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कामवाली बाई - भाग(२४)

अब पादरी अक्सर हमारी दुकान पर आने लगे और उन्होंने मेरे माँ बाप को भी मना लिया कि मैं ही उनके यहाँ खाना पकाने जाऊँ ,अपने माँ बाप के कहने पर मजबूरीवश मुझे उनके घर खाना पकाने जाना ही पड़ा, मैं यूँ ही उनके घर खाना पकाने जाने लगी और फिर एक दिन उन्होंने कहा कि वें मुझे बहुत चाहते हैं,मुझे उनकी ये बात बिल्कुल अच्छी नहीं लगी,सच कहूँ तो वें मुझे बिल्कुल पसंद नहीं थे क्योंकि उनकी हरकतें मुझे अच्छी नहीं लगतीं थीं और फिर एक दिन मौका देखकर पादरी ने मेरे साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की लेकिन उस दिन मैं उन्हें धक्का देकर बाहर निकल आई और फिर उसके बाद मैं कभी भी उनके यहाँ खाना पकाने नहीं गई...
माँ के पूछने पर मैनें कह दिया कि मुझसे कभी खाने में नमक ज्यादा हो जाता है तो कभी खाना जल जाता है,तुम ही चली जाया करो खाना पकाने,तो फिर मेरी माँ ही उनके घर खाना पकाने जाने लगी और मुझे इस काम से छुट्टी मिल गई और साथ में उस नीच पादरी से भी छुटकारा मिल गया...
इसी बीच हमारे गाँव में एक नया दुकानदार आया जो शहर से नए नए सुन्दर सुन्दर जनाना कपड़े लेकर आया था और उसने अपनी दुकान चर्च के पास ही लगा ली,उसे चर्च से दुकान लगाने की इजाजत मिल गई थी,उस दुकानदार का नाम जिमी था,वो नौजवान और खूबसूरत था,साथ में मुझसे उम्र दो तीन साल ही बड़ा था,वो एक दिन हमारी दुकान पर फूल खरीदने आया,उसने मुझसे गुलाब के फूल माँगें,मैं दुकान पर अकेली थी,मैनें उसे गुलाब के फूल दिए और फिर उसने मुझे उन फूलों के दाम दिए,मैनें वो पैसें रख लिए,लेकिन वो पैसें देने के बाद भी वहीं खड़ा रहा,वहाँ से गया नहीं,तब मैनें उससे पूछा....
आपका और कुछ रह गया क्या यहाँ पर?
वो बोला,रह तो गया है,
मैनें पूछा,कहीं आपने मुझको पैसें ज्यादा तो नहीं दे दिए?
नहीं!वो बोला...
तब मैनें पूछा,क्या रह गया आपका यहांँ मुझे बता दीजिए...?
तब वो बोला,यहाँ मेरा दिल खो गया है जो शायद आपने चुरा लिया है,
उसकी बात सुनकर मैं मन ही मन मुस्कुराई लेकिन बोली कुछ भी नहीं और जो गुलाब के फूल उसने मुझसे खरीदे थे वो उसने मुझे देते हुए कहा....
एक गुलाब के लिए ये ढ़ेर सारे गुलाब और इतना कहकर वो चलता बना...
मैं उसे जाते हुए देखती रही,वो अब रोज हमारी दुकान पर फूल खरीदने आने लगा,जिस दिन माँ और पापा दुकान पर होते तो वो उन फूलों को खरीदकर चर्च पर चढ़ा आता और जिस दिन मैं अकेली दुकान पर होती तो वो उन फूलों को मुझे दे देता,धीरे धीरें मेरे मन में भी उसके प्रति प्यार पनपने लगा और हम दोनों छुप छुपकर गाँव के बाहर खेतों में मिलने लगें,
जिमी मुझे बहुत चाहता था ,वो मुझसे शादी करना चाहता था और मुझे भी उस पर बहुत भरोसा हो गया था फिर एक दिन वो बोला कि मेरे मम्मी पापा आएं हैं वो तुमसे मिलना चाहते हैं,वो जो गाँव के बाहर पुराना किला है वहाँ उन्होंने तुम्हें बुलाया है,तब मैनें जिमी से कहा....
अगर उन्हें मुझसे मिलना था तो मेरे घर आते मेरे माँ पापा से भी मिलते,वहाँ पुराने किले में मुझे बुलाने की क्या जरूरत है?
तब जिमी बोला....
वें अभी सब जगह शोर नहीं करना चाहते,पहले तुमसे मिल ले इसके बाद वें तुम्हारे माँ पापा से भी मिल लेगें।।
और मैं जिमी की बात का भरोसा करके उसके साथ पुराने किले पर चली गई,लेकिन वहाँ पर कोई भी नहीं था,तब मैनें जिमी से पूछा कि कहाँ है तुम्हारे मम्मी पापा....
तब कहीं से वो चर्च का नीच पादरी वहाँ आ पहुँचा और मुझसे बोला...
मैनें ही तुम्हें बुलवाया था,जिमी को तुमसे प्यार का झूठा नाटक करने को मैने ही कहा था,इसके मैनें उसे पैसें दिए हैं,मुझे ठुकराया था ना तूने तो अब भुगत....
मैनें जब ये सुना तो मेरा खून खौल उठा और मैं पादरी पर चिल्लाई कि मैं तुम्हारा खून पी लूँगी और तभी मेरे सिर पर किसी ने पत्थर से वार किया शायद वो जिमी ही रहा होगा ,मैं उस वक्त बेहोश हो गई और जब मेरी आँख खुली तो मेरे हाथ पैर बँधे थे और मेरे मुँह पर भी पट्टी बँधी थी,फिर उस रात पादरी ने अपने मन की कर ली,मैं रोती रही चिल्लाती रही लेकिन उसने मेरी एक ना सुनी,वो लगातार दो तीन दिनों तक मेरे साथ हैवानियत के साथ पेश आता रहा,उसने मुझे नोच डाला,जब मैं घर ना पहुँची तो मेरे माँ पापा ने मुझे ढ़ूढ़ना शुरू किया और वें मुझे ढूढ़ते हुए पादरी के घर भी पहुँच गए,
वहाँ पर तब जिमी भी मौजूद था,मैं दूसरे कमरें में बँधी थी,जब मैनें अपने माँ बाप की आवाज़ सुनी तो कैसें भी करके मुँह की पट्टी सरका ली और चीख पड़ी कि माँ पापा मुझे बचाओ,मेरी आवाज़ सुनकर मेरे माँ पापा का माथा ठनक गया और वें मेरी आवाज की दिशा की ओर भागें,वे भागकर उस कमरें में पहुँचे जहाँ मैं बँधी पड़ी थी,उन्होंने मुझे खोलना चाहा तब तक जिमी मेरे माँ बाप के सिर पर एक डण्डे से पीछे से वार कर चुका था,वें दोनो वहीं अचेत होकर गिर पड़े फिर जिमी ने दोबारा मेरे मुँह पर पट्टी बाँध दी और फिर पादरी ने मेरी ही आँखों के सामने निर्दयता से उनके सिर पर पत्थर से वार पर वार किए,जिससे कुछ ही देर में उनके प्राण चले गए,मेरे मुँह पर पट्टी बँधी थी और मैं चीख भी नहीं पाई,बस तमाशा देखती रही...
रात हुई तो उन दोनों को मेरे माँ पापा की लाशों को ठिकाने लगाने के लिए बाहर निकलना पड़ा,इस बीच मेरे हाथों एक ब्लेड लग गई जोकि जिमी ने ही धोखें से छोड़ दी थी,मैं अपने हाथ पैर खोलकर दोनों का इन्तजार करने लगी और जैसे ही वें दरवाजे खोलकर भीतर घुसे तो मैनें पहले उनकी आँखों पर लालमिर्च का पाउडर डाला और फिर डण्डे से उन दोनों के सिर पर जोर जोर से वार करने लगी और तब तक वार करती रही जब तक वें दोनों बेहोश ना हो गए,फिर उन दोनों के ऊपर ढ़ेर सारे कपड़े डाले और खूब सारी शराब छिड़ककर आग लगा दी,इसके बाद मैनें घर के लकड़ी के हर एक सामान में आग लगा दी जिससे कि वें दोनों बच ना पाएं और ये एक हादसा लगें और फिर रातोंरात मैं वहाँ से भाग निकली,रात भर गाँव की पक्की सड़क के किनारे बस का इन्तजार करती रही लेकिन कोई भी बस वहाँ से ना गुजरी,फिर एक ट्रक वाले सरदार जी वहाँ से निकले और मैनें उनसे ये कहा कि यहाँ मेरी जान को खतरा है कुछ गुण्डे मेरे पीछे पड़े हैं अगर आप मुझे शहर पहुँचा देगें तो बड़ी मेहरबानी होगी और फिर उन्होंने मुझ पर दया खाकर मुझे अपने ट्रक से शहर पहुँचा दिया...
मैं शहर पहुँचकर दर दर भटकने लगी,दो दिनों की भूखी प्यासी थी इसलिए बेहोश होकर सड़क पर गिर पड़ी,जब मुझे होश आया तो मैं एक बिस्तर पर थी,मेरे होश में आने पर एक अधेड़ उम्र की महिला ने मुझसे पूछा...
अब कैसीं तबियत है तेरी?
मैनें कहा,ठीक हूँ,
अब तू यहाँ आराम कर,मैं तेरे लिए कुछ खाने को लाती हूँ,वो महिला बोली।।
तब मैनें उससे पूछा,कौन हैं आप और मुझे यहाँ क्यों लाईं हैं?
वो बोली, मैं गंगूबाई हूँ ,दया आ गई तेरे पर इसलिए अपने घर उठा लाई तुझे,
मैं ने कहा,लेकिन मेरे पास ना तो रहने का ठिकाना है और ना पैसें,तो मैं आपको इस एहसान के बदले कुछ नहीं दे पाऊँगी....
मैं तुझसे पैसें माँगे क्या?जब तक तेरा जी करें तब तक तू यहीं रह,मैं भी जब इस शहर में आई थी तो तेरी ही तरह अभागी थी,मुझे भी सहारा देने वाला कोई नहीं था लेकिन मैं खुद का सहारा बन गई,गंगूबाई बोली।।
बहुत बहुत धन्यवाद आपका,मैनें कहा।।
नाम क्या है तेरा?गंगूबाई ने पूछा।।
जी कैमिला नाम है मेरा,मैनें कहा।।
तू ईसाई है,गंगूबाई ने पूछा।।
जी!मैनें कहा।।
कोई बात नहीं ,मैं जात धरम नहीं मानती,तू यहाँ रह ,कुछ दिनों बाद मैं तुझे भी कोई काम दिलवा दूँगीं,गंगूबाई बोली।।
लेकिन आप काम क्या करतीं हैं?मैनें गंगूबाई से पूछा।।
बस,काँलेज की कैंटीन में खाना परोसने और बरतन धोने का काम करती हूँ,गंगूबाई बोली।।
और फिर उस दिन के बाद मैं गंगूबाई के साथ रहने लगी,मैनें उन्हें अपनी सारी बात भी बता दी,ऐसे ही मुझे उनके साथ रहते दो-ढ़ाई महीने बीत चुके थे,एक दिन जब मैं गंगूबाई के घर पर थी तो मुझे बहुत उल्टियाँ हुई,जब गंगूबाई काम से लौटी थी तो मैं बेहाल सी बिस्तर पर लेटी थी,उन्होंने मेरी ऐसी हालत देखी तो फौरन अपने पड़ोस के किसी लड़के से कहकर डाक्टर को बुलवाया,डाक्टर आई और उसने मेरी जाँच की तो वो बोली कि ये तो बनने वाली है,अब ये सब सुनकर मेरे होश उड़ गए क्योंकि मैं उस वक्त लगभग सत्रह साल की थी और ये बच्चा उस नीच पादरी का था,जिसे मैं रखना नहीं चाहती थी,
डाक्टर से पूछने पर वो बोली कि.....
इसका गर्भपात भी नहीं हो सकता क्योंकि दिन ज्यादा चढ़ गए हैं,लड़की की उम्र भी कम हैं इसलिए जान का खतरा बढ़ सकता है,
अब बच्चा रखना मेरी मजबूरी बन गया था,गंगूबाई भी चिन्ता में पड़ गई कि वो लोगों को क्या जवाब देगी इसलिए उन्होंने फैसला किया कि अब हम उस कमरें में नहीं रहेगें,दूसरी जगह कमरा लेगें और फिर हम दोनों को उस काँलेज के पास कमरा मिल गया जहाँ गंगूबाई काम करती थी...
वहाँ अब हमसे कुछ भी पूछने वाला कोई नहीं था,अब गंगूबाई मेरा बहुत ख्याल रखने लगी थी,उसमें मुझे मेरी माँ नज़र आती थी,एक दिन गंगूबाई काँलेज गई तो अपना बटुआ वो घर पर ही भूल गई,मेरी उस पर नजर पड़ी तो मैनें सोचा मैं ही बटुआ गंगूबाई को काँलेज जाकर दे आती हूँ फालतू में गंगूबाई वापस कमरें लौटेगी,काँलेज पास में ही तो हैं,यही सोचकर मैं काँलेज चली गई उनका बटुआ देने,मैं काँलेज पहुँची तो दरवाजे पर मौजूद वाँचमैन से मैनें गंगूबाई के बारें में पूछा कि वो कहाँ मिलेगीं,तब वाँचमैन हँसते हुए बोला.....
और कहाँ होगी,लगी होगी अपने काम में ,यहाँ से पीछे की तरफ जाकर कमरा नंबर पच्चीस है वो वहीं मिलेगी....
वाँचमैन के बताएं अनुसार मैं कमरा नंबर पच्चीस के पास चली गई,वहाँ मुझे एकदम सन्नाटा नजर आया , मैनें खिड़की से झाँककर देखा तो वहाँ कुछ लड़के बैठे चित्रकारी कर रहे थें और वें औरत के नग्न शरीर को अपने अपने कैनवास पर उकेर रहे थे,फिर मैनें और ठीक से देखा तो सबके सामने गंगूबाई नग्न अवस्था में बैठी थी और सभी लड़के उसी का चित्र बना रहे थे,ये देखकर मुझे बहुत शर्म महसूस हुई और मैं गंगूबाई को बिना बटुए दिए उल्टे पाँव कमरें लौट आई,उस दिन मेरा मन दिनभर विचलित रहा,मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि गंगूबाई ऐसा काम कर सकती है,जब गंगूबाई कमरें लौटी तो मैनें उनसे कहा....
मैं आज आपके काँलेज गई थी आपको बटुआ देने जो आप घर पर भूल गईं थीं...
तो दिया क्यों नहीं?गंगूबाई ने पूछा।।
मैं कमरा नंबर पचीस में गई थी लेकिन वहाँ का नजारा देखकर मैं उल्टे पाँव लौट आईं,मैनें कहा...
तो तुझे सब पता चल गया,गंगूबाई बोली।।
हाँ!मैनें कहा।।
तो अब तू मेरे बारें में क्या सोच रही है?गंगूबाई ने पूछा।।
वही कि आप इतना गंदा काम कैसें कर सकतीं हैं,आपने शरीर की नुमाइश वो भी इतने लड़को के सामने,मैनें कहा....
तब गंगूबाई बोली.....
मैं उनके सामने बिना कपड़ो के बैठी रहती हूँ लेकिन उनमें से कोई भी मेरी ओर गंदी नजरों से नहीं देखता,बाहर वालों की तरह कोई मेरे शरीर को भेड़िये की तरह नोचना नहीं चाहता,वें मुझे देवी स्वरूप देखते हैं क्योंकि मैं उनके लिए उनकी कला का भाग हूँ, सब मेरी इज्जत करते हैं और इस काम के लिए मुझे पैसें भी देते हैं,ये बात अलग है कि उन्हें और मुझे ये काम दुनिया वालों की नज़रों से बचाकर करना पड़ता है,मुझे कोई भी शर्मिंदगी नहीं है ये काम करने में,
क्योकिं जब मैं बेसहारा थी और मुझे रोटी चाहिए थी तो यही दुनिया वाले मेरे जिस्म को नोंच लेना चाहते थे,सब चाहते थे कि मैं उनके बिस्तर पर पहुँच जाऊँ लेकिन कोईं भी मुझे इज्जत भरी निगाहों से नहीं देखता था,तब मुझ गरीब को उन लोगों ने काम दिया,उन्हें तो मैं अपना बदन दिखाती हूँ लेकिन उन पर हवस सवार नहीं होती,वें मुझे अपने ज्ञान के लिए इस्तेमाल करते हैं ना कि अपनी हवस के लिए....
उस दिन मुझे गंगूबाई की बात सही लगी थी,वो सच ही तो कह रही थी,वो इज्जत की रोटी ही कमा रही थी,फिर उस दिन के बाद मुझे कभी भी गंगूबाई का काम गंदा नहीं लगा,ऐसे ही दिन बीतने लगें,फिर महीने बीते और फिर वो दिन भी आ पहुँचा जब मुझे प्रसवपीड़ा हुई ,मुझे गंगूबाई अस्पताल ले गई,तब मेरी हालत बहुत गम्भीर हो चली थी और डाक्टर ने कहा कि मेरा आँपरेशन करना पड़ेगा नहीं तो माँ और बच्चे दोनों की जान को खतरा हो सकता है,गंगूबाई बहुत परेशान हो उठी क्योंकि उसके पास आँपरेशन के लायक रूपए नहीं थे,फिर उसने उन लड़को में से एक को टेलीफोन किया और सारी बात बताई,फिर सब लड़को तक ये बात पहुँची और सबने पैसें इकट्ठे करके मेरे आँपरेशन के पैसें दिए और मैनें एक बच्ची को जन्म दिया और उसका नाम हम सबने एलिस रखा...

क्रमशः....
सरोज वर्मा.....


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