अपंग - 46 Pranava Bharti द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अपंग - 46

46

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रिचार्ड गाड़ी का दरवाज़ा खोलकर एक शोफ़र की तरह साइड में खड़ा हो गया था |

उसकी सारी हरकतें भानु को आशिकों जैसी लगतीं | वह कई बार सोचती भी थी कि आखिर रिचार्ड को उससे क्या मिलेगा ?

हम -एक दूसरे को प्यार करते हैं, ध्यान रखते हैं तो दोनों ही ओर से होता है न ! लेकिन यहाँ तो रिचार्ड ही हर समय भानुमति की सहायता के लिए खड़ा नज़र आता था | कोई भी रिश्ता एक ओर से नहीं बनता और टिकता तो हरगिज़ नहीं | जब तक एक-दूसरे को समझा न जाए और समय आने पर एक -दूसरे के लिए खड़ा न हुआ जाए रिश्ता कमज़ोर ही रहता है |

" रिचार्ड ! मैं सोचती हूँ, तुम्हारा इतना अहसान कैसे उतार पाऊंगी ? "कॉफ़ी बना लाया था रिचार्ड और दोनों सिटिंग-रूम में आमने-सामने बैठ गए थे |

"क्या बेकार की बातें सोचती रहती हो ? टेक एवरीथिंग इज़ी ---हमें नहीं मालूम, हम एक-दूसरे से क्यों मिलते हैं ? क्यों आते हैं हम एक-दूसरे की ज़िंदगी में --सब जानते हैं कि ज़िंदगी सिर्फ़ आने-जाने का नाम ही है | कुछ तो होगा न भानु ---" रिचार्ड ने कहा |

अब तक भानु का ध्यान रिचार्ड की भाषा पर नहीं गया था | अचानक उसे लगा, यह रिचार्ड की भाषा में कैसा परिवर्तन ?

"अरे ! वाह --तुम तो लगातार हिंदी बोले चले जा रहे हो, वो भी बिलकुल बिना रुके जैसे जन्म से ही हिंदी बोलते रहे हो |" भानु ने आँखें चमकाकर अपनी बात कही | सच में कितना सुन्दर बोल रहा था रिचार्ड ! एकदम धारा प्रवाह !उसने भानु से वायदा किया था कि जब तक वह भारत से लौटकर आएगी तब तक उसके जैसी हिंदी बोलने लगेगा | वैसे तो पहले से ही वह काफ़ी अच्छी हिंदी बोल ही लेता था |

क्या-क्या कर लिया इस बंदे ने इतने दिनों में ! उसने सोचा |

"अभी अपना पूरा घर देखो फिर मुझे दाद दो --पसंद आया या नहीं ? " रिचार्ड ने एक शैतान बच्चे की तरह इतराकर कहा | भानु को हँसी आ गई | उसने अब अपनी दृष्टि उस सिटिंग-रूम में डाली | क्रीम कलर के बैकग्राउंड पर मरून और ब्लू कलर के खूबसूरत सोफ़े, उसी से मैच करते परदे जिन पर जाली के ख़ूबसूरत पर्दे ! सामने की क्रीम कलर की दीवार पर किसी बड़े कलाकार की बड़ी सी मॉर्डन पेंटिंग ! दूसरी ओर की दीवार पर कृष्ण जी की अर्जुन को उपदेश देती हुई खूब बड़ी सी पेंटिंग, दो कॉर्नर्स में चमकदार ऊंचे ब्रास के स्टैंड्स पर लगे हुए सुंदर रूम-प्लांट्स ! भानु ने अब तक नीचे फ़र्श पर ध्यान नहीं दिया था, अब देखा | नीचे भी क्रीम व मरून कलर का खूब मोटा कार्पेट ! बीच में रखी हुई खूबसूरत नक्काशी वाली काँच की मेज़ !कॉर्नर में एक काँच का कॉर्नर बना हुआ था जिस पर सुन्दर टेलीफ़ोन था |

बच्चा रिचार्ड की गोद में ही सो गया था, उसे सोफ़े पर ही लिटा दिया था रिचार्ड ने, बाद में ही कॉफी बनाने गया और कुछ ही देर में कॉफ़ी के मग्स लेकर आया और एक मैग भानु के हाथ में मैग पकड़ा दिया |

कॉफ़ी का कप हाथ में लिए हुए ही भानु खडी हो गई और आगे की और बढ़ी | उसी कमरे से जु ड़ा एक डाइनिंग रूम था जिसमें चार कुर्सियों वाली काँच की मेज़ थी जिस पर ताज़े फूलों का एक फूलों से भरा हुआ कट ग्लास का बड़ा सा वाज़ था | डाइनिंग स्पेस के दोनों ओर बड़ी-बड़ी काँच की अलमारियों में से कट-ग्लास और बोन चाइना की और भी न जाने किस किस मैटल की क्रॉकरी भरी हुई थी | एक ड्राअर में कई तरह के सुन्दर नैपकिन्स, डाइनिंग में प्रयोग होने वाले तरह तरह के मैट्स से भरे थे |उसके आगे बढ़कर जायंट किचन था जिसमें बहुत सुंदर सा चूल्हा, पूरा मॉड्यूलर किचन ---आहा --कितना खूबसूरत था सब कुछ, बड़ा रॉयल ! सब ए क्लास ! राजेश वाला फ़्लैट जो वह छोड़कर आई थी, उसके मुकाबले तो यह इतना सुंदर था कि भानु ने कल्पना भी नहीं की थी |

"इतना कुछ रिचार्ड --? क्यों ?" भानु के मुँह से निकल ही गया |

"यू नीड दिस---" रिचार्ड ने कहा |

"सो---मच ---??"

"आओ, बैड रूम्स तो देख लो --" रिचार्ड ने कहा|

"ऐसे कितने बैड-रूम्स का एपार्टमेंट ले लिया ?" भानु खुश तो थी लेकिन रिचार्ड का अहसान उसे भारी लग रहा था | कभी भी कोई चीज़ एक ओर से नहीं होती | क्या करेगी वह रिचार्ड के लिए ? वह मन में सोचने लगी | दोस्ती की भी कुछ सीमाएं होती हैं |

"बस --दो हैं -- एक तुम्हारी किचन की लॉबी से लगा, एक इधर इस लॉबी से लगा और एक तुम्हारी हैल्पर के लिए छोटा |"

"हैल्पर !" भानुके मुंह से निकला |

"अरे ! सब पता चल जाएगा --" वह मस्ती में बोला |

अब रिचार्ड उसे लेकर बैड-रूम में आ गया था |

भानु खुशी से चीख़ उठी और जैसे पीछे की ओर घूमी, वह रिचार्ड के सीने से टकरा गई फिर अचानक खिसियाकर एक ओर हो गई | रिचार्ड ने उसकी कमर पर हाथ रखकर उसे सहारा व सांत्वना दी |

"सॉरी ---" भानु का मुँह और कान लाल हो आए |प्रेम भीतर से बाहर की ओर झाँक रहा था किन्तु विवेक दोनों के बीच में सभ्यता का सहज, सरल आवरण बनाए रखता था |

रिचार्ड ने उसे संभाला और बैड-रूम में जाकर खिड़की का पर्दा खोला | भानु ने देखा उसमें आसमानी रंग की सज्जा थी | हवा का एक सर्द झौंका आया, उसने तुरंत खिड़की बंद कर दी |वह भानु को उसके लिए खरीदी गईं पेंटिंग्स और किताबों का कलैक्शन दिखाने लगा |भानु ने देखा उसकी पसंद का एक सुंदर सा सितार, जो रिचार्ड को मालूम था, वह बजाती थी | तानपुरा, तबले की एक सुंदर जोड़ी ---एक कोने में एक मेज़, जिस पर बुक-स्टैंड पर सुंदरता से जमी हुई कई पुस्तकें ---

मेज़ में बने हुए शैल्फ़ के नीचे कई कम्पार्टमेंट्स बने हुए थे --जिनमें राइटिंग पैड्स, पेंटिंग्स का सामान था | सामने एक कुर्सी भी थी जो आराम-कुर्सी में तब्दील हो जाती थी --यानि वह जितना छोड़कर आई थी, उससे कितना ज़्यादा यहाँ इक्क्ठा कर रखा था रिचार्ड ने ---उस कमरे की लॉबी में कैसे रंगीन गमले लटक रहे थे जो झूम रहे थे |

दूसरा बैड-रूम बच्चे के लिए बनाया गया था जिसमें जैसे रिचार्ड ने खिलौनों और बच्चे की ज़रुरत का मानो सारा बाज़ार लाकर सजा दिया गया था |