करोड़ों-करोड़ों बिजलियां - 3 S Bhagyam Sharma द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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करोड़ों-करोड़ों बिजलियां - 3

अध्याय 3

आधी सीढ़ियों में ऐसे ही खड़ी हो गई वैगई | बिरयानी और व्हिस्की की गंध हवा में जो आ रही थी उसको सूंघते हुए, एक क्षण के लिए सोचा |

‘जगह ठीक नहीं है वापस चली जाए ?’

‘वापस चली जाए’ सोच को कार्य में परिणित करने एक सीढ़ी नीचे उतरी तभी सीढ़ियों के ऊपरसे गंजे सिर वालेने आवाज दिया |

“कौन है ?”

वैगई ने ऊपर देखा |

तहमद और कुर्ते में वह पचास साल का आदमी दिखा | बाएं हाथ की अंगुली में बची हुई सिगरेट धीमा धुआँ छोड़ रही थी |

वैगई दुबारा एक सीढ़ी चढ़ी | “ट्रस्ट के प्रेसिडेंट को देखने आई......”

“जिसने टेलीफोन किया वह लड़की तुम ही हो क्या ?”

“हाँ”

“ऊपर आओ माँ ! तुम्हारे लिए ही ट्रस्ट के सेकट्ररी ट्रेजरार घर भी नहीं गये इंतजार कर रहे हैं |”

वैगई संकोच के साथ सीढ़ियाँ चढ़ी | भवन की दीवार साफ नहीं थी | पान खाकर थूकने के निशान जगह-जगह पर थे |

वैगई सामने वाले कमरे के अंदर गई | तिपाया में बिरयानी के पैकेट को खोल कर रख कर दो जने पसीने से भीगे हुए खा रहेथे | तिपाया के नीचे खाली हुए दो व्हिस्की की बोतल लुढ़के पड़े थे | बिरयानी भरे मुंह से हँसे |

“आओ..... खाओ |”

“मैंने खा लिया |”

“ऐसा ? अंदर जाकर प्रेसिडेंट के साथ बात करो हम आते हैं |”

वैगई प्रेसिडेंट के पीछे वाले दूसरे कमरे में गई | वे फैन का स्विच ऑन कर कुर्सी पर बैठे दिखाई दिये |

“बैठो अम्मा” (दक्षिण में सभी लेडीज को अम्मा बोलते है |)

वह बैठी |

प्रेसिडेंट ने कुर्सी का सहारा लेकर बैठते हुए टूथ पिक से दांतों को कुरेदते हुए बात करना शुरू किया |

“ऐसा एक ट्रस्ट है तुम्हें पहले पता था क्या ?”

“नहीं मालूम साहब....”

“ये एक पारिवारिक ट्रस्ट है | इसके निर्वाह का जिम्मा मैंने और सेकट्ररी पोन्नबलन ट्रेसरार वरदराजन ने दस साल से लिया हुआ है | मेरा नाम नित्यानंदम है | दो तीन मंदिरों का धर्मकर्ता भी हूँ | पोन्नबलन एक आडिटर है | वरदराजन एक वकील है | इस ट्रस्ट की इमारत इस तरह से भग्न अवस्था में खड़े होने का एक कारण है | हाईकोर्ट में एक केस इस पर चल रहा है | उस केस का फैसला होने के बाद ही इस इमारत को नया करवा सकते हैं |”

पोन्नबलन और वरदराजन डकार लेते हुए अंदर आए और अध्यक्ष के पास की कुर्सियों में बैठ गए या अपने 90 पाउंड वजन को उस पर डाल दिया|

“क्यों नित्यानन्दन ! अपने ट्रस्ट के बारे में वैगई को सब कुछ बता दिया |

“अभी ही शुरू किया.......” कह कर नित्यानन्द ने, वैगई को मुस्कुरा कर देखा | “क्यों ! ऐसा क्यों देख रही हो.....तुम्हारा नाम हमें कैसे मालूम हुआ ? तुम्हारा नाम ही नहीं..... तुम्हारी फेमली के बारे में भी सभी विवरण हमें याद है | उसके अनुसार तुम्हारे अप्पा का नाम श्रीनिवासन, अम्मा का नाम उमैयाल | तुम्हारी दो बहनें हैं | पहली बहन का नाम यमुना और दूसरी बहन का नाम तुंगभद्रा है | यमुना के बाये पैर में थोड़ी लोच है | तुंगभद्रा कॉलेज जा रही है | छ: महीने पहले कॉलेज के लैब में एक घटना के कारण उसके चेहरे पर एसिड गिर गया उसके कारण, तुंगभद्रा के गर्दन के नीचे खाल खराब.....”

“साहब........”

“सॉरी माँ....... ! तुम्हारी बहनों की कमजोरियों को मैं तुम्हें बताने के लिए मैं इसे तुम्हें नहीं कह रहा | तुम्हारी फेमली के बारे में सभी विवरण मालूम है इसलिए बता रहा था | हमारे ट्रस्ट ने तुम्हारे समाज के अच्छे कार्यों को देखते हुए , पाँच लाख रुपयों को आपको देने का फैसला किया है | तुम जो समाज सेवा कर रही हो उसके बारे में बाहर लोगों से पूछा | उस संस्था की मुखिया वाणी सुब्रमणियम होने पर भी, तुम्हारे बारे में ही सबने बहुत बोला...... अत: एक बड़ी रकम हम देने वाले है | पाँच लाख रुपये देने में अभी कोई रुकावट भी नहीं है | तुम आज ही चेक लेकर जा सकती हो......”

“थैंक्यू सर.....”

“चेक लेने के पहले तुमसे कुछ बात करनी है |”

“कहिए सर...... क्या बात है....?”

प्रेसिडेंट नित्यानंदम पोन्नबलम की तरफ मुड़े |

“ऑडिटर सर आप ही बोलो |”

पोन्नबलम नकली मुस्कान के साथ, वैगई को देखा |

“क्यों माँ..... इसके पहले भी किसी ट्रस्ट ने तुम्हारे समाज को रुपये दिये हैं क्या ?”

“दिया है साहब |”

“उसमें थोड़ा पर्दा या अलग बात भी हुई होगी...?”

“वह तो होता ही है साहब.......?”

“ऐसा है........ तो वह तुम्हें मालूम है ?”

“अच्छी तरह मालूम है |”

“यहाँ भी वह पर्दा व छुपाने का काम होगा.........”

“ये रुपये अच्छे कार्यो के लिए काम में आने वाले हैं, इसलिए आप जैसे कहें ठीक है साहब......”

“ये देखो वैगई.......! तुम विषय को ठीक से समझ गई इसलिए हम ओपन में बोल देते हैं| ट्रस्ट के द्वारा देने वाले पाँच लाख रुपये आधा तुम्हारे समाज की भलाई के लिए, बाकी आधा हमारे लिए.........”

वैगई हंसी | “साहब ये तो एक साधारण विषय है | सभी ट्रस्टों में साधारणत: होने वाली बात |” कैसे भी हमारे अच्छे समाज संस्था को ढाई लाख रुपये मिलेंगे....... वह बहुत है |”

वरदराजन बीच में बोले “चेक पाँच लाख का देंगे | तुम चेक को कल ही बैंक में डालोगी, तो परसों कैश हो जाएगा | दोपहर को ठीक दो बजे तुम्हारे समाज सेवा संस्था के भवन में प्रेसिडेंट आएंगे | ढाई लाख रुपये उनको तुम दे दोगी |”

“ठीक साहब.......”

“परंतु आप लोग पाँच लाख रुपये समाज के अच्छे कार्यों के लिए खर्च किया ऐसा खर्चे में दिखाना होगा |”

“साहब इसके बारे में आपको बोलने की जरूरत नहीं | इस तरह के मामले हमारे अच्छे समाज की संस्था के लिए नया नहीं है....”

प्रेसिडेंट नित्यानंदम हँसे |

“समस्या खत्म.......! इस विषय को तुम्हें समझाने में कठिनाई होगी हमने सोचा............चेक ले लो माँ..........” बोल कर, ऑडिटर को देखा, वे अपने मेज की दरार को खींच कर खोल चेक-बुक को निकाला |

“चेक को किसके नाम लिखे....?”

“सोसाइटी फॉर केयरिंग एंड शेयरिंग |”

नित्यानन्द के जेब में छोटा सा कंगारू झांक रहा था सेल फोन की रिंगटोन बाहर आई | मोबाइल निकाल कान में लगाया |

“एस. पी. साहब.......?”

“...............”

“बोलिएगा........”

“.............”

“मुंह खोल कर सच नहीं बोलो तो...... किसी खराब दिन उसको दाना देना पड़ेगा |”

“........”

“मैं बाद में, बात करता हूँ......” प्रेसिडेंट ने मोबाइल को बंद कर जेब में रख लिया, इतने में चेक भर कर ऑडिटर वैगई को देकर बोले:- “देखो........ चेक को एक बार ठीक है क्या? देख लो.........” वैगई चेक लेकर देखा, अपने पर्स में सुरक्षित रखकर उठी |

“बहुत धन्यवाद साहब........... आपकी इस मदद को हमारी ‘केयरिंग एंड शेयरिंग संस्था’ कभी भी नहीं भूलेगी |”

नित्यानन्द अपने गंजे सिर को दो बार हाथ फेर कर हँसे | “धन्यवाद सब रहने दो जी | परसों दोपहर को दो बजे तुम्हारी सर्विस सेंटर पर आऊँगा | रुपये ढाई लाख तैयार रहना चाहिए |”

“होगा साहब |”

वैगई अडैयार से निकल कर घर पहुंची तो 8.25 हो गए | सब टी. वी. में निर्मला पेरियस्वामी फिर से मुख्य समाचार पढ़ रहे थे | घर के चौखट पर अप्पा के घिसी हुई हवाई चप्पल के नहीं दिखने से वे अभी भी किराने की दुकान से नहीं आए पता चला | अम्मा उमैयाल रसोई में कोई छौंक लगा रही थी | यमुना हॉल में बैठ कर पूरी का आटा मल रही थी | तुंगभद्रा अपने कमरे में मेज पर कम रोशनी में पढ़ रही थी |

“अम्मा अक्का (दीदी) आ गई.......” यमुना के कहते ही उमैयाल जल्दी-जल्दी रसोई से बाहर आई | चालीस साल की उम्र में साठ साल सी कमजोर दिखी |

“ लेट क्यों हुई ?”

“अडैयार तक एक काम से गई थी अम्मा.........”

“हाथ में तुम्हारे मोबाइल है ना........ पड़ोस के घर फोन कर देर से आऊँगी बोल सकती थी ना ?”

“अम्मा ! अक्का के पास जो मोबाइल है वह ओन्ली फॉर समाज सेवा......... नोट फॉर यू......” तुंगभद्रा पुस्तक हाथ में लिए कमरे में से बाहर आई | बीस साल की तुंगभद्रा पिछले साल दीपक से, इस साल लेब में एसिड लगने से बायी तरफ गर्दन का मांस गल कर, चोट लगे बर्तन जैसे दिख रही है |

वैगई उसके पास जाकर उसके कंधे पर हाथ रखा | “आज कुछ परीक्षा है बताया था..... कैसे किया ?”

“सिर्फ........... उससे खेली हूँ |”

“मार्क्स आएंगे तो ही पता चलेगा |”

“वैगई ! थोड़ा कॉफी दूँ ?” उमैयाल ने पूछा |

“नहीं अम्मा ! मुंह धोकर आ रही हूँ | आज खाने में क्या है ?”

“पूरी और आलू........! तुम मुंह धोकर आओ तब तक तैयार हो जाएगा........”

“दस मिनिट में आ जाऊँगी |” पीछे बरामदे के पास अपने कमरे के अंदर गई | अपने पर्स को कील पर टांग कर साड़ी बदल के पुरानी साड़ी पहनी | उसी क्षण मोबाइल की घंटी बजी | उसने किसका नाम है देखा | वाणी सुब्रमणियम देख कानों में लगाया |

“मैडम |”

“क्यों वैगई ! दयानिधि ट्रस्ट से चेक ले लिया क्या ?”

“ले लिया मेडम........... मैंने तुरंत आपको फोन किया | आपका फोन इंगेज था |”

“वाऊ....... बढ़िया”

“हाँ मैडम |”

“हमने जो आशा नहीं की ये एक बड़ी रकम है | जिसे कम से कम तीन क्रोनिक रिनल फेलियर पेशेंट्स के उपयोग में ला सकते हैं |”

“मेडम ! उस ट्रस्ट ने एक प्रेम पूर्वक कंडीशन किया है |”

“कंडीशन........?”

“हाँ मेडम.......... उनके दिये पाँच लाख रुपयों को 50% अर्थात् ढाई लाख रुपया उन्हें देना होगा |”

“ये क्या अन्याय है ?”

“अन्याय ही है |”

“हाँ तुमने कबूला ?”

“उनके बोलने को कबूला | परंतु उनको दस पैसा भी नहीं दूँगी | पाँच लाख को हम ही खर्च करेंगे....”

“ये....... कोई समस्या हो गई तो....?”

“समस्या ? आने दो ! ये सब समस्या दूसरों के लिए करेला है | मेरे लिए ये बादाम का हलुवा है |

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