अब क्या कहूँ Rama Sharma Manavi द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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अब क्या कहूँ

आजकल मैं अत्यधिक चिंतित रहती हूँ।अपनी इस परेशानी को किसी से बांट भी तो नहीं सकती, बस ईश्वर से प्रार्थना करती रहती हूँ कि जो हमारे लिए उचित हो,वह निर्धारित करना,सद्बुद्धि देना,क्योंकि अक्सर हमारे हाथ में कुछ होता नहीं है,मुझे ऐसा प्रतीत होने लगा है, बस हम मौन सबकुछ विवश सा देखते रहते हैं।

पहले सोचती थी कि बेटियों की माँओं को ढेरों चिंताओं का सामना करना पड़ता है, यथा..बाहर भेजने में, जमाने की उंगलियों का, संस्कारों का,गृहस्थी के कार्यों की कुशलता का,कुछ ऊंच-नीच का,दान-दहेज,विवाहोपरांत सामंजस्य का….औऱ भी न जाने क्या-क्या,जिनसे जूझते अपनी माँ एवं अन्य परिचिता महिलाओं को देखा था।

लेकिन आज मैं महसूस कर रही हूँ कि बेटों की माताएं भी कम परेशान नहीं हैं।अक्सर युवा होते पुत्र का पिता से 36 का आंकड़ा होता है,उनके बीच माँ सैंडविच बनती रहती है।बेटे को बिगाड़ने का सारा दोष माँ के मत्थे मढ़ दिया जाता है,उधर बेटा पिता की हाँ में हाँ मिलाने का आरोप जब तब लगा देता है।इंटर में आते ही बेटे को बाइक,मोबाइल चाहिए ही चाहिए, दोस्तों के संग बाहर रहने पर पिता की बात माँ को ही सुननी होती है। पिता की कही बहुत सी कड़वी बातें मैं बेटे से नहीं बताती एवं बेटे के कई कृत्यों को पति से छिपाना पड़ता है, जिससे दोनों के मध्य अनावश्यक तनाव न बढ़े।

जब बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं तो वे पुरानी पीढ़ी के साथ-साथ उनकी हर सलाह को भी आउटडेटेड समझते हैं।हमारे लिए एक कॉमन जुमला हमेशा उनकी जुबान पर होता है कि आप हर समय अपने पुराने जमाने की बात करते रहते हैं।आज दुनिया बदल गई है,आप लोगों की तरह हम स्लो चलकर सर्वाइव नहीं कर सकते।माना मैंने कि धारा के अनुकूल चलना ही समझदारी है लेकिन हर बात तो कभी भी सही नहीं होती किसी भी युग/जमाने की,न सबकुछ ग़लत।

आधुनिक युग के तमाम परिवर्तनों में एक है,मेट्रो शहरों में लिवइन का बढ़ता चलन,जो हमारी पीढ़ी के लोगों को सर्वथा अनुचित प्रतीत होता है लेकिन आज के युवा उसे सहजता से स्वीकृति प्रदान कर रहे हैं, बल्कि यह तरीका उन्हें ज्यादा आसान प्रतीत होता है कि अगर अंडरस्टैंडिंग न बने तो बिना कोर्ट-कचहरी के ब्रेकअप कर अलग रास्ते पर चल पड़ते हैं, हालांकि ऐसा भी नहीं है कि इनमें समस्याएं कम आती हैं,लेकिन उनका फंडा होता है, जो होगा निबट लेंगे।खैर,फ़िलहाल मैं इसके फायदे-नुकसान का विश्लेषण नहीं कर रही हूँ,बस अपनी व्यथा बता रही हूँ।

पीजी करते समय ही बेटे की फ्रेंडशिप आयशा से हो गई, शीघ्र ही उनकी मित्रता प्रेम सम्बंध में परिवर्तित हो गई और मेट्रो चलन के अनुसार वे लिवइन में रहने लगे।मैं आधुनिक माँओं की भांति बेटे से मित्रवत व्यवहार करती थी, जिससे वह अपनी हर बात मुझसे शेयर कर सके,जिससे उसे उचित मार्गदर्शन प्रदान कर सकूँ।हालांकि मैं भी अच्छी तरह जानती हूँ कि वे करेंगे अपने मन की,बस मैं मात्र सलाह दे सकती हूँ अपने मन की तसल्ली के लिए।

भले ही मैं प्रेम विवाह को स्वीकार करती हूँ, लेकिन इतना तो मानती ही हूँ कि कम से कम लड़की दूसरे धर्म की न हो,बिल्कुल अलग मान्यताएं एवं परवरिश सामंजस्य में अत्यधिक आड़े आती हैं।उसपर ये धर्म के ठेकेदार विभिन्न धर्मों के मध्य खाई को अपने भड़काऊ बयानों से औऱ गहरी करते जा रहे हैं।जब बेटे ने आयशा के बारे में बताया तो मैंने उसे यही बात समझाई, उसका जबाब था कि माँ, समय बदल गया है, मेट्रो सिटी में यह कोई नहीं मानता।

उम्मीद थी कि किसी दूसरे शहर में जॉब करने जब बेटा चला जाएगा तो यह रिश्ता समाप्त हो जाएगा लेकिन बेटा वहीं जॉब करने लगा।धीरे - धीरे ज्ञात हुआ कि आयशा ड्रिंक भी करती है, रात्रि पार्टियों में भी जाने का शौक है, शॉर्ट टेम्पर्ड है...मतलब टोटली आज की आधुनिका।जबकि बेटा न ड्रिंक करता है, न ऐसी पार्टियों का शौकीन है,ऐसा नहीं है कि वह आइडियल है, बस उसे पसंद नहीं है।आए दिन तो उनके मध्य वाद-विवाद हो जाता है,अक्सर कारण बिना सिर-पैर के होते हैं।बड़े गर्व से वह कहती है कि मैं बेहद जिद्दी हूँ, मैं कभी नहीं झुकूँगी।आयशा का पिछला ब्रेकअप इसीलिए हुआ था कि वह युवक कंजरवेटिव था।बेटे को उसकी स्पष्टवादिता पसंद आई थी या शायद आज का युवा ज्यादा सोच-विचार नहीं करता,जिंदगी को एडवेंचर मानता है।मेरे विचार से सम्भवतः इसीलिए उनके रिश्ते अधिक स्थाई नहीं होते।

मैंने बेटे को समझाया कि सिर्फ़ इतने से जिंदगी नहीं चलती।तुम दोनों के स्वभाव में जमीन-आसमान का फ़र्क है, इसलिए कोई भी निर्णय जल्दबाजी में मत लेना,यह विवाह टिक नहीं सकता।बेटा कुछ झुंझलाते हुए बोला,"हद करती हो माँ,अभी 4-5 साल तक विवाह का तो मतलब ही नहीं है, वैसे भी आजकल की लड़कियाँ ऐसी ही हैं, अब आप के जमाने की तो हैं नहीं।

यह तो मैं भी जानती हूँ कि समय अत्यंत परिवर्तित हो गया है लेकिन उम्र का अनुभव तो है ही कि इतनी वैचारिक-वैयक्तिक भिन्नता वाले लोगों के मध्य रिश्ता चल ही नहीं सकता।फिर एक माँ की तरह मैं भी चाहती हूँ कि बेटे को एक समझदार-सुलझी हुई जीवनसाथी प्राप्त हो,जो कम से कम अपनी गृहस्थी का संचालन सुव्यवस्थित ढंग से कर सके।इतने खुले हाथों वाली युवती क्या संचय करेगी।जिसे रिश्ते बंधन लगते हैं,वह कबतक रिश्तों को निभा पाएगी।परिवर्तन हर जगह सम्भव है, परन्तु सिर्फ़ उम्मीद पर भी जिंदगी नहीं गुजारी जा सकती है।

मेरे तनाव का एक और भी बड़ा कारण है कि यदि पति को यह लिवइन उसपर अलग धर्म वाली युवती के सँग वाली बात ज्ञात हुई तो वे बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेंगे,जिसे मैं अनुचित मानती भी नहीं, वे एक सिद्धान्तवादी व्यक्ति हैं, उन्होंने पूर्व में ही कह दिया था कि उपजाति तो स्वीकार्य है, अलग धर्म नहीं।अब बस यही उम्मीद है कि शीघ्र बेटे का ब्रेकअप हो औऱ कोई सुपात्र युवती उसकी जिंदगी में प्रवेश करे।

आज के हालातों को देखते हुए हमें यह उम्मीद तो कदापि है भी नहीं कि वे हमारे साथ एडजस्ट करेंगे,लेकिन बच्चों के सुखद जीवन की कामना तो हर माता-पिता करते हैं।अब क्या कहूँ,बस खामोशी से सुसमय की प्रतीक्षा करने के अतिरिक्त मेरे पास कोई विकल्प नहीं है, बीच-बीच में समझाती रहती हूँ।चिंता यह भी रहती है कि कुछ अनहोनी होने पर लड़कों की जिंदगी भी बर्बाद होती है,खामियाजा सभी भुगतते हैं, बच्चों के साथ उनका पूरा परिवार भी।भले ही हम स्वयं को कितना भी निरपेक्ष मानने का प्रयत्न करें, लेकिन खून का, ममत्व का,प्रेम का रिश्ता है,हम निश्चिंत रह ही नहीं सकते हैं।खैर, बदलाव का अच्छा-बुरा परिणाम सभी को प्रभावित करता है, हम बस उसे सहने-समझने का प्रयास करते रह सकते हैं।

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