करोड़ों-करोड़ों बिजलियां - 4 S Bhagyam Sharma द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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करोड़ों-करोड़ों बिजलियां - 4

अध्याय 4

वैगई की बात को सुन कर दूसरे तरफ की वाणी सुब्रमणियम स्तंभित रह गई |

“नहीं वैगई...! किसी से भी हमें किसी तरह की समस्या नहीं चाहिए | उस दयानिधि ट्रस्ट के लोगों ने रुपयों के मामले में जैसा करने को कहा है, वैसा ही करो | बेकार टकराना ठीक नहीं है...........”

वैगई हंसी | “टकराहट तो होगी ही........ परंतु वह अहिंसा की टकराहट होगा ?

“मैं नहीं समझी !”

“मैडम........... ये समस्या मैं हेंडल कर लूँगी | उस पाँच लाख रुपयों को किस-किस काम में उपयोग में लेना है, आप लिस्ट बना कर रखना, बस |”

“वैगई तुम कुछ ज्यादा ही आगे की सोच रही हो ऐसा लग रहा है |”

“मैडम ! उनसे चेक लेते समय ही मैंने तय कर लिया कि आधा रुपया उनको नहीं देंगे |”

“मुझे डर लग रहा वैगई |”

“मैडम.......... दयानिधि ट्रस्ट को बाय-बाय करके सोइएगा | कल जब मैं सर्विस सेंटर आऊँगी तब इसके बारे में बात करेंगे | गुड नाइट मैडम..........”

वैगई मोबाइल को बंद कर मेज पर रखकर कमरे से बाहर आई | पूरी बनाने कि खुशबू पूरे घर में फ़ैल गई | अम्मा के रसोई में रहने से ही ऐसी खुशबू आती रहती है | पेट के अंदर चूहे दौड़ने लगे | वैगई रसोई में घुस कर थाली ले कर बैठी | अम्मा की मदद के लिए रसोई में खड़ी हुई तुंगभद्रा को देख उसने पूछा |

“तुंगा………! तुम्हारी इंटरनल परीक्षा कब खत्म होगी ?”

“अगले हफ्ते.....”

“उसके बाद तुम फ्री हो.....?”

“फ्री हूँ क्यों अक्का ?”

“विदेश से एक प्लास्टिक सर्जन हमारे अस्पताल में आकर, एक महीना रह कर प्लास्टिक सर्जरी करने वाले हैं | एक अपाइंटमेंट फिक्स करके जाएंगे........?”

“ये सब नहीं चाहिए अक्का.....”

“क्यों नहीं.......?”

“मुझे पसंद नहीं....”

अम्मा उमैयाल दो पूरी गरम गरम निकाल कर वैगई की थाली में डालते हुए तुंगभद्रा के ऊपर नाराज हुई |

“क्यों री ! तुम्हारे मन में तुमने क्या सोचा है........ वैगई जब भी डॉ. के पास जाने के लिए बुलाये ‘मुझे पसंद...... नहीं | मैं नहीं आऊँगी बोलना ही तुम्हारा धंधा हो गया ! तुम्हारे गर्दन के नीचे एसिड गिरने से रंग बदलकर थोड़ा गल गया उस को ठीक करके ही तो तुम्हें किसी के हाथों सौंप सकते है.....?”

“मैं ऐसे ही रह लूँगी | मुझे किसी के हाथ में सौंपने की जरूरत नहीं |”

“ये.........!” वैगई अपने बाएँ हाथ से छोटी अंगुली को ऊंची कर “ये बड़ी-बड़ी बातें सब मेरे सामने......... नहीं चलेंगी............. अगले हफ्ते डॉक्टर के पास तुम्हारा अपाइंटमेंट लेकर, तुमको इतला कर दूँगी | तुम्हें अस्पताल आना है...... नहीं आने का बहाना नहीं चलेगा......”

“अय्यो अक्का.... ऐसा सब मत बोलो ! मैं प्लास्टिक सर्जरी के लिए क्यों मना करती हूँ.......? उसके लिए बहुत खर्चा होगा.........?”

“हाँ होगा.............! करीब-करीब एक लाख रुपया खर्च होगा | हमारे अस्पताल में प्लास्टिक सर्जन विजयकुमार ने कहा है | विदेश का सर्जन आकर करते समय और ज्यादा ही होगा मुझे पता है |”

“इतने रुपयों के लिए तुम क्या करोगी अक्का.......?”

“पैसों के बारे में तुम क्यों फिकर कर रही हो.....?”

“फिकर न करूं? मैं कोई बिलगेट्स के फैमिली से थोड़ी न पैदा हुई हूँ |”

“देखा अम्मा तुम्हारी आखिरी बेटी का व्यंग्य |”

उमैयाल एक खाली हंसी हंसी | “तुंगा के पूछने में एक न्याय है.........? डॉक्टर ने प्लास्टिक सर्जरी करूंगा बोल दिया, तो रुपयों का क्या करें......?”

“अम्मा.....! हंसा हॉस्पिटल में मैं काम करती हूँ, मुझे पचास प्रतिशत मेडिकल कन्सेशन मिलेगा | ऑपरेशन का खर्चा एक लाख रुपये, तो मुझे पचास हजार रुपये ही देने पड़ेंगे |”

“ठीक है ! उस पचास हजार का क्या करें ?”

“अस्पताल में लोन ले सकते है......? उस लोन के पैसों को वेतन से महीना महीना काटेंगे |”

किचन के प्लेट फॉर्म में कुछ और काम कर रही यमुना बोली- “अक्का ! तुम महीने-महीने जो पूरी वेतन लेकर आती हो तो भी माह के अंत में सांस लेने में दिक्कत आती है.......... इसमें से भी रुपये कट जायें तो, कोमा की स्टेज आ जाएगी |

वैगई दो पूरियां खाकर तीसरी लेते हुए बोली “ये सब देखे तो......... तुंगा का ऑपरेशन ही नहीं हो सकता ? तुंगा के लिए एक अच्छा दामाद चाहिए तो प्लास्टिक सर्जरी तो करनी पड़ेगी |”

“अब मैं यमुना के मेटर पर आती हूँ | यमुना......!”

“क्या है अक्का ?”

“और पंद्रह दिनों में अपने घर के बाहर एक एस.टी.डी. बूथ आ जाएगा | उसे अच्छी तरह निर्वाह करने का कर्तव्य तेरा है |”

“टेलीफोन डिपार्टमेन्ट से अभी तक इंटीमेशन नहीं आया अक्का ?”

“दो दिन में आ जाएगा | मैं स्वयं जाकर कंसर्न डिपार्टमेन्ट के ऑफिसर से बात करके आई हूँ |”

“डिपोसिट कुछ नहीं भरना क्या ?”

“सब कुछ सरकारी एड है पहले निवार्ण फंड निधि से पैसे निकाल कर, वे ही डिपोसिट कर देते है | हमें इस बूथ को अच्छी तरह चलाना ही है बस बहुत है |”

बाहर चप्पल की आवाज आई | उमैयाल रसोई में से ही झांक कर देखी |

“तुम्हारे अप्पा आ गए.......... साथ में किसी को लेकर आए है |”

“कौन ?”

“देखने से शादी करवाने वाला ब्रोकर जैसे दिख रहा है |”

“उमै !” अप्पा श्रीनिवास की आवाज हॉल में से सुनाई दी, अम्मा सरकने लगी तो हाथ दिखाकर रोक जल्दी से खाकर खुद गई |

लड़की को देख श्रीनिवास “अम्मा कहाँ है ?” पूछा “अम्मा रसोई में काम कर रही है | क्या बात है बताइये अप्पा........”

“वह...........है.......... ना.......... ये शादी करवाने वाले ब्रोकर नारायण स्वामी हैं | रास्ते में मिले | इनके साथ में तीन चार वर है | तुम्हारी बड़ी लड़की वैगई के लिए देख सकते हैं, बोले | इसलिए बुला कर ले आया |”

ब्रोकर नारायणस्वामी अपने बिखरे दांतों को दिखाते हुए हंसा |

वैगई अपने अप्पा के पास खाली जगह में कुर्सी को डाल सहारा लेकर बैठ गई और ब्रोकर को निहारा |

“मेरे लिए आने वाला दामाद कैसा होना चाहिए अप्पा ने बता दिया होगा..........?”

ब्रोकर देखने लगे | “ऐसा कुछ नहीं बोला ?”

“भूल गए लगता है | मैं बताती हूँ | सुन लीजिएगा ? इस परिवार में पैदा होकर मैंने बहुत कष्ट झेले | इसलिए अब मैं जिस परिवार में जाऊँ वह बड़ा अमीर परिवार होना चाहिए | बंगला, कार एसेस्ट के नाम पर सब सुविधाएं होनी चाहिए | वर पढ़ा-लिखा न हो चलेगा | ये मेरा प्रथम चॉइस है | मेरा दूसरा चॉइस का वर यदि ठीक ठाक सुविधाओं से लैस है तो वह आई. ए. एस. हो | नहीं तो वह विदेश में जाकर पढ़ लिख कर आए डॉक्टर हो |”

ब्रोकर ने सदमे में थूक निगला “क्या है श्रीनिवास, आपकी लड़की ऐसे बात करती है ?”

“लड़की आपसे मज़ाक करती है....... श्रीनिवास के हंसने से वैगई तनाव में आई |”

“अप्पा.....! यह मज़ाक नहीं.... ये मेरा लक्ष्य है..... इसे इस ब्रोकर से नहीं; जितने ब्रोकर से मिलो सबसे कह देना........ सभी बातों को बड़ा ही समझना चाहिए ,बडा ही प्राप्त करने की सोच वाली हूँ मैं |”

ब्रोकर उठने लगा, तो श्रीनिवास ने अपनी बेटी को थोड़ा डर और आश्चर्य से देखा |

दूसरे दिन शाम दस बजे |

वह विसिटर्स के आने का समय है, हंसा अस्पताल के सभी फ्लोर में जनता दिखने लगी | वैगई प्रथम तल में अकाउंट सेक्शन में घुसी |

“वैगई तुम कहाँ चली गईं......?”

चीफ डॉक्टर का लड़का आदित्य आपको बुला रहा है....”

“कब ?”

“दस मिनिट के पहले.......”

“ठीक है | मैं जाकर देखकर आती हूँ |” वैगई कमरे के बाहर आकर दो मिनिट में बाहर आई तो लिफ्ट के बंद होने के पहले लिफ्ट पर चढ़कर पाँचवी मंजिल के आदित्य के कमरे में दाखिल हुई |

रिवाल्विंग कुर्सी में बैठे आधा चक्कर लगा कर एक फ़ाइल देख रहेआदित्य की गर्दन ऊंची हुई |

एक आदमी के भी इतने सुंदर, लाल होंठ होते हैं क्या ?

“सॉरी.....सर..... आपने बुलवाया उस समय मैं सीट पर नहीं थी |”

“नो प्रॉबलम..........प्लीज हैव सीट |”

वैगई बैठ गई | आदित्य उसके मेज पर रखे एक कागज को उठा कर उसे देते हुए बोला-

“इंडियन मेडिकल कौंसिल ने अपने अस्पताल को एक पत्र लिखा है | उसके जवाबी पत्र का ड्राफ्ट मैंने बनाया है | ये मेरे लिए नया अनुभव है | पत्र के वाक्य ठीक हैं क्या आप एक बार देख लो तो बैटर होगा ऐसा मुझे लगा | आप देख लेंगे.....?”

“श्योर सर.....” बोल कर वैगई, उस पत्र को धीरे से पढ़ कर बोली- “एक छोटा सा करेक्शन है सर |”

“बोलिए.......”

“वी रिक्वेस्ट यू........” जहां है वहाँ वी सजेस्ट यू बदल सकते है सर | यहाँ हमें रिक्वेस्ट करने की जरूरत नहीं.........”

“फ़ाइन आप ही बदल दीजिएगा..............” आदित्य के बोलते समय ही मेज पर रखे इंटरकॉम की मधुर ध्वनि सुनाई दी |

रिसीवर को उठा कर “यस” बोला आदित्य | उसका खिला चेहरा, दूसरी तरफ की बातों को सुन थोड़ा सदमे में आ गया |

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