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अपंग - 9

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दिनों की अपनी रफ़्तार होती है, वे हमारी मुठ्ठियों में कैद होकर नहीं चुपचाप बैठे रहते | वे बीतते हैं अपनी मनमर्ज़ी से, रुकते हैं तो अपनी मनमर्ज़ी से और कभी ठिठककर हमें खड़े महसूस होते हैं तो भी अपनी मनमर्जी से | दरअसल, वे कभी खड़े नहीं होते, उनका तो अपना मूड होता है जिसके अनुसार वे चलते हैं | वे हमें बताकर नहीं चलते, जैसे भानु को बताकर नहीं चलते थे | भानु को समझने की ज़रूरत थी कि आख़िर समय उससे क्या चाहता है ? दिन उससे कैसा रहने की उम्मीद करते हैं ? लेकिन नहीं कोई बदलाव नहीं, होता भी कैसे जीवन की बैलेंस-शीट उसके सामने जैसे एक ही स्थान पर ठिठककर ढीठ बनकर खड़ी हो गई थी, बेशर्मों की भाँति | 

भारत की यादें, माँ-बाबा का लाड़-दुलार सभी वहीं छूट गया था | पूरे-पूरे दिन ऐसे ही गुज़र जाते | आख़िर कविता भी कितनी लिख लेती वह ! गाना तो बिलकुल छूट ही गया था | मन ही न करता गुनगुनाने का जैसे किसीने सुरों को ताले में बंद कर दिया था | खुलते कैसे सुर जब चारों ओर जंजीरें थीं, कालिमा थी, असंवेदना थी, स्वार्थ था और केवल तन्हाई थी !

भानुमति को अपना घर ऐसा याद आता जैसे कोई ललचाता बच्चा किसी खूबसूरत वस्तु को देखकर उसकी ओर बाहें फैलता है किन्तु उसे अपनी बाहों में ले नहीं पाता और बेबस हो, आँखों के कटोरों में आँसू भरे हुए देखता रहता है | वह निराशा ओढ़ लेता है, बेबसी की चादर उसे अपने में लपेट लेती है | 

भारत में पूरे –पूरे दिन कहाँ गुज़र जाते थे, पता ही नहीं चलता था | यहाँ से वहाँ तक पेड़-पौधों की कतारें झूमती दिखाई देतीं | वह माली से उनकी देखभाल खुद करवाती, उनकी छँटाई अपने मन के अनुसार करवाती | कैसी-कैसी आकृतियाँ बनवा ली थीं उसने अपने बगीचे में ! एक ओर घोड़ा खड़ा मिलता जिसका मुँह नीचे होता, जैसे वह घास खा रहा हो, कहीं मोर अपने पंख खोलकर नाचता दिखाई देता तो कहीं बिल्ली मौसी की ही पत्तों से कटिंग करवा रखी थी उसने ! लगभग सभी पशु-पक्षियों के आकार उसके बड़े से बगीचे में दिखाई देते | उनकी आँखें चमकती चाँदी के सफेद मोती से चिपकवा लेती | रात की धीमी रोशनी में उन पशु-पक्षियों की आँखें हीरे सी दप दप करती दिखाई देतीं | 

भानु ने बगीचे में एक कोने में बोगनबेलिया की झाड़ियों से ऐसा कोना बना रखा था जहाँ मन होने पर वह उसके बीच जा बैठती | उसकी प्रिय नोटबुक उसके पास होती और उस झुरमुट में चुपके से बैठकर कुछ न कुछ उसकी कलाम से निकल ही जाता | 

अगर वह घर में किसी को न मिलती तो सबको मालूम ही था कि वह बोगनबेल से बने अपने छुटके से कोने में जा बैठी होगी | बेलों में से झरते फूलों की रंग-बिरंगी पत्तियाँ उसकी सहेलियाँ होतीं, वे उसका स्वागत करतीं और उस पर अपना स्नेह बरसाती ही रहतीं | अपने आपको झाड़ी में समेटते हुए वह कितने सुख से भर जाती थी | इसी झाड़ी में कितनी बार वह राज के साथ भी सिमटकर बैठी थी, एक-दूसरे के आगोश में वे घंटों चुपचाप, बिना एक भी शब्द बोले मन में कोई रचना बुन रहे होते | अलौकिक दिन थे जो न जाने क्यों और कहाँ उड़न छू हो गए थे | 

यहाँ आकर उसे सबसे बड़ा आघात लगा था कि यहाँ पहुँचते ही लोग इतनी जल्दी अपनी तहज़ीब, सभ्यता, संस्कृति यहाँ तक कि जड़ें भी भूल जाते हैं | क्या विदेश की ज़मीन उन्हें कुछ ऐसा सुंघा देती है जो वे यहाँ पहुँचते हैं नहीं, भूलना पहले शुरू कर देते हैं | बहुत कोफ़्त होती उसको यह देखकर कि बिलकुल शाकाहारी व्यंजनों पर रहने वाले लोग देखते ही देखते नॉनवेज ऐसे चटकारे लेकर खाने लगते हैं मानो जन्म से ही किसी कसाईखाने में ही पैदा हुए हों | उसे किसी के खान-पान पर कोई आपत्ति नहीं थी, होनी भी नहीं चाहिए थी लेकिन अपनी जड़ें ही भूल जाना सबसे बड़ी बेवकूफ़ी लगती | 

कमाल के लुढ़कने लोटे हैं ये लोग ! अपनी कोई ओरिजिनलिटी ही नहीं | कैसे हो सकता है इतना बदलाव ! जम ही तो जाते हैं सारे संवेग, सारी संवेदनाएँ, सारी कोमल भावनाएँ! बस, एक ही चीज़ दिखाई देती है और वह है पैसा !

राज कहाँ अलग था उन सबसे ? बल्कि राज के लिए उसे बहुत दुख होता | उसने तो अपने मन में खरे सोने को प्यार किया था, यह तो पीतल भी नहीं निकला था !!

राज का मुँह उसी पार्टी वाले दिन से फूलकर कुप्पा हो गया था| उसे लगा था कि भानु ने उसकी मित्र रुक का अपमान किया था | क्यों करती वह उसका अपमान ? लेकिन राज को यही लग रहा था कि भानु ने जान-बूझकर उसकी मित्र का अपमान किया था | अब वह सफ़ाई देने से तो रही | क्यों दे वह सफ़ाई और किसके लिए ? बल्कि उसे महसूस हो रहा था कि उन दोनों को उससे माफ़ी मांगनी चाहिए | 

सांवले रंग और भारतीय नाक-नक्श की रुक भानु को व्यवहार से कहीं से भी भारतीय नहीं लगी थी | राजेश के साथ जिस प्रकार वह निर्लज्ज व्यवहार कर रही थी, उससे भानु को काफ़ी पीड़ा हुई थी | साथ ही राज का व्यवहार उसके साथ कैसा था कि वह अपनी बेज़्ज़ती महसूस कर रही थी | स्वाभाविक भी था, आख़िर राज उसे अपने साथ लेकर गया था, उसे कम से कम पत्नी को कंपनी तो देनी चाहिए थी लेकिन ----

उसे अपनी किसी भी बात पर अफ़सोस नहीं था| हाँ।अपने ऊपर इसलिए अफ़सोस हुआ था कि वह रोकर अपनी कमजोरी सबको दिखा गई थी | लेकिन कुछ बातें अपने वश में नहीं होतीं, कुछ संवेग, संवेदनाएँ –सब कुछ बिन बताए, बिन कहे आकर कभी ऐसे खुल जाती हैं जैसे ज़रूरत से अधिक सामान बांध दिए जाने पर कोई कपड़े की पोटली अचानक बिखर जाती है !!

राजेश ने तो हद कर दी थी | उस घटना के बाद में उसने भानु से बात तक न की थी, सॉरी बोलना तो बहुत दूर की बात थी !! आज दो दिनों से वह अपनी छत के नीचे घुटा घुटा महसूस कर रही थी | 

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