हें हमारा पूरा घर दिखाया।
वो लोग काफी तारीफ कर रहे थे हमारे घर की....और करें भी क्यों न, हमारा घर था ही इतना सुंदर....चारों तरफ से पेड़ पौधों से ढकी 500 गज की हमारी कोठी तब पंजाबी बाग के क्लब रोड़ की शान हुआ करती थी.....बाद में तो खूब कोठियाँ बन गयीं.......वो उस रात चले गए और अगले ही दिन उनका फोन आया कि आकाश को वसुधा बहुत पसंद आयी है.....अगर वसुधा को भी आकाश पसंद आया हो तो हमारी तरफ से ये रिश्ता पक्का समझिए....." पापा ने कहा कि हम दोनो को भी आकाश पसंद आया है, मैं वसुधा से बात करके आप को बताता हूँ"। पापा ने पूरी बात बता कर फैसला मुझ पर छोड़ दिया...... मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहूँ? मुझे कोई कमी नजर नहीं आयी न परिवार में और देखने भर से न आकाश में कुछ गलत दिखा कि मैं न कर देती सो मैंने सब कुछ पापा पर छोड़ कर "हाँ" कर दी...!
क्रमश:

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