उजाले की ओर –संस्मरण Pranava Bharti द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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उजाले की ओर –संस्मरण


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नमस्कार 
स्नेही मित्रों 
      जीवन एक पहेली सजनी ,जितना सुलझाओ ये उलझे ,है रहस्यमय कितनी !
मित्रों सोचें तो वृत्त में घूमते ही रह जाते हैं हम और ज़िंदगी का पटाक्षेप हो जाता है | 
हम सब देखते हैं कि जीवन की युवावस्था तो जैसे-तैसे कट ही जाती है किंतु  जब कभी एक ऐसा समय आता है जब हमें अकेलापन भोगना पड़ता है तब हम कितना अकेलापन महसूस करने लगते हैं | 
    ऐसा नहीं है कि युवावस्था में हम अकेलापन महसूस नहीं करते लेकिन अनुपात में यह कम ही होता है | मनुष्य का अकेलापन इस संसार में उसके लिए सबसे बड़ा अभिशाप होता है। मनुष्य ही नहीं संसार का कोई भी प्राणी क्यों न हो अकेलेपन से घबराकर किसी का साथ तलाशने का प्रयास करने में कई बार जब विफल हो जाता है तो ज़िंदगी से जैसे उसका विश्वास ही उठ जाता है | वह डिप्रेशन तक चला  जाता है | 
पशु-पक्षियों को भी साथ की आवश्यकता होती है , वे झुण्ड बनाकर रहते हैं। हम सब जानते हैं कि पशु -पक्षी अपने-अपने साथियों के साथ समूहों में रहते हैं। भेड़, बकरी, हाथी आदि सभी पशु मिलकर चलते हुए दिखाई देते हैं। 
संध्या समय आकाश का वह दृश्य अवलोकन करने जैसा होता है जब सारे पक्षी कतार में नीले अम्बर में अपने घरों को लौट रहे होते हैं | पशु हों या पक्षी --वे अपने आपको अपने साथियों के साथ अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं | 
पक्षियों का कलरव,पशुओं के रम्भाने का स्वर और तो और श्वान के एकसाथ भौंकने की आवाज़ ,यह सब यही प्रदर्शित करते हैं कि सबको साथ की आवश्यकता होती है |  
मेरे पास 'शैली' नाम की एक 'डॉगी' थी | मैं जब इंस्टीट्यूट जाती ,उससे छिपकर गेट से बाहर निकलती थी | बाहर जाकर मैं गेट बंद करती लेकिन उसे मेरे जाने के समय का पता चल जाता था और कितनी भी आवाज़ कम करके मैं गेट खोलती वह समझ जाती कि गेट पर मैं हूँ | मैं दो मिनट बाहर खड़ी उसे बाहर से ही पुचकारती और वह गेट के अंदर खड़ी हुई मुझ पर गुस्सा करती रहती | मुझे जाना होता ही था ,वह अपनी भाषा में मुझसे लड़ाई करती रहती | थोड़ी देर बाद स्वाभाविक है ,वह मुँह  लटकाकर अंदर अपनी जगह पर जा बैठती | 
   जब मैं शाम को लौटती ,वह बरामदे में पड़े दीवान पर चढ़ जाती और उछल-उछलकर मुझ पर गुस्सा होती | कई बार तो घर का सेवक बताता कि उसने दूध भी कम पीया है ,रोटी भी कम खाई है | मुझे दुःख होता | डॉक्टर साहब हर माह विज़िट करते ,जब मैं उनसे पूछती वे बताते कि घर में से सब बाहर चले जाते हैं और वह अकेलापन महसूस करती है | मुझसे सबसे अधिक जुड़े रहने के कारण सबसे ज़्यादा झगड़ा भी वह मुझसे ही करती थी |मेरी  कितनी सुंदर साड़ियों को अपने मुंह से खींचकर वह फाड़ डालती |
    जैसे-जैसे मैं उम्र में बड़ी होती गई और मैंने अपने चारों ओर के बुज़ुर्गों को अकेलेपन के परिवेश में देखा ,मैंने महसूस किया कि वे अकेलेपन के शिकार हैं |बहुत अच्छे पदों से रिटायर होने के बावज़ूद,सभी सुख-सुविधाओं के बावज़ूद वे कभी  इतने निराश्रित से दिखाई देते कि उनके बारे में सोचने के लिए मन बाध्य करता | 
किसी के बच्चे विदेश में हैं ,किसीके यहीं हैं तो बहू को अपने पति के माता-पिता से परेशानी है | वे अलग घर लेकर रह रहे हैं अथवा उन्हें माता-पिता ही अलग घर दिलवा देते हैं जिससे गृह-क्लेश न हो | 
   लेकिन जब दो में से एक रह जाता तब परिस्थिति और भी कठिन हो जाती | इसीलिए वृद्ध आश्रमों की संख्या बढ़ती जाती है | मुझे ऐसा महसूस हुआ कि यदि किसीको वृद्धाश्रम में रहना भी पड़े तो वह अकेलेपन से कहीं अच्छा है | वहाँ लगभग उनकी उम्र के कई लोग तो होते हैं | यह भी संभव है कि वे लोग एक से मानसिक स्तर के मिल जाएं और सब साथ मिलकर अपना समय सुन्दर तरह से बिता सकें | 
  मित्रों ! भूखे को खाना खिलाना ,प्यासे की प्यास बुझाना ,अकेले का अकेलापन दूर करने का प्रयास कहीं न कहीं मन को शांति व सुकून देते हैं | 
सोचें ,हम किसी अकेले के लिए किस प्रकार और क्या कर सकते हैं ? 
जीवन कब समाप्त हो जाए,कुछ कहा नहीं जा सकता | यह एक ऎसी पहेली है जो रहस्य से भरी रहती है | 
सो,हम सब मिलकर कोशिश करें कि किसको कैसे सुकून दे सकते हैं ,वृत्त में ही घूमते हुए जीवन के अंत तक न पहुंचें | 
मिलते हैं अगली बार किसी ऐसे विषय को लेकर जो हमें सोचने पर बाध्य कर दे | तब तक के लिए नमस्कार !
सस्नेह 
आपकी मित्र 
डॉ. प्रणव भारती