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उजाले की ओर –संस्मरण

नमस्कार

स्नेही मित्रों

अक्सर ऐसा होता है कि हम अनावश्यक रूप में ऐसी परेशानियों में फंस जाते हैं जो हमने नहीं की होतीं लेकिन फिर भी उसमें किसी पल अविवेकी होने के कारण हम बिना बात की उस स्थिति को अपने ऊपर ओढ़ लेते हैं। इससे होता यह है कि हम ना चाहते हुए भी ऐसी कठिनाई में पड़ जाते हैं कि हम फँस तो जाते हैं लेकिन उसका कोई हल दिखाई नहीं देता। इसलिए हम बिना बात ही परेशान हो जाते हैं।

हम सब इस बात से वाकिफ़ हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इसलिए समाज में रहकर वह अनेकों लोगों से मिलता रहता है, उन लोगों की कोई ना कोई समस्या होती है जैसे हम सब किसी ना किसी समय या क्षणों में किसी समस्या में घिर जाते हैं। उस समय यह ध्यान नहीं रहता कि हमारा तो इस बात से कोई लेना-देना ही नहीं है। फिर भी हम कभी मित्रों, कभी अपने साथ काम करने वालों या कभी अपने पड़ोसियों के चक्कर में किसी परेशानी में अनजाने में ही फँस जाते हैं और विकट परिस्थिति में आ जाते हैं। बाद में उसमें से निकलना हमारे लिए मुश्किल हो जाता है।

इस बात का ध्यान रखना भी आवश्यक है कि किसी भी विकट परिस्थिति में हमें बिखरना नहीं है, टूटना नहीं है, क्योंकि वृक्ष से टूटा पत्ता तक अपना

महत्व खो देता है। अतः किसी भी परिस्थिति में अपना विवेक नहीं खोना है। विवेक मात्र अपने अनुभवों से ही नहीं अपितु दूसरों के अनुभव से भी विकसित होता है, सुदृढ़ होता है।

विवेकवान व्यक्ति अमूल्य होता है। जिस तरह किसी बंजर ज़मीन में मीठे पानी का एक कुआँ सारी जमीन को हरा-भरा कर देता है ठीक उसी प्रकार अपरिपक्व व्यक्तियों में यदि कोई समझदार व विवेकी व्यक्ति होता है, ज्ञानी समझदार व्यक्ति होता है, वह सबके लिए मूल्यवान होता है और सबको कठिन परिस्थिति से निकालने में सक्षम होता है । इस प्रकार एक समझदार व्यक्ति, विवेकवान व्यक्ति पूरे कुल का उद्धार कर देता है।

थोड़ा सा बस ध्यान देने की आवश्यकता है और हम किसी भी परिस्थिति से निकलने में अपने आप को समर्थ बना सकते हैं इसलिए हमें हर परिस्थिति में अपने आप को चैतन्य रखने की आवश्यकता होती है।

आपका दिन मंगलकारी हो।

आपकी मित्र

डॉ प्रणव भारती

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